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आजादी मेरा ब्रांड – अनुराधा बेनीवाल की बेहतरीन किताब

तुम्हारे अपने घर से कहीं ज्यादा सुरक्षित यह पराई अनजानी दुनिया है

May 3, 2016 6:09 pm by: Category: खबर खास, धरोहर खास, शख्सियत खास, साहित्य खास 3 Comments A+ / A-

मैं घुम घुम देखूंगी सारा हरियाणा ये गीत तो आपने सुना ही होगा। इसमें महिला की सिर्फ हरियाणा भर को देखने की इच्छा है। आप सोच सकते हैं जिन महिलाओं को घर की चारदिवारी से बाहर सिर्फ गावं के कुएं, तालाब, नहर और खेत तक जाने वाली पगडंडी को देखना ही नसीब हुआ हो उनके लिये हरियाणा को देखना कितना बड़ा सपना रहा होगा। देश और दुनिया को देखना तो उनकी कल्पना तक में नही था। गीत के जरिये महिला यह इच्छा भी खुद अकेले घूमने की नहीं जता रही बल्कि इसके लिये उसे अपने पति परमेश्वर की सहारा भी चाहिये उसकी कृपा हुई तो दिखाएगा नहीं तो नहीं। लेकिन अब धीरे धीरे वक्त बदल रहा है। लड़कियां पढ़ रही हैं खेल रही हैं घरों से बाहर काम करने जा रही हैं यहां तक कि अतंरिक्ष तक भी पंहुच रही हैं लेकिन ये सामान्य बात नहीं है अपवाद हैं। महिलाओं का अकेले अपने दम पर घर से निकलना आज भी उतना ही मुश्किल है जितना पहले था। इन्हीं मुश्किल हालातों में हरियाणा के ही रोहतक जिले के खेड़ी महम गांव से निकली अनुराधा बेनीवाल अकेले अपने दम दुनिया की सैर को निकलती है। हाल ही में राजकमल प्रकाशन के ही उपक्रम सार्थक प्रकाशन से प्रकाशित उनकी यायावरी आवरगी’ श्रृंखला की पहली किताब आजादी मेरा ब्रांड’ काफी चर्चित हो रही है। सिर्फ किताब ही नहीं खुद अनुराधा बेनीवाल भी हरियाणा में आरक्षण आंदोलन के बाद जिस तरह के हालात बने उसमें अपनी बेबाक टिप्पणी और सही समय पर लोगों से अपील करने पर चर्चित हुई। फिर सामाजिक समरसता मंच के जिस सद्भावना सम्मेलन के मंच पर योगगुरु बाबा रामदेव सर काटने की बात कहते हैं उसी मंच पर वे सबकी आंखों में आंखे डालकर सवाल पूछती हैं। सवाल वे अपनी किताब आजादी मेरा ब्रांड में भी पूछती हैं।

 

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फोटो: आवरण चित्र

दरअसल आजादी मेरा ब्रांड पुस्तक प्रकाशित होते ही बात दिल्ली तक पंहुच गई। हालांकि यात्रा करने में जो आनंद मुझे आता है वह यात्रा वृतांतों को पढ़कर नहीं आता उनसे एक जलन होने लगती है और मन तड़पने लगता है। खैर किताब हरियाणवी छोरी ने लिखी थी इसलिये खरीदनी तो थी ही। पुस्तक मेले में यह मौका हाथ से नहीं जाने दिया और ले आया। लेकिन पढ़ने में काफी समय लग गया पहले कुछ और किताबें हाथ में उठा रखी थी इसलिये उन्हें पूरा करना था। हाल ही में अपने घर जाना हुआ तो रास्ते के लिये किताब साथ ले ली। जाते वक्त मौका मिला नहीं लेकिन आते वक्त किताब पूरी करने के चक्कर में गुड़गांव सीधा आने कि बजाय दिल्ली मेट्रो की सवारी की। मैं आ तो जींद से रहा था लेकिन लग रहा था अनुराधा के होस्ट मेरी आवभगत कर रहे हैं। लग रहा था मैं गुड़गांव अपने घर नहीं जा रहा बल्कि युरोप घूमने निकला हूं। यह तो खैर किताब का एक पक्ष हुआ जिसमें पाठक खुद को अनुराधा के साथ घुमता हुआ पाता है।

आजादी मेरा ब्रांड इस नाम से ही जाना जा सकता है कि किताब क्या कहती है लेकिन आप एक बार शुरु करते हैं किताब को तो इतनी सरल, सहज और आकर्षक है कि पाठक युरोप के एक शहर से दूसरे फिर दूसरे से तीसरे चलता ही रहता है। लेकिन यह किताब किसी पर्यटक के अनुभव को कहती हो ऐसा नहीं है इस किताब से सबसे अहम बात जो सीखने को मिलती है जानने को मिलती है वो है घूमने का अंदाज आखिर घूमें कैसे, कहां क्या देखें। अनुराधा लिखती हैं, ”जब आप थोड़े समय के लिये किसी नए शहर में होते हैं तो होटल में रहकर सिर्फ पोस्टकार्ड वाला शहर ही देख पाते हैं। शहर की आत्मा छुपी रह जाती है। आप टूरिस्ट होते हैं तो शहर भी आपको टूरिस्ट जैसा ही ट्रीट करता है। वह आपसे पैसे भी ज्यादा लेता है और घूमना अलग कठिन लगता है।” अनुराधा पूरा यूरोप ऐसे ही कभी लिफ्ट लेकर एक से दूसरे शहर तो कभी ट्रेन, कभी बस, कभी मेट्रो लेकर घूमती हैं वे किसी होस्टल, या होटल में भी अपना ठिकाना नहीं बनाती बल्कि इंटरनेट पर अपने लिये होस्ट ढूंडती हैं और उन्हें देर सवेर ये होस्ट मिल भी जाते हैं। अनुराधा के इस पूरे सफर का अनुभव लेकर अंत में वे चीख पड़ती हैं जितनी असुरक्षा, जितनी पीड़ा, जितनी तकलीफ उन्हें भारत में उसमें भी हरियाणा में अपने शहर रोहतक और गांव में होती है उतनी दुनिया के अन्य किसी कौने में नहीं होती दरअसल वे एक लड़की हैं इसका अहसास ही उन्हें यहां होता है क्योंकि बाकि दुनिया तो उसे भी एक मनुष्य के रुप में ही देखती है। वह उसके शरीर का स्कैन नहीं करती। अपनी यात्रा में वह अपनी सहेलियों के किस्से कहती हैं। एक चीज और अनुराधा अपनी इस किताब में साफ करती हैं कि जो महिलाएं विदेशों में अपने पतियों के साथ सैटल हो चुकी हैं और फेसबुक पर परिवार सहित खुशनुमा तस्वीरें चिपकाती हैं जरुरी नहीं कि उनकी जिंदगी में उतनी ही खुशी हो वहां भी वे वही आश्रित जीवन व्यतीत करती हैं जो अक्सर लड़कियों का नसीब माना जाता है।

 

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फोटो: हरविंद्र मलिक

 

अनुराधा अपने सफर के अंत में चीखती हैं वे उस आजाद और स्वतंत्र माहौल को अपने देश अपने प्रदेश में लाना चाहती हैं, ”मैं उस चीज के बिना वापस नहीं जाऊंगी! मुझे आजादी को अपने खेतों, अपने गांवों, अपने शहरों में महसूस करना है। मुझे यूं ही निश्चिंत बेफिक्र घूमना है, रोहतक की गलियों में।” वह चीखते हुए सवाल पूछती हैं, ”क्यों नहीं चलने देते तुम मुझे? क्यों मुझे रह रहकर नजरों से नंगा करते हो ? क्यों तुम्हें मैं अकेली चलती नहीं सुहाती? मेरे महान देश के महान नारी-पूजको, जवाब दो। मेरी महान संस्कृति के रखवालो, जवाब दो। मुझे बताओ मेरी कल्चर के ठेकेदारो, क्यों इतना मुश्किल है एक लड़की का अकेले घर से निकलकर चल पाना ? जो समाज एक लड़की का अकेले सड़क पर चलना बर्दाश्त नहीं कर सकता वह समाज सड़ चुका है। वह कल्चर जो एक अकेली लड़की को सुरक्षित महसूस नहीं करा सकती, वह गोबर कल्चर है। उस पर तुम कितने ही सोने-चांदी के वर्क चढाओ, उसकी बास नहीं रोक पाओगे, बल्कि और धंसोगे।”

अनुराधा हमवतन लड़कियों को आह्वान करती हैं, मेरी यात्रा यहां खत्म नहीं हुई बल्कि शुरु होती है और तुम्हारी भी। तुम चलना, अपने गांव में नहीं चल पा रही तो अपने शहर में चलना, अपने शहर में नहीं तो अपने देश में चलना, और अगर देश भी चलने में दिक्कत करे तो दुनिया भी तुम्हारी ही है।

देश व प्रदेश की महिलाओं के लिये तो यह किताब एक प्रेरणा हो ही सकती है साथ ही घुमक्कड़ प्रवृति के लोगों व समाज के हर संवेदनशील मनुष्य को यह किताब पढ़नी चाहिये। जैसे हिटलर के साथ मिलकर किये अपने कुकृत्यों के लिये बर्लिन आज भी माफी मांग रहा है वैसे ही इस देश व प्रदेश के पुरुष अपनी बेटियों को आगे बढाने के लिये यह पहल कर सकते हैं। लेकिन आये दिन देश व प्रदेश में बलात्कार जैसे जघन्य मामलों का सामने आना अनुराधा के सपने को कमजोर और हरियाणा के प्रसिद्ध कवि मंगतराम शास्त्री के गीत की इन पंक्तियों को और मजबूत करता है-

ना महफूज आबरू रह री बच्या नहीं विश्वास सखी

किस पै करां भरोसा ए भेबे नहीं बची कोये आस सखी

बर्लिन आज माफी मांग रहा है आखिर हमारा समाज कब अपने किये पर पश्चाताप करेगा। इस बेहतरीन किताब के लिये अनुराधा बेनीवाल को हरियाणा खास की ओर से बधाई और श्रृंखला की अगली पुस्तक के लिये शुभकामनाएं।

आजादी मेरा ब्रांड – अनुराधा बेनीवाल की बेहतरीन किताब Reviewed by on . मैं घुम घुम देखूंगी सारा हरियाणा ये गीत तो आपने सुना ही होगा। इसमें महिला की सिर्फ हरियाणा भर को देखने की इच्छा है। आप सोच सकते हैं जिन महिलाओं को घर की चारदिवा मैं घुम घुम देखूंगी सारा हरियाणा ये गीत तो आपने सुना ही होगा। इसमें महिला की सिर्फ हरियाणा भर को देखने की इच्छा है। आप सोच सकते हैं जिन महिलाओं को घर की चारदिवा Rating: 0

Comments (3)

  • Virender Jangra

    very nice dear

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