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क्या धर्म मुझे अच्छी सैलरी दे सकता है?

December 12, 2017 11:04 am by: Category: खबर खास 1 Comment A+ / A-

 

मैं कोई कट्टर हिंदू नहीं। न ही कट्टर मुसलमान। आदमी हूं। मानवीयता है मुझमें। नीचे चित्र दिखाई दे रहा है। जिसमें एक गाय का मुंह पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। कोई मेडिकल साईंस ऐसी नहीं है शायद जो जादू मारकर उसके मुंह को वापस लौटा दे। न ही कोई भगवान ऐसा कर सकते हैं। लेकिन अहम बात ये है कि हम आदमी-आदमी लड़कर इन पशुओं की जान क्यों खतरे में डाल रहे हैं। यहां मैं ये बात कहने नहीं आया कि देश में खुली गौशालाएं क्या कर रही है। या इतनी गौशालाएं है तो ये गाय खुली क्यों घूम रही थी। बल्कि जो समस्या का मूल है उसी पर बात करूंगा मैं। ये तस्वीर और इससे संबंधित पोस्ट मैंने फेसबुक पर देख थी जिसका लिंक भी आपसे साझा कर रहा हूं। ( https://www.facebook.com/yuvabharatgzb/posts/991325004341740 )

 

बात सिर्फ गाय की ही नहीं बात सूअर की भी हो सकती है। बिल्ली की भी। और हमारे पालतू कुत्ते की भी। हिंदू-मुस्लिम के नाम पर जब रोज सोशल मीडिया रंगीन मिलता है, क्षुब्ध होता हूं। आघात पहुंचता है अंदर तक। सोचता हूं आखिर कहां जा रहे हैं हम। क्या कर रहे हैं। एक दिन किसी की हत्या करने की लाईव वीडियो आती है। दूसरे ही पल उसके पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तर्क। राजनीति शुरू। मीडिया का टीआरपी प्रयोग। सब एक-दूसरे का गला काटने को तैयार।

सोचता हूं। क्या यही सिखाते हैं हमारे धर्म! क्या मानवीयता नाम का कोई चेप्टर नहीं है हमारे धर्मों में। क्या हम तमाम उम्र ऐसे ही करते रहेंगे। क्या हमारे मानव ह्रदय में मानवीयता का बीज नहीं हैं जो वाजिब, तर्कशील और प्रमाणिक सत्य की बात कह सकें। क्या हमारा जमीर इतना मर गया है कि एक मौत होती देखकर या तो धर्म राग छेड़ें, या राजनीति करें, भारत-पाकिस्तान चिल्लाएं सिर्फ और किसी का खून करने के लिए उग्र हो जाएं। क्या हमारे धर्म में इतनी मानवीयता नहीं बची है कि शांतिपूर्ण ढंग से सब बैठकर सहिष्णुता और समझ के साथ भाईचारे की बात कह सकें। क्या मौत का बदला देश के अंदर तनाव, ग्रहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करना और सिर्फ राजनीतिक फायदा उठाना-भर रह गया है। अगर यही अर्थ है हमें शोषकों के आगे जाकर आत्मसमर्पण कर देना चाहिए ताकि वे हमें मार सकें, लूट सकें और हमारे भेजे में जमकर हिंदू-मुस्लिम भर सकें।

और हां ! अगर उपद्रव फैलाकर सभी को मरने की ही बात करनी है तो सारे इकट्ठे होकर सर्वोच्च न्यायालय से आत्महत्या की अनुमति मांग लेनी चाहिए या परमाणु बम से खत्म कर लेना चाहिए सबको साथ खड़े होकर। लेकिन क्या यही इलाज रह गया है हमारे पास सब लड़ाईयों के समाधान का। अगर ऐसा है तो हमे मानव होने पर धिक्कार होना चाहिए। नेता अपना घर भरने के लिए भाग रहे हैं, नेताओं के चमचे इसलिए साथ खड़े हैं कि वे तो परजीवी हैं ही। सरकारी नौकरी वाले के पास महीनें में सैलरी आ रही है वो इसलिए देश के बारे में नहीं सोचना चाहता कि उनका पेट तो भर ही जाएगा, क्या टेंशन लेनी है, समाज जाओ भाड़ में। बड़े-बड़े उद्योगपतियों को ये सोचने की जरूरत ही नहीं है। लेकिन मजदूर वर्ग! उसका क्या होगा। वो तो मर ही गया। पिस ही गया। खत्म ही हो गया समझो। मजदूर वर्ग से यहां मेरा अभिप्राय सिर्फ कस्सी उठाकर खेत में जाने वालों से ही नहीं है। मैं कॉलेज में कॉन्ट्रेस बेस पर सहायक प्रोफेसर हूं। और मैं दावे के साथ कहता हूं कि मैं मजदूर हूं।

मैं 20 हजार रूपये में नया घर नहीं बना सकता। मैं  20 हजार रूपये में बच्चों को अच्छे संस्थान में पढा नहीं सकता। मैं 20 हजार रूपये में बीवी और बच्चों को अच्छे कपड़े नहीं दिलवा सकता। क्या 20 हजार रूपये मेरी बाईक के तेल, गैस सिलेंडर, बिजली बिल, अखबार बिल टीवी बिल इन सबके लिए काफी हो सकते हैं। घर में कोई बीमार हो जाए तो उसकी दवा दारू के लिए मेरे पास ठीक-ठाक पैसा नहीं। तो क्या ये मेरे कर्मों का फल है। नहीं। स्नात्कोतर की पढाई के रूप में ऐसे बुरे कर्म तो नहीं किए थे मैने कि मैं इस तरह लाचार हो जाउंगा। क्या मैं कट्टर हिंदू हो जाउं तो इसका समाधान हो सकता है या अगर मैं कट्टर मुस्लिम हो जाउं तो इसका समाधान हो सकता है! नहीं धर्मों के पास इन सबके समाधान होते तो मैं कोई भी धर्म अपनाने के लिए तैयार हूं। क्या कोई ऐसा धर्म है जो मुझे हर महीने दो लाख की नौकरी दे सके। अगर ऐसा है तो कोई भी धर्म अपनाने के लिए तैयार हूं।

सबसे बड़ी समस्या धन का असमान बंटवारा है। यही तो है समाज के तमाम रोंगो की जड़। सारे मुस्लिम हिंदू हो जाए तो भी हिंदुस्तान गरीब से अमीर नहीं हो सकता और सारे हिंदू मुस्लिम हो जाए तो भी इसका समाधान संभव नहीँ। हां समाजवाद इसका उपाय हो सकता है। समाजवाद !  अरे ये क्या होता है ये तो शब्द कभी सुना ही नहीं। अब सुन लिया ना। तो फटाफट हिंदी डिक्शनरी में इसका अर्थ पता करो। इतने आलसी भी मत बनो कि ‘फिर देख लेंगे।‘ ये सारा बूरा वर्तमान इसी हमारे इसी आत्म-जुमले का नतीजा है। अगर हम तमाम साथी इसके लिए मेहनत करे तो सारी समस्याओं के समाधान संभव है। ये सब गाय, सूअर, हिंदू, मुस्लिम, राजनीति, जाति, सबसे उपर है अगर कोई भगवान के रूप में इस शब्द को देखता है तो मैं विश्वास कर सकता हूं कि वो सम्यक आस्तिक होने की कोशिश कर रहे हैं, वर्ना सारे अंधे आस्तिक शायद मानसिक रोगी हो गए हैं, उन्हे मनौचिकित्सक से मिलना चाहिए। हरियाणा खास के बहाने इस लेख का उद्देश्य इतना सा है कि अगर आप हमारे सारे आर्टीकल पढते हैं तो एक अच्छा विश्लेषण जरूर आपके दिलो-दिमाग में पैदा हो जाएगा। एक ऐसे दौर में जब पूरा मीडिया जगत टीआरपी की दौड़ में हैं वहां आम वर्ग की खास बातें कहने के लिए ये मंच तैयार किया है ताकि सामाजिक जागृति का ये मंच एक विस्तारित परिवर्तन का रूप ले सके। समाज के मरे हुए जमीर को जगा सके। सोए हुए शिक्षित युवाओं को जगा सके। समाज के आम वर्ग के हित की, किसान की, नारी की, मजदूर की, दलित की वो बात कह सके जो उनके लिए जरूरी है। समय-समय पर हमारी बात आप तक पहुंचे इसके लिए आप हमारे पेज को लाइक करें ताकि हमारी सूचनाएं आप तक प्रेषित हो सकें।

एस.एस.पंवार 

कंटेंट एडिटर, हरियाणा खास

 

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