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आम जन के कवि रामफल जख्मी का निधन

9 से ज्यादा किस्से और सौ से अधिक गीत, रागनियों के लेखक हैं जख्मी

May 15, 2016 9:49 am by: Category: खबर खास, शख्सियत खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

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हरियाणा की माटी में पले बढ़े बहुत सारे ऐसे कलाकार हैं जो देश दुनिया में प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं। लेकिन कुछ ऐसे कलाकार भी हैं जिन्हें भले देश दुनिया ना जानती हो लेकिन जमीनी स्तर पर जिन्हें हर कोई जानता है। उनके गीत उनका नाम जुबान पर आते ही मन नाचने लगता है। कुछ इसी तरह की शख्सियत थे 17 अक्तूबर 1954 को हरियाणा के हिसार जिले के गंगणखेड़ी गांव में जन्मे श्री रामफल जख्मी। जख्मी जी के गीतों में दबे कुचले समाज का, स्त्रियों का दर्द उभर कर आता है। समाज के इन्हीं वंचित तबकों के जख्मों को लिखते लिखते शायद वे खुद भी रामफल से जख्मी हुए हों।

 

एक मजदूर जब लेबर चौक के लिये निकलता है तो उसकी कहानी क्या होती है जख्मी इस बारे में कुछ यूं लिखते हैं-

 

राजी खुशी की मत बूझै, बंद कर दे जिक्र चलाणा हे

दिन तै पहल्यां रोट बांध कै, पड़ै चौक म्हं जाणा हे

 

देखूं बाट बटेऊ ज्यूं, कोये इसा आदमी आज्या

मनै काम पै ले चालै, ज्या बाज चून का बाजा

नस-नस मैं खुशी होवै, जै काम रोज का ठ्याजा

इसे हाल म्हं मनै बता दे कौण सा राजी पाज्या

नहीं दवाई नहीं पढ़ाई नहीं मिलै टेम पै खाणा हे….

 

जख्मी जी का शुरुआती जीवन भी कुछ इसी तरह के अभावों में गुजरा पढ़ने लिखने के नाम पर किसी प्रकार की औपचारिक शिक्षा उन्हें नहीं मिली थी बल्कि साक्षरता अभियान के दौरान अक्षर ज्ञान हासिल कर सांग, रागनी, गीत आदि लिखना और गांव-गांव उनकी प्रस्तुति देनी शुरु की। हरियाणा में औरतें पति की उम्र से बड़े व्यक्तियों से घूंघट करती हैं। स्वाभाविक है कि ऐसा वे अपनी मर्जी से नहीं करती सामाजिक परंपराओं के तहत करती हैं वर्तमान में हालांकि इस प्रथा में कुछ कुछ बदलाव होने लगे हैं। जख्मी जी इसे अपनी कविता में औरतों को दबाने का हथियार मानते औरतों को चुप रखने का कारण मानते हैं और चुप के पर्दे चुप की इस चुनरी को वे उतार फेंकने का आह्वान महिलाओं से करते हैं-

 

पाड़ बगाद्यो बहना चुप की चुनरिया

 

इस चुंदड़ी नै गळे को घोट्या, जुल्म करे बोलम तै रोक्या

जकड़े राखी मैं, पिया की अटरिया

इस चुंदड़ी नै जुल्म गुजारया, चुंदड़ी मैं दुबक्या हाथ हमारा

खूब पिटाया हमें सारी हे उमरिया

 

किसानी जीवन का चित्रण भी रामफल जख्मी ने अपने गीतों में किया है

 

ठा कै इतना भारी कसौला

बाड़ी का नुळावां खेत

कड़ा-कड़ बाजै कसौला

 

दोनों बच्चे साथ म्हं

आवै पसीना गात म्हं

गोड्यां चढ़ ज्या रेत

कड़ा-कड़ बाजै कसौला

 

इतना ही नहीं जिन कवियों, सांगियों, भजनियों ने महिला विरोधी गीत भजन रागनी लिखें हैं उन्हें भी वे अपने लपेटे में लेते हैं

 

सांगी भजनी गीतकार नै भी, ढाए जुल्म छोरियां पै

त्रिया विष की बेल कही, न्यू कमाए जुल्म छोरियां पै

मर्द गिरया ज्यादा, दीखै कम, पाए जुल्म छोरियां पै

रामफल सिंह’ नए भेष म्हं, हो नए भेष म्हं

हो री आज नीलामी

इस स्वतंत्र देश म्हं, हो देश म्हं

क्यों भुगतै बीर गुलामी

Ramfal-singh-zakhmi

रामफल जख्मी

 

 

सामाजिक अन्याय, भेदभाव, मजदूर तबकों का जीवन, शोषण उनकी रचनाओं में खूब झलकता है। उनके गीत एक बेहतर समाज की कल्पना करते हैं। बराबरी के समाज सपना देखते हैं। जीवन यापन के लिये वे सिंचाई विभाग में भी कार्यरत रहे। 14 मई की शाम एक लंबी बिमारी के बाद रामफल जख्मी जी का निधन हो गया। आज सशरीर वे हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन उनके गीत हमेशा गूंजते रहेंगें। अपने जीवन काल में जख्मी जी ने 9 से अधिक किस्से और सौ अधिक मुक्तक रागनियां लिखी हैं। उनकी कुछ रचनाओं को देश हरियाणा पत्रिका के संपादक डॉ. सुभाष चंद्र ने अपनी किताब प्रतिनिधि रागनियां में संकलित भी किया है। हरियाणा खास रामफल जख्मी जी को नमन करता हुए शोकाकुल परिवार को इस दुख को सहन करने का साहस प्रदान हो ऐसी कामना करता है।

आम जन के कवि रामफल जख्मी का निधन Reviewed by on . हरियाणा की माटी में पले बढ़े बहुत सारे ऐसे कलाकार हैं जो देश दुनिया में प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं। लेकिन कुछ ऐसे कलाकार भी हैं जिन्हें भले देश दुनिया ना जान हरियाणा की माटी में पले बढ़े बहुत सारे ऐसे कलाकार हैं जो देश दुनिया में प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं। लेकिन कुछ ऐसे कलाकार भी हैं जिन्हें भले देश दुनिया ना जान Rating: 0

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