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‘पगड़ी द ऑनर’ – पूरे सिनेमा हॉल में मात्र दो दर्शक

रवि चौहान और बलजिंदर कौर का अभिनय करता है प्रभावित

April 29, 2016 6:57 pm by: Category: खबर खास, मनोरंजन खास, शख्सियत खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

अपनी रीलिज से पहले पगड़ी कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुकी है। फिल्म से जुड़े निर्माता निर्देशक से लेकर कलाकारों
तक फिल्म को मिले पुरस्कारों से काफी उत्साहित थे। फिल्म के दो प्रीमियर देख कर कर मुख्यमंत्री ने इसे कर मुक्त करने की घोषणा भी की। शहर शहर जाकर फिल्म के प्रचार में भी टीम ने कोई कमी नहीं छोड़ी। निर्माता निर्देशकों ने तो प्रसिद्ध हरियाणवी फिल्म चंद्रावल का रिकार्ड टूटने की उम्मीद तक लगा ली। लेकिन जिस प्रकार मैने यह फिल्म देखी है उस प्रकार तो पूरी फिल्म की टीम ने भी यह नहीं देखी होगी। मैं और मेरी पत्नी सिर्फ दो लोग ही गुड़गांव के ग्रैंड सिनेमा में पगड़ी फिल्म के रात 8 बजकर 10 बजे के शो में रहे। ग्रेंड सिनेमा के मालिकों की हिम्मत की भी दाद देने को मन करता है कि उन्होंने दो दर्शकों पर भी शो जारी रखा। यह हरियाणवी के प्रति उसकी प्रतिबद्धता ही कहिये लेकिन सच्चाई यही है कि फिल्म लोगों को सिनेमाघरों तक खींच कर लाने में नाकाम रही है। इसके कारणों पर प्रकाश डालें उससे पहले आइये फिल्म के बारे में जानते हैं।

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क्या है पगड़ी – द ऑनर फिल्म की कहानी

पगड़ी उत्तर भारत में इज्जत का प्रतीक मानी जाती है। पगड़ी संभाल जट्टा पगड़ी संभाल गाना आपने सुना होगा और द लिजेंड ऑफ भगत सिंह में देखा भी होगा यानि पगड़ी से एक किसान का एक व्यक्ति का सम्मान सीधे तौर पर जुड़ा होता है। व्यक्ति के इसी सम्मान की कहानी कहती है पगड़ी द ऑनर फिल्म। फिल्म पुलिस थाने के दृश्य से शुरु होती है जहां एक बाप बेटे को लाया जाता है और दोनों के कपड़े उतरवाकर उन्हें पुलिसिया अंदाज में पूछताछ की जाती है। दर्शक की थोड़ी उत्सुकता बनती है कि इनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है। इस दृश्य के बाद फिल्म फ्लैश बैक हो जाती है। ग्रामीण जीवन का अच्छा चित्रण देखने को मिलता है विशेषकर किसान का अपने पशुओं तक से कितना लगाव होता है। फिल्म की कहानी मांगेराम (रवि चौहान) जो कि किसान है जिसे शुरुआती दृश्य में पिटता हुआ देखते हैं उसके परिवार से शुरु होती है। मांगेराम छोटी जोत यानि कम जमीन वाला एक गरीब लेकिन सामाजिक रुप से ईज्जदार किसान है। मांगेराम के दो लड़के हैं। बड़ा लड़का विवाहित है और खेती करता है तो छोटा राजवीर कॉलेज में पढ़ता है। मांगेराम का सपना है कि राजवीर पढ़ लिखकर बड़ा अफसर बने। लेकिन वह अपनी रुचि खेत में काम करने की ज्यादा दिखाता है। हालांकि पढाई पर भी ध्यान देता है लेकिन कॉलेज में उसका एक लड़की से प्रेम भी चल रहा है। लड़की पर विवाह का दबाव है और वह राजवीर को अपनी परेशानी बताती है राजवीर उसे थोड़ा हल्के में लेता है तभी उन्ही के साथ पढ़ने वाला एक अन्य प्रेमी जोड़ा भी इसी पशोपश में उनके पास आता है राजवीर यहां भी उनसे मजाक करता है हालांकि इस मजाक पर आप हंस पड़े यह जरुरी नहीं है। यहां राजवीर उन्हें मजाक में ही कहता है कि भाग कर शादी कर लो। फिर कुछ दिन बाद अखबार में फोटो के साथ प्रेमी जोड़े की हत्या का समाचार छपा आता है। यहां से राजवीर के प्रेमिका तान्या की चिंता और बढ़ जाती है। राजवीर उसे परीक्षाओं तक रुकने की कहता है। उधर तान्या का भाई उसे राजवीर के साथ देख लेता है और घर जाते ही तान्या से पूछताछ होती है लेकिन वह टाल देती है मां से सच्चाई कहती है तो प्रतिक्रिया में थप्पड़ खाती है तब उसे मजाक की कहकर टाल देती है। परीक्षाओं के बाद तान्या एक दिन घर से भाग जाती है उधर से राजवीर भी गायब हो जाता है। बात पुलिस तक पंहुचती है। तान्या का परिवार शहरी वर्ग का है और राजनीतिक रुप से रसूखदार भी पुलिस पर दबाव डालकर राजवीर के भाई व पिता को थाने में लाया जाता है और जहां से फिल्म शुरु हुई थी वहीं आकर मध्यांतर हो जाता है।

 

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मध्यांतर से पहले तक की कहानी में बिना गाने का रोमांस और ग्रामीण जीवन की अच्छी झलक आपको देखने को मिलेगी। इसके बाद राजवीर के परिवार पर संकटों का पहाड़ टूट पड़ता है। पिता व भाई की गिरफ्तारी की बात सुनकर राजवीर हिसार थाने की ओर कूच करने लगता है लेकिन खुद पुलिस ही उसे पकड़ कर हिसार लेकर जाती है। लड़की उसके परिजनों को सौंप दी जाती है। राजवीर का पिता पुलिस के हाथों हुई अपनी बेइज्जती से गहरे से आहत होता है। पुलिस यहां उन्हें छोड़ने के नाम पर भी शोषण करती है। शोषक एसएचओ की भूमिका यशपाल शर्मा ने बखूबी निभाई है। मांगेराम के लिये अपनी जान से भी प्यारे बैल पति व बेटों को छुड़ाने के लिये पत्नी को बेचने पड़ते हैं। अब मांगेराम के सर पर पगड़ी नजर नहीं आती जो पुलिस द्वारा उन्हें ले जाते वक्त सर से उतरती है और पत्नी उसे सहमी हुई छाती से लगाकर अंदर ले जाती है। बैलों के जाने का सदमा भी मांगेराम के लिये असहनीय हो जाता है। उधर लड़की खाना पीना छोड़ कर मरणासन्न हो जाती है तो मां बाप का दिल पिघल जाता है और वे शादी करने को तैयार हो जाते हैं। राजवीर के पिता को मनाने की कोशिश होती है लेकिन राजवीर का पिता इसे अपनी खोयी हुई इज्जत वापस पाने के एक अवसर के रुप में देखता है यहां पर दर्शक इज्जत और ईगो के फेर में फंस सकते हैं। पंचायत की मदद ली जाती है जिसमें सरपंच की अगुवाई में कुछ मौजिज आदमी उसे मनाते हैं। इस पर मांगेराम कहता है कि मेरे बैल बिक गये तो पंचायत कहती है आपको बैल दिलवा देंगें लेकिन वह कहता है कि अब खेत बैलों से नहीं जुतेगा तो पंचायत कहती है कि तो क्या लड़की के परिवार को जोत दें। मांगेराम कहता है हां तभी मैं इस शादी के लिये हां कर सकता हूं। अब लड़की का परिवार उसकी इस इच्छा को पूरी करता है या नहीं। तान्या और राजवीर का विवाह होता है या नहीं फिल्म का अंत क्या रहा यह जानने के लिये आप फिल्म को देखें।

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि कहानी में कुछ नया नहीं है। वही पटकथा है जो हम हरियाणा में आम तौर पर देखते हैं। अक्सर देखते हैं कि इज्जत लड़की से जोड़कर देखी जाती है लेकिन इस फिल्म के जरिये इस सत्य को भी दिखाने की कोशिश की है कि इज्जत हमेशा गरीब की खतरे में होती है। कहा भी जाता है कि ‘गरीब आदमी की मर हो सै’ फिर लड़का हो उसका या लड़की। फिल्म बीच में कुछ कुछ जगहों पर थोड़ी धीमी है। बैकग्राऊंड म्यूजिक का प्रयोग क्यों नहीं किया गया यह समझ के बाहर है अगर होता तो फिल्म और भी ज्यादा प्रभावी होती। ठीक है ग्रामीण जीवन दिखाया है लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि फिल्म को बोरिंग ही कर दो। कॉलेज का जीवन कुछ ज्यादा ही अनुशासित रखने की कोशिश की है जो सच से थोड़ा दूर लगता है। हास्य फिल्म में न के बराबर है फिल्म पूर्ण रुप से गंभीर है। राजवीर के मां की भूमिका के रुप में बलजिंदर कौर का और पिता के रुप में रवि चौहान के अभिनय के आप कायल हो सकते हैं। फिल्म का एक गूंगा पात्र भी आपको प्रभावित कर सकता है। मांगेराम की तान्या की मां, पिता और भाई की भूमिका निभाने वाले कलाकार और बेहतर कर सकते थे। कुल मिलाकर इसे समानांतर सिनेमा ( आर्ट फिल्मों ) की पहली हरियाणवी फिल्म कहा जा सकता है। व्यावसायिक और मनोरंजक फिल्मों की श्रेणी में इसे रखना नादानी होगी। ग्रामीण जीवन के कुछ कुछ सीन बहुत ही अच्छे और भावुक हैं जिनके लिये मनोरंजन कर मुक्त इस फिल्म को देखा जा सकता है। फिल्म यथार्थ के करीब है लेकिन पूरा यथार्थ नहीं है इसकी उम्मीद करना भी बेमानी होगा।

 

फिल्म के एक दृश्य में बलजिंदर कौर

फिल्म के एक दृश्य में बलजिंदर कौर

क्यों नहीं आ रहे दर्शक

दर्शकों के सिनेमा तक न आने का मुख्य कारण पहला तो यह है कि पगड़ी फिल्म केवल चुनिंदा सिनेमा घरों में प्रदर्शित हो रही है। दूसरा शो भी बहुत कम है जिसमें गुड़गांव की ही बात करें तो डीटी सिनेमा के सभी सिनेमाहॉल में प्रात: दस बजे का समय है जो किसी भी तरह दर्शक के लिये सटीक नहीं है। सिनेमा हॉल में दर्शकों को आकर्षित करने वाली फिल्म से संबंधित कोई सामग्री नहीं है। ना फिल्म का कोई पोस्टर है ना कुछ और शो टाइम पट्टिका भी लगता है शरमाते हुए प्रदर्शित कर रहे हैं। एक कारण यह भी है कि फिल्म के बारे में पूर्व धारणा भी लोगों ने बना ली है कि यह ऑनर किलिंग की फिल्म है और रुढीवादी परंपराओं का समर्थन करने वाली है। दूसरा हो सकता है हरियाणा में हुए जाट आंदोलन के बाद लोगों को सिनेमा जाना अभी अच्छा नहीं लग रहा हो लेकिन यह धारणा गलत ही कहूंगा चूंकि बाकि फिल्में तो धड़ल्ले से अच्छी कमाई कर रही है। हरियाणा खास की राय है कि फिल्म देखने लायक तो है। आपको ज्यादा खुशी नहीं तो देखने बाद ज्यादा निराशा भी नहीं होगी। हां इतना आप जरुर सोचेंगें कि इज्जत के नाम पर आदमी शोषण सह लेता है लेकिन उसकी समझौतावादी प्रकृति उसे विरोध करने से रोकती है।

‘पगड़ी द ऑनर’ – पूरे सिनेमा हॉल में मात्र दो दर्शक Reviewed by on . अपनी रीलिज से पहले पगड़ी कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुकी है। फिल्म से जुड़े निर्माता निर्देशक से लेकर कलाकारों तक फिल्म को मिले पुरस्कार अपनी रीलिज से पहले पगड़ी कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुकी है। फिल्म से जुड़े निर्माता निर्देशक से लेकर कलाकारों तक फिल्म को मिले पुरस्कार Rating: 0

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