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विलक्षण प्रतिभा के धनी थे भारतेंदु हरिश्चंद्र

January 6, 2018 9:54 am by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

हिंदी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल का आरंभ जिस विलक्षण प्रतिभा के धनी साहित्यकार के ज़िक्र से शुरू होता है, वह सुप्रसिद्ध चर्चित नाम है- भारतेंदु हरिश्चंद्र। एक ऐसे साहित्यकार जिन्हें सिर्फ साहित्यकार के दायरे में रखकर उनके विषय में चर्चा करना शायद उचित ना हो। वो भी आज के दिन जब ऐसे विलक्षण प्रतिभा ने अपनी जीवन यात्रा पूरी की हो। विलक्षण प्रतिभाओं का इस धरा पर आने का कोई खास मकसद ही होता है। जिसे पूरा करने के लिए ऐसी शख्सियतें अपनी संपूर्ण जीवन शक्ति समाज एवं साहित्य कल्याण में झोंक देती हैं। मात्र 34 वर्ष, 4 महीने जीवित रहे भारतेंदु ने इतने कम वर्षों में हिंदी साहित्य को जो रचनाएं दीं, वो अद्भुत ही नहीं , बल्कि इतनी श्रेयस्कर हैं कि भारतेंदु की गणना सदैव आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक के रूप में होती रहेगी।

भारतेंदु की विलक्षणता इस बात से भी साबित होती है कि उन्हें एक सफल कवि, नाटककार, व्यंग्यकार, निबंधकार, समालोचक, संपादक, पत्रकार, समाजसुधारक, देशभक्त एवं पथप्रदर्शक के रूप में देखा जाता है। निडर और निर्भीक उतने ही कि अंग्रेजों के खिलाफ अपनी कलम चलाने से कभी पीछे नहीं हटे। फिर चाहे उनका नाटक ‘अंधेर नगरी’ हो या भारत दुर्दशा। ये उसमें ब्रिटिश शासकों की दमनकारी नीतियों का विरोध अपने चिरपरिचित हास्य और व्यंग्य अंदाज़ में करते हैं।

यथा- “अंधाधुंध मच्यौ सब देसा, मानहु राजा रहत विदेसा।”

या फिर ये लिखते हुए-

“चना साहेब लोग जो खाता, सारा हिंद हज़म कर पाता।

चना पुलिस वाले खाते, सब कानून हज़म कर जाते।”

तत्कालीन व्यवस्था पर जमकर व्यंग्य करने वाले वाले इस साहित्यकार ने कुल 175 मौलिक एवं अनूदित ग्रंथों की रचना की और 75 ग्रन्थों का संपादन किया। इनकी प्रसिद्ध पत्रिकाएं कविवचन सुधा (1867), हरिश्चंद मैगज़ीन (1873) को कैसे भुलाया जा सकता है। इन पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी भाषा का परिष्कार करने के साथ-साथ खड़ी बोली हिंदी गद्य को व्यवस्थित स्वरूप देकर उसे जनजीवन तक पहुंचा दिया। साथ ही सामाजिक कुरीतियों जैसे विधवा विवाह, भ्रूण हत्या, बाल विवाह को दूर करने का भी बीड़ा उठाया।

काशी के सुप्रसिद्ध सेठ परिवार में जन्में भारतेंदु को ये विलक्षण संस्कार उन्हें पिता श्गोपालचंद वैष्णव से मिले, जो उच्चकोटि के कवि थे। इनके पूर्वजों का संबंध दिल्ली के शाही घराने से था। पांच वर्ष की आयु में मातृप्रेम से वंचित अबोध बालक की काव्य प्रतिभा देख पिता दंग रह गए, जब भारतेंदु ने ये दोहा रचा-

“ले व्योंडा  ठाढे भय श्री अनिरुद्ध सुजान, बाणासुर की सैन को, हनन लगे बलवान।”

ऐसे व्यक्तित्व को केवल उनकी पुण्यतिथि पर याद ही नहीं, बल्कि उनकी रचनाओं का पठन-पाठन होना चाहिए। स्मरण आनी चाहिए उनकी रचना ‘दुर्लभ बंधु’, जो हिंदी अनुवाद है शेक्सपीयर के नाटक मर्चेन्ट ऑफ वेनिस का। या फिर नाटक मुद्राराक्षस, नीलदेवी, भारत दुर्दशा, भारत जननी, अंधेर नगरी, पाखंड विखंडन, कर्पूमंजरी, प्रेमजोगिनी, सती प्रलाप, विद्यासुन्दर या फिर उनकी  श्रेष्ठ कविताएं प्रेमप्रलाप, फूलों का गुच्छा, प्रेममाधुरी, प्रेमफुलवारी, प्रेममालिका या बंदरसभा।

रंगमंच की बात करें तो ये स्वयं रंगमंच के मंझे हुए कलाकार और अभिनेता थे, जिन्होंने रंगमंच की उपयोगिता और उपादेयता को समझते हुए मृतप्रायः नाट्यकला को फिर से जीवित किया। ऐसे हिंदी नाटक के प्रवर्तक नवयुग के अग्रदूत, महान साहित्यकार, विलक्षण व्यक्ति बिना मकसद जन्म नहीं लेते। यह तो सर्वथा सच है। हिंदी साहित्य उन्हें नमन करता है और सदैव ऋणी रहेगा ऐसे साहित्यकारों का।

लेखक परिचय 

लेखिका डॉ. गीतू ‘गीत’ फतेहाबाद के मनोहर मैमोरियल स्नातकोत्तर महाविद्यालय में बतौर सहायक प्रोफेसर (हिंदी) अपनी सेवाएं दे रही हैं। वे दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं दैनिक भास्कर में भी काम कर चुकी हैं। विभिन्न समाचारपत्र, पत्रिकाओं में समय-समय इनकी कविताएँ एवं लेख प्रकाशित होते रहे हैं, इंटरनेशनल एवं नेशनल रिसर्च जर्नल्स में अनेक शोध-पत्र भी छपे हैं। हिंदी ‘साहित्यिक पत्रकारिता का बदलता स्वरूप’ नाम से इनका शोध ग्रन्थ भी प्रकाशित हो चुका है। बीते स्वतंत्रता दिवस पर शैक्षणिक, सामाजिक, एवं साहित्यिक क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने हेतु फतेहाबाद ज़िला प्रशासन की ओर से उन्हें सम्मानित किया गया। इसके अलावा भी सांस्कृतिक गतिविधियों के अंतर्गत भी वे कई सम्मान पा चुकीं हैं।

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