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हरियाणवी कविता – थूल्ली

परपंरागत खेलों का स्मरण कराती जगदीप सिंह की हरियाणवी कविता

May 12, 2016 6:19 pm by: Category: धरोहर खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

Traditional Games

खेल्या हामनै डंडा सौलिया
कदे बगाई लाल मैं गुल्ली
लुकमी चाई, पकड़म पकड़ाई
भाजे-रूकगे फेर खाई थुली….

शक्कर भीजी, नुणियां घण्टी
फिटो, घूते, कदे गुलर बरबंटी
बिजो, बरफी, राम के खाने
कदे मारकाट मैं गिंडी खुली
फेर खाई हामनै थूल्ली……

काट कटंबर-लोहा लंबर,
उंच-नीच कदे तोता मैना उड़
भाजण की ज्यब बारी आई
चप्पल कोहणियां तक बांह मैं चंढाई
टाप गेर मैं भाज रहे थे
चाली कांकर अर सांस भी फूली
जोटा लाया खा कै थूली….

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खेले बणा बणा कै टोली
खुड़काए अंटे, कंचे गोली
टोरड़ा मिज्जी, चीढा चारी
डला लकोई, लीख काढणी
दाई धमोकड़ा, बौड़ कुआ
कई बात की लागी भूली
थूल्ली थूल्ली …….

कोरड़ा गुलाब श्याही देखनिये की शामत आइ
घोड़ी आले घोड़ी आले तेरी घोड़ी कै की
सौ की …और घटै ले अस्सी की
घूंट भर ले खाटी लास्सी की…..
लंगड़ी टंगड़ी, लितर पंखी
बाबू आग्या ओए तीतर पंखी
मार पड़ैगी खुल्लम खुल्ली
इनकै धोरै चालै कोनी, बेटे खा लिये कितनी थूल्ली…..

हरियाणवी कविता – थूल्ली Reviewed by on . खेल्या हामनै डंडा सौलिया कदे बगाई लाल मैं गुल्ली लुकमी चाई, पकड़म पकड़ाई भाजे-रूकगे फेर खाई थुली.... शक्कर भीजी, नुणियां घण्टी फिटो, घूते, कदे गुलर बरबंटी बिजो, ब खेल्या हामनै डंडा सौलिया कदे बगाई लाल मैं गुल्ली लुकमी चाई, पकड़म पकड़ाई भाजे-रूकगे फेर खाई थुली.... शक्कर भीजी, नुणियां घण्टी फिटो, घूते, कदे गुलर बरबंटी बिजो, ब Rating: 0

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