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2 सितंबर हड़तालः न्यूनतम मजदूरी पर सरकार कर रही धोखा !

September 1, 2016 11:43 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

2 sept hadtaal

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्‍सा मांगेंगे

इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे

फैज अहमद फैज मजदूरों के हित में ये नारे जैसी गजल लिख तो गए मगर बदकिस्मती देखिए कि मजदूर तब से आज तक दुनियां से सिर्फ मांग ही रहे हैं। उनके हिस्से में दुनिया, देश और खेत तो दूर की बात… अब तक दो जून की रोटी के लायक मेहनताना भी मंजूर नहीं हुआ। हर साल मजदूर संगठनों के आह्वान पर लाखों की संख्या में मजदूर मुट्ठी बंद कर सड़कों पर उतरते हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। सरकार संभावित आक्रोश को देखकर कुछ घोषणाओं से शिगूफा भी छेड़ देती है जिससे मजदूर असमंजस में पड़ जाता है। शायद इसमें कोई दो राय नहीं कि मेहनत और मजदूरी करके पेट पालने वालों के साथ खिलवाड़ अब सरकारों के लिए खेल बन गया है।

सीटू के राज्य कोषाध्यक्ष सुखबीर सिंह और कार्यकारी प्रधान विनोद कुमार ने एक प्रैस बयान में कहा है कि  ‘न्यूनतम मजदूरी आदि पर सरकार की घोषणा एक मजाक और धोखा है जिसका 2 सितंबर 2016 को बड़े पैमाने पर हड़ताल के माध्यम से मुकाबला किया जायेगा।‘ उनके मुताबिक मंत्रियों के एक समूह ने केंद्रीय वित्त मंत्री की अध्यक्षता में श्री अरुण जेटली, और श्रम मंत्री, पेट्रोलियम मंत्री और ऊर्जा मंत्री आदि ने एक प्रेस सम्मेलन को सम्बोधित करते हुये कहा कि मजदूर संगठनों की सभी मांगे मान ली गई हैं व न्यूनतम मजदूरी 350 रू प्रतिदिन की घोषणा की है। आपको बता दें कि यही मजदूरी अलग-अलग मजदूर संगठनों द्वारा मजाक बताई जा रही है।

कैसे है मजदूरों के साथ धोखा  

सीटू कार्यकारी प्रधान की ओर से जारी प्रेस बयान के अनुसार कहा गया है कि ये मजदूरी दर मजदूरों के साथ मजाक है। उन्होनें बताया कि पहले सातवें वेतन आयोग ने 18000 रू मासिक न्यूनतम मजदूरी की सिफारिस की है ऐसे में वित्त मंत्री द्वारा यह घोषणा मजदूरों के साथ छलावे के अलावा और कुछ नहीं है। इतना ही नहीं सरकार के मंत्रियों के समूह द्वारा भारतीय मजदूर संघ के साथ वार्ता करना और उसके बाद बी एम एस द्वारा हड़ताल ना करने की घोषणा मजदूरों के साथ सरासर धोखा है।

आक्रोश में है देशभर के मजदूर

सरकार के द्वारा इस तरह की बैठक किए जाने के उपरांत बी एम एस तो हड़ताल में शामिल ही नहीं है। ऐसे में उसके द्वारा हड़ताल ना करना बाकि मजदूरों के साथ दगाबाजी मानी जा रही है। जिसे लेकर आक्रोशित देशभर के मजदूर इसके बदले के रूप में 2 सितम्बर की हड़ताल करेंगे।

…और क्या बोले मंत्री !

वहीं इसके साथ-साथ आंगनवाड़ी, मिड-डे-मील, आशा योजना के श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी के अधिकार के बारे में संवाददाता सम्मेलन में पूछे जाने पर वित्त मंत्री ने कहा कि इस योजना के तहत काम करने वाले श्रमिक नहीं बल्कि स्वयंसेवक और कार्यकर्ता हैं। जबकि 46 वें भारतीय श्रम सम्मेलन की सिफारिसें इन्हें न्यूनतम मजदूरी देने व मजदूर का दर्जा दिये जाने की है। उधर सीटू भी इस मांग को मजबुती के साथ दोहराती रही है । मंत्री ने आगे कहा कि इस योजना के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा लाभ के लिए एक समिति का गठन किया है । लगभग एक ही बयान एक वर्ष पहले दिया गया था जो कि 2015 की आम हड़ताल से पहले का है, लेकिन अभी तक उसे लेकर कोई कदम नहीं उठाया गया।

2 सितंबर की व्यापक हड़ताल

हकीकत में, मजदूरों की मांगों की मांगो पर संवाददाता सम्मेलन में सरकार की घोषणा का अगर मजदूरों से मूल्यांकन करवाया जाए तो सच में वह उनके साथ धोखा ही साबित होगी। इसे लेकर सीटू का कहना है कि सीटू व तमाम श्रमिक संगठन 18000 रू मासिक न्यूनतम मजदूरी की मांग पर अडिग है और 2 सितम्बर को देशव्यापी हड़ताल करेगे । हड़ताल की तैयारियां पूरी की जा चुकी है और इसे लेकर हरियाणा में लाखो मजदूर और कर्मचारी हड़ताल में शामिल होगें।

क्या है मुख्य मांगे

आपको बता दें कि महंगाई पर रोक, 18000 रू मासिक न्यूनतम वेतन, सभी श्रम कानून लागू करवाने व श्रम कानूनों में मालिकपरस्त संसोधन वापिस किए जाने, ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमले बंद किए जाने, आंगनबाड़ी, आशा, मिड डे मिल वर्करों, ग्रामीण चौकीदारों, वन मजदूरों, सफाई कर्मचारियों सहित सभी कच्चे कर्मचारियों को पक्का करवाने, सभी निर्माण मजदूरों का बोर्ड में पंजीकरण व समय पर सुविधाएं तथा सुविधाओं की बकाया राशी जारी करवाने व उन पर लगी बेमानी शर्ते हटवाने, मनरेगा के तहत साल भर काम व समय पर भुगतान तथा दिहाड़ी 600 रू किए जाने, हटाई गई आंगनबाड़ी, आशा, मिड डे मील,ग्रामीण चौकीदारों को दोबारा काम पर लेने व सबके लिए सस्ते राशन के गारंटी, बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य तथा स्वामीनाथन रिर्पोट लागू करवाने, 45 दिन में यूनियन पंजीकरण की गारंटी, असंगठित क्षेत्र के सभी मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा दिए जाना आदि इनकी प्रमुख मांगे हैं।

कहा जाता है कि ताजमहल खड़ा करने वालों के हाथ काट दिए जाते हैं। शायद इसमें कोई दो राय नहीं मेहनत और मजदूरी करने वाले, मीनारें खड़ी करने वालों को भी अक्सर कच्ची छतों के नीचे सोते हुए देखा जाता रहा है। महंगाई के इस दौर में एक ओर जब विधान और लोकसभाओं में इन मेहनतकशों द्वारा चुने गए नेता अपने वेतन और भत्ते 60 से 80 फिसदी तक बढ़ा देते हैं, वहीं दूसरी ओर न्यूनतम मजदूरी तय करने को लेकर इन नेताओं के माथे पर पेशानियां पड़ जाती है।

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