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आम आदमी और राज्यसभा

सब ईमानदार बनिये। ईमानदार न बन पाओ तो बनिये जरूर बनिये ईमानदारी देर सवेर आ ही जानी है।

January 4, 2018 9:24 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

आम आदमी और राज्यसभा

श्रीमती सुनीता केजरीवाल के साथ जो अन्याय हुआ उसके लिये मुझे हार्दिक अफसोस है। वो तो हर लिहाज से काबिल थी। उनके पति कितने बड़े समाजसेवी हैं और वो खुद भी आई. ऐ. एस.  है।

कभी कभी इंसान से इतनी बड़ी गलती भी हो जाती है। बाकी कुमार विश्वास की अपील में विश्वास कम उत्साह ज्यादा था। वो तो विकटो के सामने पकड़े जा चुके थे खामखाह अपना रिव्यु खराब किया आगे काम आ सकता था।

उनके लिये तो दिल्ली के एक बड़े शायर का शेर याद आ रहा है ध्यान से सुनियेगा

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि, हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले

आशुतोष भी शायद गुप्ता ही थे वो कैसे रह गए मनीष जाने। सुना एक चार्टर्ड अकाउंटेंट भी है । सच कहा है कहने वालों ने कि ईमानदारी से दुनिया खाली नही हुई है बस ढूंढने वालों की कमी है। कोई सुशील गुप्ता भी है राज्य सभा जाने वालों में।

उसके बारें में कहा जा रहा है कि इतना दान करता है कि सामने वाला कह उठता है बस कर बाबा। वैसे भी बनियों के दान की महिमा तो हर गली चौराहे पर लिखी हुई है। कई बार तो मुझे लगने लगता है कि अगर भारत में बनिये न होते तो कितने लोग भूखे मरते

भारत में रॉबिन हुड पैदा होता तो पक्का बनियों में ही पैदा होता। जाने कहाँ से इतने पैसे आते है कि गरीबों के लिये मंदिर तक बनवा देते है और फिर जाने उस मंदिर में जो गरीब पैसे देते है वो कहाँ जाते है यहाँ तो बचपन से घर के मंदिर पर ही निगाह रहती थी कि एक आध रुपया पड़ा हो तो उठा के कॉमिक्स पढ़ आये ये रुपये तो कुत्ते भी नही खाते तो भगवान के भी क्या ही काम आने है। 

खैर भगवान की माया भगवान ही जाने पर मैं तो केजरीवाल के हुनर और मेहनत का कायल हूँ वहाँ-वहाँ से ईमानदार ढूंढ निकाले है जहाँ कोई सपने में भी नही सोच सकता। ईमानदारी के साथ दिक्कत यही है तभी किसी को मिल नही पाती जहाँ कोई सोच नही पाता वहीं निकलती है।

खैर सभी ईमानदारों को राज्यसभा मुबारक। सब ईमानदार बनिये। ईमानदार न बन पाओ तो बनिये जरूर बनिये ईमानदारी देर सवेर आ ही जानी है।

वैसे कुमार भाई को ज्यादा निराश होने की जरूरत नही है एक बार बशीर बद्र साहब को भी ऐसे ही किसी मकान में जाने से रोक दिया गया था तो उन्होंने उस मकान के पार्क पर डेरा डाल कर ऐलान कर दिया था।

मकाँ से क्या मुझे लेना मकाँ तुमको मुबारक हो 
मगर ये घास वाला रेशमी कालीन मेरा है

आप भी संसद वाले पार्क पर जम जाइये आप जहाँ होंगे वहाँ वैसे भी संसद से ज्यादा लोग इकट्ठे हो जाने है ।

अमोल सरोज

लेखक परिचय – अमोल सरोज हरियाणा के हिसार में रहते है। लेखन व सामाजिक कार्यो में रूची रखते है। 

नोट:- प्रस्तुत व्यंग में दिये गये विचार या जानकारियों की पुष्टि हरियाणा खास नहीं करता है। यह लेखक के अपने विचार हैं जिन्हें यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। व्यंग के किसी भी अंश के लिये हरियाणा खास उत्तरदायी नहीं है

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