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बंसत की बयार, आंदोलनों की मार

February 7, 2017 10:09 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

लो, बंसत आई…. फूलों की डाली लाई…. सब तरफ खिले फूल ही फूल पर देश पर तो आंदोलनों की भरमार ही भरमार है। अपने हरियाणा को ले लो। महाराष्ट्र की ओर चले तो वहां मराठा आंदोलन चरम पर पहंच चुका है। अपने देश को विविधताओं का देश कहा जाता है। अभी गणतंत्र दिवस पर इस बहुरंगी संस्कृतियों की झाकियां भी देखने को मिली। बचपन से ही हमें यह लेख लिखने के लिए पाठ्यक्रम में प्रश्न पत्र आता रहा। अब भी शायद बच्चों को इस बहुरंगी संस्कृति पर गर्व करने की सीख दी जाती हो। पर जो इस गर्व को लेकर बड़े हो चुके हैं, वे इसके विपरीत दृश्य देख रहे हैं और विश्वास नहीं कर पाते कि यह क्या हो रहा है? क्यो हो रहा है? कब तक होता रहेगा?

                हमारे कवि मंचों पर कहते हैं कि यह अपना ही राष्ट्र है, जिसमें राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र है। यह अपना ही देश है जिनमें नगरों के आगे भी श्री लगाते हैं, जैसे श्रीनगर और श्रीगंगानगर। यह अपना ही देश है जिसमें पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा सब को जोड़ा जाता है। पर इसी देश में मराठा मानुस आंदोलन में बाहरी राज्यों में आए लोगों को पीटा जाता है। यह अपना ही देश है जिसमें गुजरात है और गुजरात में पाटीदार आंदोलन की राह पर हैं। छह माह का तड़ीपार का हुकुम पूरा कर हार्दिक पटेल वापस गुजरात पहुंच चुका है आंनदीबेन को मुख्यमंत्री की कुर्सी पाटीदार आंदोलन के चलते गंवानी पड़ी तो पिछले वर्ष हरियाणा में हुए जाट आरक्षण ने एक बार तो खट्टर काका की कुर्सी डगमगा दी थी। वो तो मुख्यमंत्री की मोदी से पुरानी दोस्ती काम आ गई। काका ठाठ से कुर्सी पर डटे हुए हैं पर इस बार अगर आंदोलन पर पकड़ नहीं बनाई तो क्या पता, क्या हो जाए? इसलिए काका भी अलर्ट हैं, पुलिस भी मुस्तैद है और प्रशासन भी जाग रहा है। सबकी छुट्टिया रद्द हैं। फिर भी यशपाल मलिक कह रहे हैं कि भाजपा की खाट खड़ी कर देंगे। अरे, कांगेस ने तो खुद ही युपी में खाट यात्राओं में खाटें लुटवा दी, अब भाजपा की खाट खड़ी करने की बात क्यों। सूरजकुंड के मेले में भी खट्टर काका अपना वीडियो संदेश दे रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा कह रहे हैं कि समाज के ताने-बाने को बचाना सरकार की जिम्मेदारी है और भाईचारे को कायम रखने भी जिम्मेदारी है।

अब बताओ दुष्यंत कुमार के शब्दों में क्यों न कहें

कैसे-कैसे मंजर सामने आने लगे हैं,

गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।

खुद ही सोचिए यह कैसी बंसत है? कैसे-कैसे आंदोलन हैं? कहां-कहां आंदोलन हैं? गणतंत्र दिवस की झांकी और लोकतंत्र की झांकी में इतना फर्क क्यों हैं? आखिर पाटीदार, मराठा, जाट आरक्षण आंदोलन कब तक चलते रहेंगें और आम जनजीवन को प्रभावित करते रहेंगे? सरकारें इनके प्रति गंभीरता से वार्तालाप क्यों नहीं करतीं? पाटीदार और जाट आरक्षण आंदोलन पिछले वर्ष भी हुए, बातचीत भी हुई, फिर अमल क्यों नहीं हुआ? दोबारा आंदोलन की जरूरत क्यों हुई? अभी तक पिछले वर्ष की भरपाई नहीं हो सकी। मुश्किल से लोग संभल रहे हैं, जख्म भर रहे हैं, जनजीवन पटरी पर आने लगता है फिर आंदोलन की मार शुरू हो जाती हैं। आओ, बंसत में मैत्री, सद्भाव, भाईचारे के फूल खिलाएं।

लेखक परिचय

लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइश हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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