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अघोषित आर्थिक आपातकाल के मायने

November 16, 2016 10:10 am by: Category: खबर खास 1 Comment A+ / A-

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तय  तो  ये था  ज़ुल्म के  नाख़ून  काटे  जायेंगे

 लोग नन्ही तितलियों के  पर क़तर कर गये

कुँवर बेचैन

कितनी सटीक बैठती है ये 2 लाइने मौजूदा सरकार पर बीजेपी नरेंद्र मोदी की अगुआई में ये ही लाईन बोलकर तो सत्ता में आये थे। रामदेव बाबा ने भी तो यही वादा किया था कि अगर BJP सत्ता में आयी तो विदेशों में जमा (बाबा रामदेव के अनुसार 400 लाख करोड़) काला धन 100 दिन में वापिस लाएंगे। काला धन आने से भारत के प्रत्येक नागरिक के खाते में 15-15 लाख आ जायेंगे। वादे तो और भी बहुत किये थे इस सरकार ने लेकिन हम सिर्फ इस काले धन पर ही बात करेंगे। भारत की जनता, खासकर युवा जो गरीबी और बेरोजगारी से बहुत ज्यादा तंग था वो इस 15 लाख वाले वादे के जाल में फंस गया। वादा भी 100 दिन में पूरा करने का वादा। देश के आवाम के सामने पहली बार वादा पूरा करने का समय निर्धारित किया गया। फिर क्या था जनता ने BJP की मत पेटियो को अनुमान से ज्यादा भर दिया। सरकार बनी उसके बाद 10 दिन गुजरे, 20 दिन गुजरे, 100 दिन भी गुजर गए और गुजर गई 2.5 साल इन सालो में सरकार की वादा खिलाफी के खिलाफ आवाम में गुस्सा पनपने लगा, आवाम अपने आपको ठगा महसूस कर रहा था। सत्ता धारी पार्टी के नुमाइंदे मुँह छिपाते फिर रहे थे। तभी 8 नवम्बर को मोदी ने आर्थिक आपातकाल की घोषणा कर दी। आर्थिक आपातकाल जो सीधा-सीधा आम जनता के खिलाफ लागु किया गया एक जनविरोधी फैसला है। लेकिन मोदी ने अपने सम्बोधन में इस फैसले को ऐसे पेश किया कि ये आर्थिक आपातकाल अमीर लोगो को तबाह कर देगा। मेहनतकश आवाम जो लुटेरे पूंजीपतियों से नफरत करता है उसमें ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। उनको इस फैसले से महसूस हुआ की उनको लूटने वाले पूंजीपति, भ्र्ष्ट नोकरशाह को अब मिटना पड़ेगा। लेकिन फैसले के अगले दिन से ही मेहनतकश आवाम हजारो की तादात में बैंको के आगे अपनी मेहनत की कमाई को सफेद करवाने के लिए भूखा प्यासा खड़ा है। वही दुसरी तरफ लुटेरा पूंजीपति, नोकरशाह इस योजना का ब्रांड एम्बेस्टर बना हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि देश के बड़े पूँजीपति, नोकरशाह,  फिल्मी अभिनेताओं में काले धन पर इस तथाकथित “सर्जिकल स्ट्राइक” से कोई बेचैनी या खलबली नहीं दिखायी दे रही है। जिनके पास काला धन होने की सबसे ज़्यादा सम्भावना है उनमे से कोई बैंकों की कतारों में धक्के खाता नहीं दिख रहा है। उल्टे वे सरकार के इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं। वही इस फैसले से अब तक 20 आम गरीब लोग मर चुके है। लेकिन क्या किसी काले धन रखने वाले चोर की मौत हुई है। ऊपर से काला धन रखने वाले इस आर्थिक आपातकाल के पक्ष में उपदेश दे रहे है।

वहीं देश का मजदूर किसान बहुत ज्यादा दुःखी है। क्योंकि अभी-अभी किसान को फसल का रुपया मिला है। उसने बच्चों की शादी की प्लांनिग की हुई है। शादियों कि डेट निकलवाई हुई है। नया मकान बनाने के लिए पुराना मकान तोडा हुआ है। ऐसे 100 काम है।  ऐसे ही खेत मजदूर जिसको फसल कटाई से लेकर ढुलाई तक का रुपया मिलना था वो नही मिला है जिस कारण उसको 2 वक्त की रोटी के लाले पड़े हुए है इसलिए वो भी बहुत परेशान है। बंगाल से खबर है कि नकदी की कमी से उत्तर बंगाल में 5 लाख मजदूरों को दैनिक-साप्ताहिक वेतन नहीं मिल पाया। ऐसी ही स्थिति देश के अनेक इलाकों में है, अस्पतालों में मरीजों का इलाज नहीं हो  पा रहा, बाज़ार बन्द पड़े है।

 

इस फैसले के पीछे राज क्या है

मोदी सरकार जब आज देश की जनता के सामने अपने झूठे वायदों, बेतहाशा महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी और किसान-मजदूर आबादी की भयंकर लूट, दमन, दलितों, अल्पसंख्यकों पर हमले तथा अपनी सांप्रदायिक फासिस्ट नीतियों के कारण अपनी जमीन खो चुकी है तब फिर एक बार नोट बंद कर कालेधन के जुमले के बहाने अपने को देशभक्त सिद्ध करने की कोशिश कर रही है।

काले धन की असलियत

देश में काले धन का सिर्फ़ 6 प्रतिशत नगदी के रूप में है । आज कालेधन का अधिकतम हिस्सा रियल स्टेट, विदेशों में जमा धन और सोने की खरीद आदि में लगता है। कालाधन भी सफेद धन की तरह बाजार में घूमता रहता है और इसका मालिक उसे लगातार बढ़ाने की फिराक में रहता है।

आज देश की 90 फीसदी सम्पत्ति महज 10 फीसदी लोगों के पास है और इसमें से आधे से अधिक सम्पत्ति महज एक फीसदी लोगों के पास है। यह देश के मेहनत और कुदरत की बेतहाशा लूट से ही सम्भव हुआ है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद इसमें बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है। काला धन खत्म करने के वादे और अभियान के शोर के बीच देश से करोड़ों डॉलर की रकम विदेश भेज दी गई है। विदेशों में उपहार, दान, चिकित्सा, स्वयंसेवी संगठनों द्वारा परोपकारी कार्य, शिक्षा और अन्य कई मदों के बहाने करोड़ों रुपए बाहर भिजवाने में सत्ता में बैठी कोई सरकार पीछे नहीं रही। न तो यूपीए के जमाने की मनमोहन सिंह सरकार और न ही मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार।

काला धन को खत्म करने के इस हल्लाबोल के बीच रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का एक दस्तावेज केंद्र में सत्ता पर काबिज लोगों की नीयत पर सवाल उठा रहा है। मौजूदा वित्त वर्ष में अभी तक की अवधि में ही 4.6 बिलियन डॉलर की रकम विभिन्न दस्तावेजों की आड़ में बाहर भेज दी गई है। मोदी सरकार के काले धन की नौटंकी का पर्दा इसी से साफ हो जाता है जब मई 2014 में सत्ता में आने के बाद जून 2014 में ही विदेशों में भेजे जाने वाले पैसे की प्रतिव्यक्ति सीमा 75,000 डॉलर से बढ़ाकर 1,25,000 डॉलर कर दिया और जो अब 2,50,000 डॉलर है।

   आज देश में मौजूद कुल 500 और 1000 की नोटों का मूल्य 14.18 लाख करोड़ है जो देश में मौजूद कुल काले धन का महज 3 फीसदी है। जिसमें जाली नोटों की संख्या सरकारी संस्थान ‘राष्ट्रीय सांख्यकीय संस्थान’ के अनुसार मात्र 400 करोड़ है। अगर एकबारगी मान भी लिया जाय कि देश में मौजूद इन सारी नोटों का आधा काला धन है (जो कि है नहीं) तो भी डेढ़ फीसदी से अधिक काले धन पर अंकुश नहीं लग सकता। दूसरी तरफ जिन पाकिस्तानी नकली नोटों की बात कर मोदी सरकार लोगों को गुमराह कर रही है वह तो 400 करोड़ ही है जो आधा फीसदी भी नहीं है। दूसरे, सरकार ने 2000 के नये नोट निकाले हैं जिससे आने वाले दिनों में भ्रष्टाचार और काला धन 1000 के  नोटों की तुलना में और बढ़ेगा।

इस पुरे मामले पर मुझे एक कहानी याद रही है

किसी गाँव मेँ एक आदमी कब्रिस्तान में कब्रें खोद कर मुर्दों के शरीर से कपड़े आभूषण वगैरह चुराया करता था. लोग हजार तरीके अपनाते पहरेदारियाँ करते मगर वो चोर मौका लगते ही कब्रों को लूट लिया करता था. गाँव तो गाँव आसपास के कई कस्बे और शहरों में भी उसका खौफ था. लोग अपनी तरफ से पूरी कोशिशें करते और चोर अपनी तरफ से. इसी तरह दिन बीतते रहे. और एक दिन चोर का अंतिम समय भी आ गया. उसने अपने पुत्र को बुलाया और कहा कि बेटा मेरी आखिरी इच्छा है कि मरने के बाद लोग मुझे अच्छे इंसान के रुप में याद करें. ये कहकर वो मर गया और लोगों ने चैन की साँस ली कि चलो बला टली.

अब गाँव में फिर कोई मौत हुई मगर ये क्या इस बार तो न केवल कब्र लूटी गई बल्कि मुर्दे को पेड़ से उल्टा लटका दिया गया था. गाँव वाले परेशान. तहकीकात पर पता चला कि ये कुकर्म चोर के बेटे ने किया था. अब तो पहले से भी ज्यादा बुरा हाल हो गया. आये दिन दफनाने के बाद कब्रों से निकाल कर मुर्दे नग्न हालत में पेड़ों पर उल्टे लटके मिलने लगे. हर तरफ हर कोई बस एक ही बात कहता कि इससे तो वो चोर भला था जो केवल कब्र लूटा करता था मुर्दों की बेइज्जती तो नहीं करता था। मतलब पिछली सरकार चोर तो ये सरकार महाचोर।

       इसलिए मेरे मेहनतकश साथियों मोदी सरकार के इस जनविरोधी फैसले का डट कर विरोध कीजिये और मोदी सरकार पर स्विश बैंक के उन काले धन वाले खाता धारकों के नाम उजाकर करने और उस सम्पति को सरकारी घोषित करने का दबाव बनाइये, बैंको के उन 86 खाता धारकों का नाम उजाकर करने और उनसे रुपया वापिस लेने का दबाव बनाइये जिन्होंने देश के बैंको को दिवालिया होने के कागार पर ला खड़ा किया है। बैंको के 9 हजार करोड़ हजम करने वाले विजय माल्या को आपकी सरकार ने बड़ी ही सुरक्षा के साथ देश से बाहर सुरक्षित जगह पर जाने दिया उसको वापिस  लाकर जेल में डाला जाए व 9 हजार करोड़ की ब्याज सहित वापसी सरकार माल्या से करे। इसको लेकर एकजुट हो दबाव बनाए। एकजुट होकर, इस जनविरोधी फैसले का और नाटकबाज का मजबूती से मुकाबला कीजिये।

uday-che

लेखक परिचय

उदय चे ( लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। पेशे से चालक उदय हांसी (हिसार) के निवासी हैं)

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Comments (1)

  • संदीप कश्यप

    बहुत बढ़िया उदय भाई बहुत अच्छा लेख है

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