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जब मन करे तो गाना, इस्तीफा मत देना

December 19, 2016 9:57 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

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एक विज्ञापन है मोबाइल कंपनी का- जब हंस पड़े तो गाना, जब रो पड़े तो गाना, जब मन करे तो गाना। हंसने- रोने या मन करने पर गाना हजम होता है, पर संसद के शीतकालीन सत्र के हंगामे की भेंट चढ़ जाने पर इस्तीफा देने का मन करे, यह बात किसे हजम होगी?  किसे भाएगी? पर हमारे वयोवृद्ध नेता व एक समय रथ यात्राओं के माध्यम से भाजपा को सत्ता तक खींच लाने वाले लालकृष्ण आडवाणी का मन कर रहा है कि ऐसी संसद में रहने से तो अच्छा है, सदस्यता से इस्तीफा ही दे दूं। शीतकालीन सत्र के हंगामे की भेंट चढ़ जाने से वयोवृद्ध नेता आडवाणी बेहद दुखी हैं। इससे पहले भी आडवाणी अपना गुस्सा जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने एक अधिकारी को कह दिया था कि अनिश्चितकाल के लिए लोकसभा को स्थगित क्यों नहीं कर देते? आडवाणी ने बड़े दुखी मन से कहा कि यदि ऐसे ही हंगामे के बीच सदन स्थगित हो गया तो संसद हार जाएगी और हम सबकी बहुत बदनामी होगी। आडवाणी का कहना है कि सबको यही लगी है कि मैं जीतूं, मैं जीतूं लेकिन इससे संसद तो हार जाएगी।

हालांकि इसके बाद भी राज्यसभा और लोकसभा के कल के सदन में शोर-शराबा ही हुआ। इस पूरे शीतकालीन सत्र में दिव्यांगों के पक्ष में एक ही बिल पारित हो पाया, जिसमें तेजाब फेंकें जाने से पीडि़त लोगों को भी शामिल किया गया। बस, करोड़ों रुपए की बर्बादी के बाद यही एक उपलब्धि मानी जा सकती है। आडवाणी के इस तरह आहत हो जाने पर भी कांग्रेस और भाजपा में से किसी ने भी गलती नहीं मानी, बल्कि एक-दूसरे पर ही सदन न चलने देने का ठीकरा भोड़ दिया। राहुल गांधी ने तो यहां तक कह दिया कि आडवाणी अपनी पार्टी के भीतर ही लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लड़ रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा नेता वेंकैया नायडू ने कहा कि कांग्रेस असल मुद्दों से ध्यान हटवाने के लिए बेबुनियाद आरोप लगाकर सदन से भाग खड़े होने की रणनीति अपना रही है। कल भाजपा अगस्ता वेस्टलैंड का मुद्दा उठा रही थी तो कांग्रेस केंद्रीय मंत्री किरण रिजीजू के घोटाले के मुद्दे को। इन मुद्दों पर हंगामा चलते रहने से आखिरकार राज्यसभा और लोकसभा दोनों सदन ठप हो गए। आडवाणी की लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की पुकार किसी ने नहीं सुनी। न भाजपा बदली, न ही कांग्रेस ने अपनी रणनीति में बदलाव किया। यह भी याद होगा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी लोकसभा के इस सत्र की कार्रवाई से बुरी तरह आहत हैं। इस तरह संसद में फिर से लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना कैसे हो, इसे लेकर वे दोनों नेता चिंतित हैं। पर आडवाणी के शब्दों में ही- मैं जीतूं, मैं जीतूं के चक्कर में उनकी पुकार कोई नहीं सुन रहा। कहीं ऐसा न हो कि सचमुच एक दिन लालकृष्ण आडवाणी अपने मन की बात सुनते हुए इस्तीफा देने की घोषणा कर ही डालें। पर हम तो यही कहेंगे कि मन के मते न चलिए, मन के मते अनेक। मन का क्या है, यह तो बहुत कुछ कहता है, बहुत कुछ मांगता है, इसकी इच्छाएं कभी पूरी नहीं होती। इसकी इच्छाएं अनंत हैं। इसके पीछे क्या भागना?

वैसे भी ज्योतिष की बात माने तो अब शुभ कार्य एक महीने बाद ही हो पाएंगे। अब एक माह तक शादी-ब्याह, गृह प्रवेश आदि मांगलिक कार्य नहीं होंगे। संसद वैसे भी ठप होते-होते आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुकी। जितना अमंगल होना था हो चुका। वैसे राहुल गांधी ने एक प्रतिनिधिमंडल के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात कर किसानों के कर्ज माफ करने की मांग की। मतलब साफ है कि यूपी में किसानों के साथ खाट सभाओं के बाद यह राहुल गांधी का अगला कदम है, जबकि 428 बाइक्स की खरीद को प्रचार के लिए खरीदने पर भाजपा को मायावती घेर रही है। इन बाइक्स को खरीदने का पैसा कहां से आया? पर असल मुद्दा तो लोकसभा की मर्यादापूर्ण कार्यवाही है। दुआ करो कि आगे मंगल ही मंगल हो।

लोकसभा से करोड़ों लोगों की उम्मीदें धरी की धरी रह गईं। गालिब के शब्दों में:-

बहुत शोर सुनते थे पहलू में उनका,

मगर जब काटा तो कतरा एक खून न निकला

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लेखक परिचय

लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइश हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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