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ऐ दिल है मुश्किल बस 5 करोड़ की

October 24, 2016 10:12 am by: Category: खबर खास, मनोरंजन खास 1 Comment A+ / A-

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फिल्म ऐ दिल है मुश्किलकी रिलीज को लेकर कल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे व प्रोड्यूसर्स गिल्ड के अध्यक्ष मुकेश भट्ट के बीच हुई लगभग एक घंटे तक चली बातचीत के बाद आखिरकार तीन शर्तों के साथ फिल्म की रिलीज की राह तो आसान हो गई पर एक नए सवाल को भी सामने ले आई। वह यह कि कितनी सस्ती हो गई देशभक्ति? यह सवाल सेना के ही लोग उठा रहे हैं। आम जनता भी पूछ रही है कि आर्मी के नाम पर ब्लैकमेलिंग क्यों? किसने यह अधिकार दिया राज ठाकरे को

 

पहले वे तीन शर्तें जान लीजिए, जिनके आधार पर तीन लोगों ने मिलकर ऐ दिल है मुश्किलफिल्म की रिलीज की राह एकदम आसान बना दी। करण जौहर को आर्मी वैलफेयर फंड में न केवल पांच करोड़ रुपए जमा करवाने होंगे बल्कि रक्षामंत्री को चेक सौंपने की फोटो भी दिखानी पड़ेगी। दूसरी शर्त यह है कि फिल्म की शुरूआत में पंद्रह सैकेंड में शहीद सैनिकों के प्रति सम्मान जताने वाला संदेश देना होगा और तीसरी शर्त यह है कि भविष्य में पाक कलाकारों को लेकर फिल्म नहीं बनाएंगे। इस प्रस्ताव की कॉपी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को भेजनी होगी। 

 

इन शर्तों पर लेफ्टिनेंट कर्नल विजय तोमर ने साफ-साफ सवाल उठाते हुए पूछा है कि सेना के नाम पर यह ब्लैक मेलिंग क्यों? सेना को मनसे ने आंदोलन से क्यों जोड़ा? पहले तो मनसे की चित्रपट शाखा बड़ी-बड़ी हांक रही थी कि दीपावली पर पटाखे बजेंगे। फिल्म चलाने वाले थियेटर मालिकों को तोड़-फोड़ की धमकी का ट्रेलर तक दिखा रहे थे। अब क्या हुआ? बस तीन शर्तों में सिमट गया आंदोलन और कितनी सस्ती हो गई देशभक्ति? पूर्व एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर भी पांच करोड़ की रकम को सेना के नाम पर फिरौती वसूल करने के समान कह रहे हैं।

 

सोशल मीडिया पर यह सवाल भी उठ रहा है कि सरकार और फिल्म रिलीज के बीच राज ठाकरे की शर्तें कैसे? और यह सवाल भी मनसे के राज ठाकरे से है कि पांच करोड़ रुपए की रकम देशभक्ति पर भारी कैसे? आंदोलन और राष्ट्रभक्ति मात्र पांच करोड़ रुपए तक कैसे सिमट कर रह गई? पूर्व केंद्रीय मंत्री और पत्रकार अरूण शौरी ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को कमजोर मुख्यमंत्री कहने में भी संकोच नहीं किया। मनसे से हुई इस तरह की सौदेबाजी के बाद सवाल यह भी उठता है कि सरकार मनसे को महत्व देकर शिवसेना को नीचा दिखाना चाहती है क्या? पंद्रह सैकेंड की शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि, सिर्फ उन फिल्मों के लिए ही शर्त क्यों, जिनमें पाक कलाकारों ने काम किया, सभी रिलीज होने वाली फिल्मों में क्यों नहीं? सिर्फ शहीदों के प्रति पंद्रह सैकेंड की श्रद्धांजलि? और अंत में एक बार फिर से जन-गण-मनकी शुरूआत क्यों नहीं? इतनी सस्ती और सीमित क्यों कर दी देशभक्ति

 

आखिरकार मनसे को क्या मिला, इस आंदोलन से? राज ठाकरे का राजनीति में कद घटा या बढ़ा? शिवसेना इन शर्तों पर कैसा रुख अपनाएगी? कभी उड़ता पंजाब विवाद में रही और राजनीति से जोडक़र इसे देखा गया। फिर ‘31 अक्टूबरपर भी थोड़ा पेंच फंसा पर अब रिलीज होगी। फिल्म ऐ दिल है मुश्किलसे तो सेना व सैनिक जवानों की शहादत को जोड़ दिया गया। पाक कलाकारों की वजह से। कितने दिनों बाद जाकर करण जौहर ने वीडियो संदेश से माफी मांगी और शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी। देशभक्ति याद दिलाने के लिए किसी आंदोलन या धमकी की जरूरत क्यों पड़ी? यह तो मन के भाव हैं, उद्गार हैं। अपने आप अंदर से फूट पडऩे चाहिएं। यह कोई कॉफी विद करण शोथोड़े है, जिसके लिए पहले से किसी स्क्रिप्ट की जरूरत है? राशि देने का बीच का रास्ता ताल ठोक केमें सुझाव के रूप में सामने आया था और आखिर यही मुश्किल को आसान बना गया और करण जौहर के दिल को सुकून दे गया। पर देशभक्ति को इतनी सस्ती क्यों बना दियात? इसका मोलभाव क्यों?

हम तो एक गाने की तर्ज पर यही कह सकते हैं:-

इक पलड़े में तुले देशभक्ति, इक पलड़े में चांदी,

नईं तोलना जा…

बे मैं नईं तोलना जा…

लेखक परिचय

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लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर ।

उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहायस हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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Comments (1)

  • kamlesh bhartiya

    dhanywad. haryanakhas.com ka. mushkil asan kar de..

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