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क्या अम्बेडकर बुतों, तस्वीरों और गले में पड़े ताविजो में है?

6 दिसम्बर 1956 डॉ अंबेडकर महाप्रनिर्वाण दिवस विशेष

December 5, 2016 9:28 pm by: Category: शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

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-उदय चे

6 दिसम्बर 1956 को देश के मजदूर, किसान, दलित, पिछड़े, महिला और उपेक्षित आवाम के लिए लड़ने वाले योद्धा डॉ भीम राव अम्बेडकर न चाहते हुए भी लड़ाई को अंतिम समय तक लड़ते हुए पीड़ित समाज से विदा ले गए। लेकिन शोषक वर्ग के खिलाफ एक मजबूत लड़ाई का मैदान तैयार करके, पीड़ितों के हाथों में एक मजबूत हथियार छोड़ कर गए। 6 दिसम्बर डॉ भीम राव अम्बेडकर का महाप्रनिर्वाण दिवस है। मेरे शहर के लगभग सभी चोहराये, सड़के डॉ साहब के पोस्टर लगे होर्डिंग से पटे पड़े है। अम्बेडकर सभा, सर्व अम्बेडकरवादी समाज सभा, राज्य सरकार से लेकर भारत सरकार ने 6 दिसम्बर के लिए होर्डिंग लगवाए है। अगर कोई डॉ साहेब का अनुयायी इन होर्डिंग को देखे तो होर्डिंग देख कर बहुत खुश हो सकता है कि उनके मसीहा का आज सब जगह स्टेचू है तो सब पार्टियां, सब संघठन आज बाबा साहेब का प्रोग्राम कर रहे है। बड़े-बड़े होर्डिंग लगा रहे है। इसलिए उसके लिए खुश होना लाजमी है क्योंकि एक तरफ तो आज भी दलितों को अमानवीय व्यवहार रोजाना सहन करना पड़ता है जैसे स्वर्ण आज भी अमावस्य या त्यौहार के दिन दलितों को लस्सी भी नही डालते, अनेक गांव में दबंग लोग दलितों को शादी में घोड़ी पर बैठने नही देते,  हुक्का के हाथ भी नही लगाने देते, दलित प्रोफेसर को क्लास रूम में कुर्सी नही देते, मिर्चपुर, भगाना, गोहाना, डाबड़ा में दलितों पर अमानवीय अत्याचार होता है।

  वही दूसरी तरफ दलितों के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक लड़ाई लड़ने वाले डॉ अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस के लिए सभी में होर्डिंग लगाने की होड़ सी लगी हुई है। होर्डिंग और पोस्टरों को देख कर तो ऐसा लगता है कि जैसे डॉ साहेब के सपनों का देश बन गया है। लेकिन क्या डॉ साहेब के सपनों का देश बन पाया है। अगर नही बन सका है तो इसके लिए जिम्मदार कौन है और इस होर्डिंग की राजनीती के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई को जानना भी जरूरी नही है? इसलिए सबसे पहले तो ये जानना जरूरी है कि बाबा साहेब ने किसके लिए और क्यों संघर्ष किया। उस संघर्ष में बाबा साहेब के दोस्त कौन थे और दुश्मन कौन थे?

आज सभी राजनितिक दल डॉ अम्बेडकर को उनके दलित मुक्ति के तमाम संघर्षों से काटकर उनको अपनी-अपनी चासनी में डुबोकर पेश कर रहे है। सबका अपना-अपना अम्बेडकर है। भाजपा का अम्बेडकर मुस्लिम विरोधी व हिन्दूवादी है तो कॉग्रेस का अम्बेडकर सिर्फ संविधान निर्माता तक सीमित है। वहीं छदम् अम्बेडकरवादियों का अम्बेडकर बुतों, तस्वीरों और गले में पड़े ताविजो में है।

 ऐसे में आम जनता के लिए ये बेहद मुश्किल हो जाता है कि व् किस अम्बेडकर को सही माने

डॉ अम्बेडकर का सबसे बड़ा दुश्मन उस समय हिंदूवादी मुस्टंडे और संघ रहा। क्योकि डॉ अम्बेडकर एक “जाति विहीन” समाज की स्थापना के लिए सँघर्ष कर रहे थे, ठीक उसी समय डॉ हेडगेवार एक कट्टर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए स्वयं सेवक संघ का गठन कर रहे थे। संघ हमेशा जाति-प्रथा को भारत के गौरवपूर्ण इतिहास का एक अंग बताता रहा है। गुरु गोलवरकर (पूर्व संघ संचालक) ने अपनी पुस्तक “बंच ऑफ थॉट्स” में लिखा है कि जाति व्यवस्था हमारे सामाजिक विकाश में कभी बाधक नही रही, बल्कि इसने समाज में एकता बनाये रखने में मदत की है (पृष्ठ 108)। संघ का मुखपत्र ‘आर्गनाइजर’ मनुस्मृति के कायदे कानून को लागू करने की बात करता है। वही दूसरी तरफ डॉ अम्बेडकर ने दलितों को बराबरी का हक दिलाने के लिए संघर्ष की शुरुआत ही दलित विरोधी मनुस्मृति के दहन जैसे कार्यक्रमो से की थी।

आज कही भी दलितों पर अत्याचार होता है तो संघ से जुड़े संघठन या संघ के कार्यकर्ता आपको दबंगों के साथ खड़े मिलेगें। रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या हो या गुजरात के दलितों की निर्मम पिटाई हो ये संघी आपको जरूर मिलेंगे। लेकिन दूसरी तरफ डॉ अम्बेडकर के नाम पर वोट लेने के लिए ये ही संघी डॉ साहेब के नाम की माला जपते मिलेगें। उसके फोटो वाली टी शर्ट पहने मिलेंगे। बड़े-बड़े कार्यक्रम डॉ अम्बेडकर के नाम पर आपको करते मिलेंगे।

दूसरा औऱ सबसे बड़ा दुश्मन, इन संघीयों से भी बड़े दुश्मन वो छदम् अम्बेडकरवादी है। जो कमजोर और उपेक्षित तबको से होते है। ये अपने आप को बहुत बड़े अम्बेडकरवादी घोषित करते है। डॉ आंबेडकर के नाम पर संघठन बनाते है। साल में एक या 2 प्रोग्राम भी करते है। उन प्रोग्रामो में मुख्यवक्ता सरकार के किसी मंत्री को बनाएंगे। ऐसे मंत्री को जिसको डॉ साहेब के बारे में 2 शब्द भी जानकारी न हो। मुख्यवक्ता डॉ साहेब की विरोधी विचार धारा रखने वाला भी हो सकता है बस वो सरकार में मंत्री, सांसद, विधायक हो। समाज में उठने वाले आर्थिक, राजनितिक, सामाजिक आंदोलन को कुंद करने का कामये बखूबी अच्छे से कऱते है। मेहनतकश में जन समस्याओं पर पनप रहे गुस्से को ये डॉ आंबेडकर के नाम पर ऐसे मुद्दों पर डायवर्ट करते है जिनका डॉ साहेब की विचारधारा से, उनकी लड़ाई से कोई मतलब नही होता जैसे – भारतीय करंसी पर महात्मागांधी की जगह डॉ अम्बेडकर का फोटो होना चाहिए, अम्बेडकर के नाम पर पार्क का नाम होना चाहिए, अम्बेडकर का स्टेचू चौक पर लगनाचाहिए। क्या करन्सी पर डॉ साहेब का फोटो आने से, स्टेचू लगने से या पार्क का नाम डॉ अम्बेडकर के नाम होने से उनके सपने पुरेहो सकते है। लेकिन जब कुछ प्रगतिशील नोजवान डॉ अम्बेडकर के नाम पर लाइब्रेरी खोलते हैं, फ्री ट्यूशन सेंटर चलाते हैं, भूमिहीनों के लिए भूमि बंटवारे की बात करते है, डॉ साहेब की बुक स्कूलो में पढ़ाई जाये, जाति विहीन समाज बनाया जाये, मजदूर के मेहनताना की लड़ाई लड़ी जाये, बिजली, पानी, शिक्षा, रोजगार की लड़ाई लड़ी जाये तो उन प्रगतिशील नोजवानो का सबसे ज्यादा विरोध हिंदूवादियों के साथ मिलकर ये छदम् अम्बेडकरवादी भी करते है।

आज से 70 से 80 साल पहले बहुत ही ज्यादा विपरीत परिस्थितिया होते हुए डॉ अम्बेडकर ने जो लड़ाई महिलाओ की आजादी के लिये,  मजदूर-किसान के लिए जो सँघर्ष डॉ अम्बेडकर ने किया। जो कानून उस समय के नेताओ से लड़कर समाज के कमजोर, उपेक्षित, दलित, आदिवासियों के लिए बनाये। आज उन्ही कानूनों के कारण वो कमजोर, उपेक्षित तबका आजादी की साँस ले रहा है। लेकिन आज हम उनके अनुयायी होने का दावा करने वाले क्या आज उस कमजोर, उपेक्षित लोगो की लड़ाई लड़ रहे है, क्या हम आज दलितों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे है, क्या आज हम भूमिहीनों में भूमि बंटवारे के लिए लड़ रहे है, क्या आज हम महिलाओ के लिए उन पर हो रही हिंसा के खिलाफ लड़ रहे है। डॉ अम्बेडकर का सबसे बड़ा सपना “जाति विहीन समाज” क्या उसको बनाने के लिए हम कुछ कर रहे है। अगर हम ये सब नही कर रहे है और डॉ अम्बेडकर के बड़े-बड़े होर्डिंग लगा रहे है, होर्डिंग लगे हुए को देख कर अगर हमे ख़ुशी मिल रही है तो हम डॉ साहेब की एक बार फिर हत्या कर रहे है। उसके विचार की हत्या कर रहे है।

लेकिन हम इस हत्या में शामिल नही होना चाहतेहै। हम मजबूती से डॉ अम्बेडकर के विचारों को आम जनता तक लेकर जायंगे, हम ”जमीन जोतने वाले की”और “मिल मजदूर की” के लिए लड़ेंगे, हम “जातिविहीन समाज”बनाने के लिए लड़ेंगे। हम लड़ेंगे सामाजिक, आर्थिकऔर राजनितिकसमानता के लिए।

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लेखक परिचय

उदय चे स्वतंत्र लेखक हैं एवं सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं। दलित एवं पीड़ितों के हक की आवाज़ के लिये अपने संगठन के माध्यम से उठाते रहते हैं। उदय चे हिसार के हांसी में रहते हैं।

क्या अम्बेडकर बुतों, तस्वीरों और गले में पड़े ताविजो में है? Reviewed by on . -उदय चे 6 दिसम्बर 1956 को देश के मजदूर, किसान, दलित, पिछड़े, महिला और उपेक्षित आवाम के लिए लड़ने वाले योद्धा "डॉ भीम राव अम्बेडकर" न चाहते हुए भी लड़ाई को अंतिम सम -उदय चे 6 दिसम्बर 1956 को देश के मजदूर, किसान, दलित, पिछड़े, महिला और उपेक्षित आवाम के लिए लड़ने वाले योद्धा "डॉ भीम राव अम्बेडकर" न चाहते हुए भी लड़ाई को अंतिम सम Rating: 0

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