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अमृता प्रीतम – इन्हें जानना ज़रूरत है जिंदगी की

अमृता प्रीतम जन्मदिन विशेष

August 20, 2017 12:09 am by: Category: शख्सियत खास, साहित्य खास 1 Comment A+ / A-

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अमृता प्रीतम, एक ऐसी शख्सियत जिन से आप सभी बखूबी परिचित होंगे, और अगर नहीं है ..तो सच मानिए …इन्हें जानना ज़रूरत है जिंदगी की। अमृता एक देह नहीं, एक आत्मा है जो हर एक औरत के दिल में बसती है। “है” इसलिए कहा कि वो सच में है और हमेशा अपने चाहने वालों के दिलों में रहेगी।
जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही हिंदी साहित्य में रूचि होने के कारण कब उन का पहला उपन्यास पढ़ा, याद नहीं, पर जब भी पढ़ा, उस के बाद उन की कोई भी पुस्तक बिना पढ़े नहीं रह सकी।
ज्यों ज्यों मैं अमृता जी को पढ़ती गयी, एक अमृता ने मेरे सीने में अपना घर बना लिया, फिर तो सोते जागते अमृता जी के किरदार मेरे इर्द गिर्द घूमते और दिल तड़प उठता उन की कहानी की नायिका बनने के लिए, उन के लिखे शब्दों को महसूस करने के लिए। मैं उन की कहानियों में डूबती, उभरती रहती। धीरे धीरे मैं उन के व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित होती चली गयी और फिर उन से मुलाकात की इच्छा जन्म लेने लगी। फिर एक दिन हिम्मत कर उनका फ़ोन नंबर पता कर उन्हें फ़ोन किया और उन से बात की। उन दिनों उन की तबियत ठीक नहीं रहती थी, इसलिए मिलने का ख्वाब ख्वाब ही रह गया पर मेरे लिए उस वक़्त उन से बात कर पाना भी जीवन की एक उपलब्धि रही। सच में, एक बेहद कीमती पल था जिस पल मैं उन से बात कर सकी और अपने आप को धन्य मानती हूँ कि मुझे उन पलों में उन का प्यार और आशीर्वाद मिल पाया ये उन का आशीर्वाद ही है जो आज मेरे पाठक मेरी रचनाओं में कभी कभी उन की तरह लिखा महसूस करते है।
अमृता जी एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व की महिला है, उन्होंने न केवल पुरानी रूढ़ियों का विरोध किया बल्कि समाज मे होने वाले हर अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज उठायी। फिर चाहे वो विभाजन का दर्द था या पंजाब की हीर का, उन के शब्दों में बखूबी उतरा। उन की कविताओं में देश की मिटटी की सोंधी सोंधी महक है। उन के लिखे जैसी शब्दों की बानगी कहीं और देखने को नहीं मिलती। प्रेम और विरह पर लिखे उन के शब्द सोचने को मजबूर कर देते है कि क्या आज भी इस तरह का प्रेम किसी व्यक्तित्व में मिल सकता है। वो सच में आज के ज़माने की हीर है, लैला है, जूलियट है जिन्होंने ने प्रेम में अपना 100 प्रतिशत दिया। अमृता जी ने अपनी ज़िन्दगी को जैसा जिया वैसा लिखा भी फिर चाहे ज़िक्र चाँद सितारों का हो या सपनों का, उन्होंने जो भी लिखा उस में अधूरापन जैसा कुछ भी नहीं।

अमृता जी लिखी कुछ पंक्तियाँ उन की पुस्तक रसीदी टिकट से :

“परछाईयां बहुत बड़ी हकीक़त होती है, आप चाहे तो सारी उम्र, बरस आते है, गुजर जाते है, रूकते नहीं, पर कई परछाईयां, जहाँ कभी रूकती है, वहीँ रुकी रहती है …”

“मैंने उस से कहा था, मेरी माँ को मत मारना”

“तूने उसे कभी देखा है? वेह दिखाई थोड़े ही देता है”

“पर उसे सुनाई भी नहीं देता”

“जिस ईश्वर ने मेरी बात नहीं सुनी, मैं उस के रूप का चिंतन नहीं करूंगी, अब मैं अपने राजन का चिंतन करूंगी …”

“जब भी मैं कोई नज़्म लिखती, लगता मैं उसे ख़त लिख रही हूँ”

“इस ब्याही ज़िन्दगी से मुझे कोई तकलीफ नहीं, सिर्फ एक बात है कि मुझे अपना आप जिंदा नहीं लगता”

“मैं इमरोज के चेहरे कि तरफ ऐसे देख रही थी जैसे कृष्ण को देख रही होऊं”

और मेरी मनपसंद अमृता जी की यह कविता :

हमने आज यह दुनिया बेचीं
और एक दीन खरीद के लाये
बात कुफ्र की, की है हमने
सपनों का एक थान बुना था
गज एक कपड़ा फाड़ लिया
और उम्र की चोली सी है हमने
अम्बर की एक पाक़ सुराही,
बादल का एक जाम उठा कर,
घूँट चाँदनी पी है हमने,
हमने आज यह दुनिया बेचीं …

साहिर जी और इमरोज जी के नाम से कौन परिचित नहीं। उस साहिर को मेरा सलाम जिस के प्यार ने अमृता को अमृत वर्गा बनाया, और इमरोज़ जी ने जैसे रंग अमृता की ज़िन्दगी में भरे वैसे रंग शायद ही कोई चित्रकार किसी की ज़िन्दगी में भर सके, इस महान जोड़ी को मेरा दिल की गहराईयों से नमन …

अंत में अपनी एक रचना अमृता जी को समर्पित करना चाहती हूँ :-
तू मैनू सपने विच मिल्या सी,
भरी दोपहरी सो गयी थी,
ते मै कदि कोशिश वि ना कीती,
कि तैनू जिस्म दा लिबास मिल जाये,
तू सपना बन के आया सी,
तू सपना बन के रया,
सपना बन के जीया,
ते सपना बन के मरा वी,
हुन लौकीं आख दे,
कि तू ता है, ते वो कौन?
कीवे दसा उना नू,
कि मै कौन? ते तू कौन?
तू मै हाँ, ते मै तू हाँ,
तू वी इक सपना ते मै वी इक सपना,
तू नीला आकाश ते मै नीला सागर,
दूर क्षितिज़ ते असी मिलदे आं,
ऐ लोकां दा भ्रम है,
पर मेरे वास्ते हकीकत है,
तू मुझ में ते मै तुझ में,
तू वी सपना ते मै वी सपना,
तू वी इश्क ते मै वी इश्क,
जमीं वालो से कोसों दूर है हम,
लभ ना पाओगे हमे,
ते भूल जाओ आखना,
कि तू कौन ते मै कौन?
अमृता जी आप की याद को हमेशा सीने से लगाए …

-नीलम मैदीरत्ता ‘गुँचा’

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Comments (1)

  • Rashmiji

    (प्रिय कवयित्री अमृता प्रीतम जी को कवितांजलि )

    *अमृता रहेगी ज़िंदा*

    माथे सजाये
    सूरज की
    ओजस्वी बिंदिया
    कंठ पहने
    चाँद सितारों का
    शुभ्र शीतल कुन्दनहार
    वक़्त की
    डयोढ़ी में बैठी
    अपने रूहानी चरखे पर
    शब्दों के
    तकुवे से
    ख्वाबों की
    इंद्रधनुषीय
    पूनी कातती

    ज़िन्दगी के
    कैनवस पर
    रस रंग बन
    हर पल
    झूमती बरसती

    कविता को
    जीवन बनाने की
    तपस्या करती
    जीवन को
    कविता करने की
    ज़ुर्रत करती
    कभी ‘रोमांटिक’,कभी’मिस्टिक’
    तो कभी ‘मॉडर्न’ बन
    सबको हैराती,भरमाती
    कभी तन,कभी मन
    कभी आत्मा_
    कितना कुछ भिगो जाती

    साईं की दरगाह पर
    बन कर
    अगरबत्ती जलती
    शिव की
    बाईं बगल बैठ
    पार्वती का नृत्य देखती
    दूर वादियों में गूंजती
    कृष्ण की बांसुरी सुनती

    इबादत को
    महोब्बत का
    इंसानी जज़्बा
    अता करती
    महोब्बत को
    इबादत की
    बुलंदियां देती

    वारिसशाह से
    दर्दभरे सवाल पूछती
    सारा शगुफ्ता को
    गोद ले सहलाती दुलराती
    निढाल मानवता
    का माथा चूमती
    लहू_लुहान जम्हूरियत के
    ज़ख्मों पर मरहम रखती
    बच्चों को,पेड़ों को
    फलने _फूलने की
    दुआएं देती
    लाचार औरतों के
    कैदी लबों को
    आज़ादी की
    सदायें देती

    चेतन,अचेतन
    महाचेतन का
    अद्भुत संसार रचती
    अमृता उस दुनिया की
    औरत थी
    जिसमें रहना चाहती है
    स्त्री की अन्तश्चेतना

    अमृता नहीं थी
    सिर्फ कविता
    वह है
    एक महाकाव्य

    पानी,हवा,आग
    आकाश मिट्टी_
    सब जगह
    छलकेगी,महकेगी
    अमृता रहेगी
    हमेशा ज़िंदा
    सिर्फ इमरोज़ की
    नज़्मों और कैन्वस
    में ही नहीं
    हम सब की
    इबादतों और मोहब्बतों में….

    रश्मि बजाज

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