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कार गैराज में रहे, महिला घर में… तो क्या?

February 14, 2017 11:33 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

महिलाएं अंतरिक्ष तक पहुंच गईं। कल्पना चावला को कौन भूल सकता है? महिलाएं एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहरा सकती हैं- अरूणिमा सिन्हा के एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने की बात तो अभी ताजा है। महिला पुलिस की वर्दी पहन सकती हैं। किरण बेदी ने शुरूआत की थी और दिल्ली में वाहनों को सही जगह पार्क न करने पर क्रेन से उठाने के सख्त आदेशों के चलते क्रेन बेदी के रूप में चर्चित हो गई थीं। महिलाएं कमांडोज की सख्त ट्रेनिंग ले रही हैं। महिलाएं रेलवे इंजन की ड्राइवर बन गई हैं। क्या-क्या नहीं करतीं महिलाएं और धरती-आकाश सबको नाप दिया महिलाओं ने। भूमाता ब्रिगेड बना कर तृप्ति देसाई ने कितने मंदिरों और दरगाहों के द्वार महिलाओं के लिए खुलवाने के लिए संघर्ष किया और सफलता पाई। फिर भी महिलाओं को ‘बेचारी’ के रूप में क्यों देखा जाता है? फिर भी महिला सुरक्षा को लेकर नेता ऐसे बयान क्यों देते हैं, जो न केवल महिला की गरिमा को कम करते हैं बल्कि हास्यास्पद भी बना देते हैं।

अब देखिए न, ताजा बयान आंध्रप्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष कोडेला शिवप्रसाद राय का है। इसे सुनोगे तो हंसे बिना नहीं रहेंगे। शिवप्रसाद राय कह रहे हैं कि जैसे कार को गैराज में रखने से एक्सीडेंट का खतरा नहीं रहता, वैसे ही महिलाएं अगर घर तक सीमित रहें तो रेप और छेड़छाड़ जैसी घटनाएं कम होंगी। शिवप्रसाद ने अमरावती में राष्ट्रीय महिला सांसद के आयोजन से पहले मीडिया से रू-ब-रू होते हुए यह हास्यास्पद टिप्पणी की। अब आपको चुटकुला याद आ गया होगा। दुकानदार छाता बेचते समय ग्राहक से कहता है कि बस, धूप और बारिश से बचाकर रखना। फिर यह छाता सालों साल चलेगा।

वाह रे शिवप्रसाद और छाता बेचने वाले दुकानदार कमाल की बात कही। हालांकि शिवप्रसाद ने यह भी कहा कि सिर्फ कानून बनाकर महिलाओं पर अत्याचार नहीं रोका जा सकता। पहले महिलाएं घरों में रहती थीं। इससे वे सभी तरह के जुल्मों से सुरक्षित थीं। इससे शिवप्रसाद ने महिलाओं की क्षमता, योग्यता और शक्तियों को बहुत कम आंक कर देखा। यह पहली बार नहीं हुआ है। शिवप्रसाद पहले ऐसे नेता नहीं हैं, जिन्होंने महिलाओं पर इस तरह की अभद्र टिप्पणी की है। समय-समय पर कई नेताओं के बयान आते रहते हैं, जो महिलाओं के बारे में अपनी तरह के नियम, टिप्पणियां करते रहते हैं। कोई नेता महिलाओं के कपड़ों को लेकर उन पर होने वाले हमलों और छेडख़ानी की घटनाओं को जिम्मेदार बताता हैं। कोई इन्हें शक्कर बताता है और कहता है कि शक्कर होगी तो चिंटियां आएंगी ही। लो, कोई कार से तुलना करता है, कोई शक्कर से तुलना करता है और घर से बाहर न निकलने की हिदायत देता है।

अरे, महिलाएं इतना लंबा सफर तय कर आई। पर्दा प्रथा, सती प्रथा, विधवा विवाह और न जाने कौन-कौन सी पीड़ाएं सहन कर अपने पैरों पर खड़ी हुईं। कभी शास्त्रों का ज्ञान तक वर्जित था। मीराबाई को मंदिरों में कृष्णमय होकर नाचना मना था, जहर का प्याला पीना पड़ा। महिलाओं को मुश्किल से अपने पंख मिले, पंखों से उड़ान मिली, उडऩे का हौंसला मिला। फिर भी घर में कैद रहने की बात? महिलाओं की स्वतंत्रता पर शिवप्रसाद जैसे लोग सवाल कैसे उठा रहे हैं? क्या रेप और छेडख़ानी की घटनाएं घर में रहने वाली महिलाओं से नहीं होती? फिर महिलाओं को कहां छिपाओगे? कौन से सात कमरों के पीछे ताले बंद कर रखोगे? नारी को उनके सपनों के पंख दो, उड़ान दो, छीनों मत।

लेखक परिचय

लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइश हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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