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कितना जायज है आडवाणी का गुस्सा ?

December 9, 2016 9:40 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

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अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है, यह एक फिल्म है पर वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी को गुस्सा क्यों आता है, यह एक सवाल भी है और सच्चाई भी। नोटबंदी के मुद्दे पर तीसरे सप्ताह संसद में हंगामा जारी रहने पर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी खूब लाल-पीले हुए। उन्होंने यहां तक कह दिया कि न तो स्पीकर और न ही संसदीय कार्यमंत्री सदन को चला पा रहे हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि वे यह बात खुले तौर पर कहने जा रहे हैं कि स्पीकर सदन नहीं चला पा रही हैं। जब लोकसभा स्थगित हो गई, तब उन्होंने एक अधिकारी से पूछा कि सदन की बैठक कितने बजे तक के लिए स्थगित की गई है। अधिकारी ने बताया कि दो बजे तक के लिए। तब आडवाणी ने कहा कि अनिश्चितकाल के लिए क्यों नहीं? यहां तक कि आडवाणी कह चुके हैं कि सदन न चलने की स्थिति में वे वेतन नहीं लेंगे। वे कह रहे हैं कि वेतन लोकसभा के चलने के हिसाब से ही मिलना चाहिए। संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार भी वयोवृद्ध नेता को शांत नहीं कर पाए। मीडिया के कैमरों की ओर भी इशारा किया लेकिन आडवाणी नहीं रुके। अब सवाल उठता है कि नोटबंदी के मुद्दे को लेकर लोकसभा हो या राज्यसभा रोज-रोज का यह हंगामा कितना उचित है और लालकृष्ण आडवाणी का यह गुस्सा कितना जायज है? आखिर कब तक जनता का पैसा इस हंगामे की भेंट चढ़ता रहेगा? ऐसा हंगामा, ऐसा शोरोगुल किसी हाट-बाजार का दृश्य ही प्रस्तुत करता है, लोकसभा या राज्यसभा की मर्यादा का दृश्य नहीं। करोड़ों रुपए दोनों सदनों की कार्रवाई न चलने के कारण बर्बाद हो चुके हैं, क्यों?

भाजपा नेता अरूण जेटली ने कहा कि विपक्ष सिर्फ टीवी कैमरे के आगे अपनी बात रखता है और बाद में सत्ता पक्ष को सुने बिना हंगामा करके सदन से बाहर निकल जाता है। गुलाम नबी आजाद कह रहे हैं कि जो लोग नोटबंदी के कारण अपनी जान गंवा बैठे, उन्हें श्रद्धांजलि दी जाए। ऐसा न होने पर काला दिवस मनाकर सदन के बाहर विपक्षी दलों ने उन लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित कर दी। इसके साथ ही राज्यसभा फिर हंगामे के चलते स्थगित हो गई। वही सन्नी देओल का संवाद- तारीख पे तारीख याद आ गया न? वही स्थगन पे स्थगन कब तक चलेगा?

अब आडवाणी नो वर्क, नो पे की बात कर रहे हैं एक टीवी चैनल भी इसी विचार को लेकर ताल ठोक के बहस कर चुका है। विपक्ष को सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए, हर ओर यह बात उठ रही है। विपक्ष याद दिला रहा है वर्ष 2012 व 2013 की जब विपक्ष में रहते हुए भाजपा नेताओं ने लगातार दो माह और तेरह दिन तक इसी तरह हंगामा करते हुए सदन की कार्यवाही ठप किए रखी थी। तब जनता के कितने करोड़ रुपए बर्बाद हुए थे? तब कितने प्रस्ताव चर्चा से वंचित रह गए थे? भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा अखबारों की कटिंग दिखा कर पूछते हैं कि दिव्यांगों के बारे में एक प्रस्ताव रखा जाना है लेकिन वे यह नहीं बता पाते कि आखिर नोटबंदी कितने दिव्यांग बैंकों की कतारों में किस हाल में हैं?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बाहर नोटबंदी पर हर कहीं विचार रख रहे हैं तो सदन में क्यों नहीं आते? आज आडवाणी वेतन न लेने की बात कर रहे हैं तो 2012 व 2013 में क्यों नहीं ऐसा विचार आया? विपक्ष में रहते कितनी सकारात्मक भूमिका निभाई इस पर आत्म मंथन करेंगे? काश, कबीर के शब्दों में विचार किया होता:-

जो तोको कांटा बुवे, तोहि बोव तू फूल,

तोहि फूल को फूल हैं, बाको हैं तिरशूल।

पर क्या कहें, विपक्ष में रहते बोये पेड़ बबूल के तो आम कहां से होय? विपक्ष को सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।

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