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बाबुल का ये घर बहना, कुछ दिन का ठिकाना है…

September 13, 2016 5:11 pm by: Category: मनोरंजन खास, शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

बाबुल का ये घर गोरी

बस कुछ दिन का ठिकाना है

दुल्हन बनके तुझे

पिया घर जाना है

बापू तेरे आँगन की

मैं तो खिलती कली हूँ

इस आँगन को छोड़ क्यों

किसी और का घर सजाना है

 

बेटी बाबुल के घर में

किसी और की अमानत है…

 data-songअल्का यागनिक और किशोर कुमार की आवाज में, साल 1989-90 में आई ‘दाता’ फिल्म का गीत जब भी किसी कानों में पड़ता है तो आज भी हमारी आंखों या गले से भावुकता बह उठती है। शरीर का रोआं-रोआं उस वक्त तक चला जाता है जब हमारी घर की बेटी जवान हो रही होती है। ऐसी भावुकता घोलने का श्रेय जाता है गीतकार अंजान को… भारतीय हिन्दी फ़िल्मों के मशहूर गीतकार  और अपने समय के ख्याति प्राप्त शायर अंजान अपने सदाबहार गीतों के रूप में आज भी सुनाई दे देते हैं। चाहे ‘खइके पान बनारस वाला’ हो,  ‘ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना’ हो या ‘रोते हुए आते हैं सब’ जैसे न जाने कितने ही गीत होंगे जो आज भी लोगों की जुबान पर चढे हुए हैं।

28 अक्टूबर 1930 को उत्तर प्रदेश के बनारस में जन्में अंजान के अमिताभ बच्चन पर फ़िल्माये और कल्याणजी-आनंदजी के संगीत से सजे गीत आज भी लोकप्रिय है। वास्तविक रूप से ‘लालजी पाण्डेय’ नाम के इस गीतकार को बचपन से ही शेरो-शायरी की आदत थी। जिसके चलते ये बनारस में आयोजित सारे कवि सम्मेलनों और मुशायरों में हिस्सा लिया करते थे।

anjanगीतकार के रूप में इनके कैरियर की शुरूआत साल 1953 में अभिनेता प्रेमनाथ की फ़िल्म ‘गोलकुंडा का कैदी’ के ‘लहर ये डोले कोयल बोले…’ और ‘शहीदों अमर है तुम्हारी कहानी…’  सरीखे गीतों से हुई। उसके बाद कभी जी. एस. कोहली, तो कभी पंडित रविशंकर के संगीत निर्देशन में इनका काम चलता रहा, और ये नित नई बुलंदियां छूते रहे।

अपने तीन दशक से भी ज्यादा लंबे सिने कैरियर में लगभग 200 से भी ज्यादा फ़िल्मों को अपने मधुर गीत देकर 13 सितम्बर, 1997 को यानि आज ही के दिन 67 साल की उम्र में विदा हो गए। लेकिन इनके लिखे गीत आज भी हर किसी के दिल को सुकूं देते हैं और हर कोई उन्हें गुनगुनाता रहता है।

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