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9 अगस्त 1942 – अगस्त क्रांति दिवस

August 9, 2016 12:39 pm by: Category: इतिहास खास Leave a comment A+ / A-

क्या है अगस्त क्रांति दिवस ?

9 अगस्त 1942, यानि भारतीय इतिहास का एक ऐसा दिन जिसे क्रांति दिवस के नाम से भी जाना जाता है। यूं तो क्रांतियों के इतिहास बड़े ही जटिल और व्यापक रहे हैं। मगर बदलाव की आहट के लिए किए जाने वाले हर प्रयास को अगर क्रांति की ओर इंगित मान लें, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। ऐसा ही एक दौर आया जब दूसरे विश्व युद्ध में समर्थन लेने के बावज़ूद जब अंग्रेज़ भारत को स्वतंत्र करने के लिए तैयार नहीं हुए तब। इस दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने भारत छोड़ो आंदोलन के रूप में आज़ादी की अंतिम जंग का ऐलान किया, उस दिन यही तारीख थी, 9 अगस्त 1942, ये एक ऐसा ऐलान था जिससे ब्रितानिया हुक़ूमत में दहशत फैल गई। यही वो तारीख थी जिसे अगस्त क्रांति दिवस का नाम दिया गया।

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मुंबई का अगस्त क्रांति मैदान  आज भी है इसके आगाज़ का गवाह

ये आंदोलन मुम्बई के जिस पार्क से शुरू हुआ उसे अब अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाता है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंग्रेज़ों को देश से भगाने के लिए 4 जुलाई 1942 को एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया कि यदि अंग्रेज़ भारत नहीं छोड़ते हैं तो उनके ख़िलाफ़ व्यापक स्तर पर नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया जाएगा। पार्टी के भीतर इस प्रस्ताव को लेकर मतभेद भी पैदा हुए, परिणाम ये हुआ कि प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने पार्टी छोड़ दी। पंडित जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद प्रस्तावित आंदोलन को लेकर शुरुआत में संशय में थे लेकिन बाद में उन्होंने महात्मा गाँधी के आह्वान पर आखिर तक इसके समर्थन का फ़ैसला किया।

 

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वरिष्ठ गाँधीवादियों और समाजवादियों जैसे सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अशोक मेहता और यहां तक कि जयप्रकाश नारायण ने भी आंदोलन का खुलकर समर्थन किया। बता दें कि आंदोलन के लिए कांग्रेस को हालाँकि सभी दलों को एक झंडे तले लाने में तो कामयाबी हाथ नहीं लगी, लेकिन उनके प्रयास को बेहतरीन कह दिया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।  इस आह्वान का मुस्लिम लीग, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और हिन्दू महासभा ने जमकर विरोध किया। 8 अगस्त सन् 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के बम्बई सत्र में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया गया।

अरुणा आसफ़ अली ने तिरंगा फहराकर किया आंदोलन का शंखनाद

हालांकि भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित होने को लेकर ब्रितानिया हुक़ूमत पहले से ही सतर्क थी, यही कारण था कि गाँधीजी को अगले ही दिन पुणे के आगा खां पैलेस में क़ैद कर दिया गया। अहमदनगर क़िले में कांग्रेस कार्यकारी समिति के सभी कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर बंद कर दिया गया। लगभग सभी नेता गिरफ़्तार कर लिए गए। लेकिन हरियाणा से तआल्लुक रखने वाली युवा नेत्री अरुणा आसफ अली गिरफ़्तार नहीं की गई और मुम्बई के गवालिया टैंक मैदान में उन्होंने सन् 1942 को तिरंगा फहराकर गाँधीजी के भारत छोड़ो आंदोलन का शंखनाद किया।

महात्मा गाँधी ने हालाँकि अहिंसक रूप से आंदोलन करने का आह्वान किया था मगर अंग्रेज़ों को भगाने का देशवासियों में ऐसा जुनून पैदा हुआ कि कई स्थानों पर बम विस्फोट कर दिए गए, सरकारी इमारतें जला दी गई, बिजली कट कर दी गई, परिवहन और संचार सेवाओं को भी रोक दिया गया। जगह-जगह पर हड़तालें हुई, लोगों ने ज़िला प्रशासन को कई जगहों पर उखाड़ फेंका। गिरफ़्तार किए गए नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल तोड़कर मुक्त करा लिया गया और वहाँ स्वतंत्र शासन स्थापित कर दिया। एक तो द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेज़ों की रीढ़ टूट रही थी दूसरी ओर यही एकमात्र आंदोलन था जिससे ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिलने लगी थी।

 

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