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बाबा नागार्जुनः शोषणमुक्त समाज के पक्षधर

आम जन के लेखक थे बाबा नागार्जुन

June 30, 2016 1:51 pm by: Category: शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

“खिचड़ी विप्लव देखा हमने

भोगा हमने क्रांति विलास

अब भी खत्म नहीं होगा क्या

पूर्णक्रांति का भ्रांति विलास।”

 

मार्क्सवाद से गहरे प्रभावित, लेकिन मार्क्सवाद के तमाम रंग-रूप पर खिन्न बाबा नागार्जुन के सामने जब भी मार्क्सवाद की बात होती तो वे हमेशा यही सवाल करते कि कौनसे मार्क्सवाद की बात कर रहे हो मा‌र्क्स की, चारु मजूमदार की या चे ग्वेरा की? इसी तरह उन्होनें जयप्रकाश नारायण का समर्थन करने के बाद भी जनता पार्टी की विफलता पर उपरोक्त पंक्तियां लिखी।hqdefault

एक प्रगतिवादी विचारधारा का लेखक और कवि नागार्जुन। पूरा नाम वैद्यनाथ मिश्र। सन् 1911 में 30 जून के दिन मधुबनी जिले के सतलखा गांव में जन्में नागार्जुन वैसे तो किसी परिचय के मोहताज नहीं है लेकिन उनका विस्तारित जीवन उनके हर पाठक को कुछ न कुछ लिखने पर जरूर विवश करता है।

फ़क़ीरी और बेबाक़ी से अपनी पहचान बनाने वाले बाबा ने हिंदी, संस्कृत, बांग्ला और मैथिली जैसे कई भाषाओँ और कई विधाओं में लेखन किया। वे मैथिली में अपने ‘यात्री’ उपनाम से लिखते थे। बाबा नागार्जुन की महत्वपूर्ण रचनाओं में बलचनमा, रतिनाथ की चाची, नयी पौध, दुखमोचन, बाबा बटेसरनाथ और खिचड़ी विप्लव हमने देखा जैसी कई रचनाओं का नाम लिया जा सकता है।

उनकी रचनाएं प्रगतिशील के साथ-साथ एक हद तक प्रयोगशील भी है। अपनी रचनाओं में उन्होनें कहीं आंचलिक परिवेश में किसी गांव के सुख-दु:ख की कहानी कही है, तो कहीं मार्क्सवादी सिद्धान्तों की झलक देते हुए सामाजिक आन्दोलनों का समर्थन किया है और कहीं-कहीं समाज में व्याप्त शोषण वृत्ति और धार्मिक सामाजिक कृतियों पर कुठाराघात किया है। वे अपनी रचनाओं के माध्यम से हमेशा शोषणमुक्त समाज या यों कहें कि समतामूलक समाज के निर्माण के लिए प्रयासरत थे।

नागार्जुन के गीतों में काव्य की पीड़ा जिस लयात्मकता के साथ व्यक्त हुई है, वह किन्ही और जगह दिखाई नहीं देती। उनकी कोई निश्चित विचारधारा नहीं थी, लेकिन क्रांतिकारिता में उनका जबरदस्त विश्वास था। यही कारण था कि वे जयप्रकाश की अहिंसक क्रांति से लेकर नक्सलियों की सशक्त क्रांति तक का समर्थन करते थे। एक जगह वे लिखते हैं

काम नहीं है, दाम नहीं है

तरुणों को उठाने दो बंदूक

फिर करवा लेना आत्मसमर्पण

 

1969 में उनकी मैथिली रचना ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साहित्य जगत को इतना कुछ देने वाले और अपनी रचनाओं के माध्यम से गरीब और मजदूर के हित की बात लिखने वाले बाबा नागार्जुन सन 1998 में 5 नवंबर के दिन हमसे विदा हो गए। लेकिन उनकी रचनाओं में आज भी उनकी संजीदगी देखी जा सकती है।

  • एस.एस. पंवार ( लेखक नो माइंड पब्लिकेशन के मुख्य हिंदी संपादक हैं )
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