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बंग्लादेशः थम नहीं रहा हत्याओं का सिलसिला

फरवरी 2015 लेकर अब तक 25 से ज्यादा लोगों की हो चुकी है हत्या

June 23, 2016 5:41 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

 

हाल ही के दिनों बंग्ला देश में एक हिंदू पुजारी की हत्या कर दी गई, बताया जा रहा है पूजारी अपनी साइकिल से मंदिर जा रहे थे और बाद में उनका शव जेनिदाह जिले के नोलडंगा गांव में उसके घर के पास धान के खेत से बरामद हुआ। बंग्ला देश में हत्या की ये पहली घटना नहीं थी। पिछले ही कुछ महीनों में एक बौद्ध भिक्षु, एक सूफी संत और एक अंग्रेजी के प्रोफेसर की हत्या भी इसी तरह से की गई। जानकारी के लिए बता दें कि फरवरी 2015 लेकर अब तक 25 से ज्यादा बेगुनाह लोगों की हत्याएं हिंसात्मक तरीके से हो चुकी है। हत्याओं के क्रम का सिलसिला इतना छोटा नहीं कि यहीं थम जाए, इन बेगुनाही हत्याओं का अतीत और भी मौत की कई कहानियां बयां करता है, और जो भी इन घटनाओं के शिकार हुए वे या तो अल्पसंख्यक समुदाय से थे, या धर्मनिरपेक्ष, बेबाक बोलने वालों के पक्षधर या फिर ब्लॉगर थे। अविजित रॉय की मौत ने किसको न दहला दिया होगा। जब कोई लेखक मरता है उसके चाहने वालों के ख्वाब भी मरते हैं और उन भावनाओं की भी हत्या हो जाती है जो गाहे-बगाहे कोई पाठक उसके आस-पास बुन लेता है, अविजित रॉय के मौत बाद क्रांतिकारी कलम चलाने वालों का खून खौल जाना जायज सी बात है, अविजित की मौत के बाद लिखी युवा कवि जगदीप सिंह की एक कविता यहां लिखना चाहूंगा…

 

मेरे शब्द

 

मैं जानता हूं

एक दिन मेरे शब्द

मेरे लिए ही घातक सिद्ध होंगें

मनुष्यता की मुलायम चादर में लिपटे

मेरे शब्द नुकीले हैं

कभी न कभी मुझे ही छीलकर फेंक देंगे सरेआम

शब्दों के साथ फैलें होंगें

किसी सड़क पर खून के धब्बे भी

या हो सकता है

गोलियों से निकले मेरे शब्द

उनके सर से होकर हथियारों में घुस जांए

और मुझ पर ही बरस पड़ें

पर अब मुझे खौफ नहीं है

मनुष्यता की मुलायम चादर में लिपट

जीये हैं कबीर के ढाई आखर

मैनें देखा है सपनों को मरते हुए

अब मैं अभिव्यक्ति के खतरे उठा सकता हूं

मैं देखना चाहता हूं

सुनहरी झील की नीली आंखे

अंधेरा अब मुझ तक नहीं मेरे नीचे तक सीमित है

चादर में लिपटे इन शब्दों के लिए

मैं भी हो जाना चाहता हूं पानसारे, अविजित, पाश………………।

 

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खैर रचनाधर्मिता अलग कर्म है लेकिन अविजित के बाद उसके साथ काम करने वाले प्रकाशक फैसल अरेफिन दीपन (43) को भी मध्य ढाका के एक भवन में तीसरी मंजिल पर स्थित उनके दफ्तर में मार दिया गया। मौत के शिकार तो दुनिया छोड़ ही गए वहीं इनमें बाल-बाल बचने वालों की संख्या भी दहाई में हैं। इस फेहरिश्त में एक नाम जुल्हास मन्नान का भी है जो पिछले दिनों हत्या का शिकार हुए थे, जुल्हास के साथ-साथ उसके साथी तनय फहीम को भी मौत से हाथ धोना पड़ा था। बता दें कि जुल्हास समलैंगिकों के अधिकारों का समर्थन करता था। हमलावर कूरियर कम्पनी के कर्मचारी के रूप में उनके फ्लैट में दाखिल हुए थे और उनकी हत्या कर दी। जुल्हास मन्नान समलैंगिकों के समर्थन में ‘रूपबान’ नामक पत्रिका निकालते थे। चर्चाएं तो ये जोरों पर है कि बंग्ला देश इस्लाम बाहुल्य देश है जहां इस्लाम विरोधी कारनामों के चलते लोग अक्सर कट्टरपंथियों के शिकार हो जाते हैं, लेकिन मन्नान और फहीम के करीबियों के मुताबिक उन्होनें कभी इस्लाम का विरोध नहीं किया वे केवल समलैंगिकों के समर्थन में ‘रूपबान’ नामक पत्रिका निकालते थे जिनमें वे समलैंगिकों को उनके अधिकार दिलाने की मुहिम छेड़े हुए थे। मन्नान देश के पूर्व विदेश मंत्री दीपू मोनी के रिश्ते में भाई थे और अमेरिकी दूतावास में पूर्व प्रोटोकाल अधिकारी भी रह चुके थे, तो वहीं वे कई विदेशी एनजीओ से भी जुड़े हुए थे। कुछ लोगों द्वारा ये भी कहा जाता रहा है कि बंग्लादेश में नास्तिक और इस्लाम विरोधियों की हत्याएं की जा रही है लेकिन पिछले साल के अक्टूबर से ऐसे आम लोगों को भी कट्टरपंथी अपना निशाना बनाने लगे हैं जिनकी सोच इस्लाम विरोधी नहीं थी और न ही वे नास्तिक थे। हत्या की इन घटनाओं ने जरूर दुनिया भर का ध्यान खींचा है।

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खैर, कुछ समय के उपरांत मन्नान और फहीम की हत्याओं की भी जिम्मेदारी आईएस और अल कायदा की साउथ एशिया शाखा ने लेने का दावा कर ही दिया। वहीं इसके अलावा एक अज्ञात संगठन जो खुद को अंसारउल्लाह बांग्ला टीम बताता है; ने भी कई हत्याओं की जिम्मेदारी ली है। जब बेगुनाही हत्याओं का मामला धर्मनिरपेक्षता या पंथनिरपेक्षता के बाहर चला जाता है तो दशा सोचने लायक होती है। यूं तो बांग्लादेश में हज़ारों चरमपंथी समूह हैं, यह अभी तक साफ नहीं है कि इन हत्याओं के पीछे आखिर किसका हाथ है? कथित तौर पर इस्लामिक स्टेट या अल-क़ायदा से जुड़े संगठनों के बजाय सरकार दावा करती है कि इसके पीछे विपक्षी दलों या स्थानीय इस्लामिक संगठनों का हाथ है, जो देश को तोड़ना चाहते हैं या अस्थिर करना चाहते हैं। उधर विपक्षी दल सरकार के इस दावे को झुठलाने पर जोर देते हैं। जब भी व्यवस्था चरमराती है और सरकार का नियंत्रण किसी समस्या पर नहीं रहता तो विपक्ष या आम जनता का विरोध करना लाजिम सी बात है। बंग्ला देश में भी हो रही इन हत्याओं के चलते देश भर में सरकार के खिलाफ आक्रोश फैला है और प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस्लामिक कट्टरपंथियों पर कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं, पर इन हत्याओं की जिम्मेदारी अतिवादियों द्वारा लिए जाने के बाद भी इनका पर्याप्त रूप से राजनीतिकरण किया जा रहा है, जो ऐसे हालातों में उचित प्रतीत नहीं होता।

 

(लेखक पेशे से पत्रकार और उभरते हुए साहित्यकार हैं, नो माइंड पब्लिकेशन के हिंदी विभाग के संपादक भी)

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