Wednesday , 22 November 2017

Home » इतिहास खास » भगत सिंह – कितने दूर कितने पास

भगत सिंह – कितने दूर कितने पास

September 28, 2017 12:00 am by: Category: इतिहास खास, खबर खास, शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

bhagat-singh

भगत सिंह हमारी राष्ट्रीय चेतना में कितने गहरे बसे हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि धुर दक्षिणपंथी दलों से लेकर धुर वामपंथी दलों तक उन्हें अपना नायक बनाने और उनसे अपनी परम्परा जोड़ने का भरसक प्रयास करते हैं। उनके जन्मशताब्दी वर्ष में शायद ही देश की कोई ऐसी पत्रिका होगी जिसने उन पर विशेषांक नहीं निकाला या फिर विशेष सामग्री नहीं दी, गांधी के अलावा शायद ही ऐसा किसी अन्य के साथ होता हो. गांधी के सन्दर्भ में भी स्वरों में पर्याप्त अंतर होता है तथा अक्सर वाम तथा दक्षिण अलग अलग कारणों से उनके प्रति आलोचनात्मक रुख रखते हैं, भगत सिंह के सन्दर्भ में अनिवार्य रूप से सभी का स्वर प्रशंसा का ही होता है लेकिन यहाँ अपनी अपनी तस्वीरों में मढ के. जहाँ वामपंथी उन्हें कम्युनिस्ट बता कर उनके सपनों के भारत की बात करते हैं वहीँ संघ परिवार उन्हें कट्टर राष्ट्रवादी और देश की आन बाण शान पर अपने प्राणों की बलि देने वाला देशभक्त जवान बताकर अपने सपनों का भारतवर्ष बनाने की बात करता है। ज़ाहिर है जनता के बीच भगत सिंह की जो विश्वसनीयता और उन्हें लेकर जो श्रद्धा भाव है वह अद्वितीय है. लेकिन इन सबके बीच असली भगत सिंह कहाँ हैं? कौन हैं? क्या थे उनके स्वप्न और हम उनसे कितने दूर खड़े हैं या फिर कितने पास हैं? संयोग से अपने अन्य समकालीन क्रांतिकारियों से अलग भगत सिंह का लिखा पढ़ा आज भी उपलब्ध है और भगत सिंह की तलाश उन्हीं लेखों, पत्रों, टिप्पणियों और पर्चों के सहारे की जा सकती है.

सितम्बर 1987 में भगत सिंह के साथी रहे शिव वर्मा के सम्पादन में कानपुर के समाजवादी साहित्य सदन ने उनके कुछ लेख और पत्र “भगत सिंह की चुनी हुई कृतियाँ” नाम से प्रकाशित किए। मुख्य खंड में 29 दस्तावेजी लेख/पत्र तथा परिशिष्ट के अंतर्गत भगत सिंह के संगठन ‘हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक संगठन’ के दस दस्तावेज़ इसमें शामिल थे, जिनके लिखने में निश्चित रूप से उनकी प्रमुख भूमिका रही होगी और जिनसे सहमति तो रही होगी। इन दस्तावेजों के साथ शिव वर्मा ने एक लम्बी भूमिका के रूप में “क्रांतिकारी आन्दोलन का वैचारिक इतिहास” लिखकर भगत सिंह की वैचारिक अवस्थिति साफ़ की थी. यहाँ यह याद कर लेना अप्रासंगिक नहीं होगा कि हिन्दुस्तानी प्रजातांत्रिक संगठन का नाम बदल उसमें “समाजवादी” शब्द जुड़वाने में भगत सिंह की प्रमुख भूमिका थी। एक मज़ेदार तथ्य यह कि जिन दो लोगों ने “समाजवादी” शब्द जोड़ने का विरोध किया था उन दोनों ने ही बाद में भगत सिंह और उनके साथियों के खिलाफ़ गवाही दी, खैर, इन लेखों और दस्तावेजों को पढ़ते हुए इतना तो बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि चाफेकर बंधुओं से ग़दर पार्टी तक के क्रांतिकारियों की जो पूरी परम्परा थी भगत सिंह उसके सबसे आधुनिक और विकसित प्रतिनिधि थे. भारतीय क्रांतिकारी इतिहास में वह पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने धर्म, जाति और ऐसे तमाम मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखी थी. 1928 में किरती में लिखे अपने आलेख “धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम” में वह लिखते हैं – “बात यह है कि क्या धर्म घर में रहते हुए भी लोगों के दिलों के भेदभाव नहीं बढ़ाता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतंत्रता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर नहीं पड़ता? … बच्चे से यह कहना कि ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है मनुष्य कुछ भी नहीं है, मिट्टी का पुतला है, बच्चे को हमेशा के लिए कमज़ोर बनाना है. उसके दिल की ताक़त और उसके आत्मविश्वास की भावना को नष्ट कर देना है.” अपने थोड़े बाद के लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” में वह कहते हैं, “तुम जाओ और किसी प्रचलित धर्म का विरोध करो, जाओ किसी हीरो की, महान व्यक्ति की, जिसके बारे में सामान्यतः यह विश्वास किया जाता है कि वह आलोचना से परे है क्योंकि वह ग़लती कर ही नहीं सकता, आलोचना करो तो तुम्हारे तर्क की शक्ति हज़ारों लोगों को तुम पर वृथाभिमानी का आक्षेप लगाने को मज़बूर कर देगी.” उस दौर में जब महाराष्ट्र में एक मज़बूत दलित आन्दोलन के बावजूद कांग्रेस सहित आज़ादी की लड़ाई के तमाम भागीदारों के बीच जाति प्रश्न को लेकर कोई दृढ़ चेतना दिखाई नहीं देती और संघ जैसे कट्टरपंथी संगठन तो वर्ण व्यवस्था को बनाए रखने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे थे, भगत सिंह का अछूत समस्या पर जून, 1928 को किरती में प्रकाशित लेख “अछूत समस्या” निश्चित रूप से क्रांतिकारी था। इस लेख में वह यह कहते हुए कि  “क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन भर मैला ही साफ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, ये बातें फिजूल हैं। इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा उन्हें नीच कह कर दुत्कार दिया एवं निम्नकोटि के कार्य करवाने लगे। साथ ही यह भी चिन्ता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें, तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्व जन्म के पापों का फल है। अब क्या हो सकता है? चुपचाप दिन गुजारो! इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शान्त करा गए। लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया। मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया। आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया। बहुत दमन और अन्याय किया गया। आज उस सबके प्रायश्चित का वक्त है”, खुली अपील करते हैं कि “संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुँह की ओर न ताको। लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है। यही पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है। इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना। उसकी चालों से बचना। तब सब कुछ ठीक हो जायेगा। तुम असली सर्वहारा हो… संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ भी हानि न होगी। बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होनेवाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आन्दोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोए हुए शेरो! उठो और बगावत खड़ी कर दो।“ यह यों ही नहीं था कि उनकी शहादत के बाद महान दलित नेता रामास्वामी पेरियार ने अपने अखबार “कुडई आरसु” में श्रद्धांजलि लेख लिखा था. जिस तरह गांधी ने आंबेडकर को उस समय पूना पैक्ट करने पर मज़बूर किया और लगातार वर्ण व्यवस्था का समर्थन करते रहे और वाम आन्दोलन के भीतर जाति के सवाल को लगातार टाला गया उसमें भगत सिंह का जाति प्रश्न पर यह स्पष्ट और कड़ा स्टैंड निश्चित रूप से उनकी अग्रगामी चेतना और भारतीय समाज की बेहतर समझ का परिचायक था.

यही नहीं जो लोग उन्हें “मरने के लिए मरे जा रहे” रूमानी क्रांतिकारी के रूप में देखते हैं उन्हें युवा राजनैतिक कार्यकर्ताओं के नाम लिखा उनका पत्र पढ़ना चाहिए जिसमें वे उन्हें गाँवों और फैक्ट्रियों में जाकर लोगों को संगठित कर एक नयी सामाजिक व्यवस्था के निर्माण की अपील करते हैं. इसी पत्र में वह लिखते हैं कि “इससे क्या फर्क पड़ता है कि भारतीय सरकार के प्रमुख लार्ड इरविन हों या सर पुरुषोत्तम ठाकुर दास. एक किसान को इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि लार्ड इरविन की जगह सर तेज बहादुर सप्रू गद्दी पर बैठे हैं.” ज़ाहिर है कि उनकी देशभक्ति गोरे अंग्रेजों को सत्ता से हटाने भर तक सीमित नहीं थी बल्कि वह देश के मज़दूर, किसानों और वंचित जन के हाथ में सत्ता पहुँचाने की उस लड़ाई में मुब्तिला थे जिसकी तलाश में वह समाजवाद के सिद्धांत तक पहुँचे थे. “इन्कलाब जिंदाबाद से हमारा अभिप्राय क्या है” नामक लेख में वह इसका मज़ाक उड़ाने वाले सम्पादक को जवाब ही नहीं देते बल्कि क्रांति के अपने स्वप्न को भी स्पष्ट करते हैं, “क्रान्ति शब्द का अर्थ प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना और आकांक्षा है.” इस प्रगति को लेकर उनका नज़रिया तमाम जगहों पर बहुत स्पष्ट रूप से सामने आता है. यह कोई वायवीय रोमांटिक स्वप्न नहीं है. अपने समकालीन क्रांतिकारी लाला रामशरण दास की किताब “ड्रीमलैंड” की भूमिका में वह रूमानी इन्कलाब और अपने उद्देश्यों का ज़िक्र करते हैं. लेखक की स्वप्नजीविता की कड़ी आलोचना करते हैं और साफ़ साफ़ अपनी विचारधारा “भौतिकवाद” घोषित करते हैं. यह भूमिका दरअसल पुस्तक की समीक्षा ही है और इस रूप में राजनीतिक आलोचना का एक उत्कृष्ट उदहारण है. इस भूमिका के अंत में वह कहते हैं कि “मैं अपने नौजवानों के लिए ख़ास तौर पर इस पुस्तक की सिफारिश करता हूँ, लेकिन एक चेतावनी के साथ. कृपया आँख मूंदकर इस पर अमल करने के लिए या इसमें जो कुछ लिखा है उसे वैसा ही मान लेने के लिए इसे न पढ़ें. इसे पढ़ें, इसकी आलोचना करें, इस पर सोचें और इसकी सहायता से स्वयं अपनी समझदारी बनाएँ.” भगत सिंह की यह चेतावनी किसी भी समय किसी भी रचना के पाठक के लिए समीचीन है.

भगत सिंह को समझने के लिए उनके दिए नारे भी बेहद महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं. उन्होंने ‘वन्दे मातरम’ या ‘भारत माता की जय’ की जगह जो नया नारा उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन को दिया वह था – इन्कलाब जिंदाबाद. इन्कलाब से उनका अभिप्राय क्या था यह हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं. अराजकतावाद से आगे बढ़ते हुए समाजवादी विचारों को आत्मसात करने की प्रक्रिया में उन्होंने यह साफतौर पर कहा कि ‘हथियार और गोला बारूद क्रांति के लिए कभी कभी आवश्यक हो सकते हैं लेकिन इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है. यानि इस क्रान्ति को वैचारिक तैयारी के बिना अंजाम देना संभव नहीं था. भगत खुद भी दीवानावार किताबें पढ़ते थे. उनकी जेल डायरी के नोट्स देखें जांय तो मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन से लेकर गैरीबाल्डी और मैजिनी तक को वह पढ़ रहे थे और इन्हीं किताबों से उनके सम्मुख क्रान्ति का स्वप्न आकार ले रहा था. यह यों ही नहीं था कि उन्होंने कोर्ट में अपनी पेशी के दौरान लेनिन के निर्वाण दिवस पर तीसरी कम्युनिस्ट इंटर्नेशनल को पत्र लिखा था. इस पत्र में  एक और नारा है – साम्राज्यवाद मुर्दाबाद. ज़ाहिर है वह अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ सिर्फ़ इसलिए नहीं थे कि यह एक विदेशी हुकूमत थी. वह साम्राज्यवाद के खिलाफ थे और इसके विकल्प के रूप में समाजवाद के समर्थक. यह यों ही नहीं है कि ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसी के प्रमुख ने अपनी रपट में गांधी से अधिक ख़तरा भगत सिंह जैसे “कम्यूनिस्ट” क्रांतिकारियों से बताया था. भगत सिंह निश्चित तौर पर भारत की आधिकारिक कम्युनिस्ट पार्टियों का हिस्सा नहीं थे, लेकिन अपने विचारों में वह वैज्ञानिक समाजवाद के बेहद करीब थे. आज़ाद हिन्दुस्तान को लेकर उनके स्वप्न एक शोषण विहीन और समानता आधारित समाज के थे जिसमें सत्ता का संचालन कामगार वर्ग के हाथ में हो.

और उस स्वप्न के आईने में जब हम अपना समय देखते हैं तो निश्चित रूप से यह उनके जितने पास लगता है उससे कहीं अधिक दूर. वह लड़ाई उपनिवेशवाद की मुक्ति तक तो पहुंची लेकिन उसके आगे जाकर वंचित जनों के हाथ में सत्ता देकर एक समतावादी समाज की स्थापना अब भी एक स्वप्न ही है. हमने जो आर्थिक व्यवस्था चुनी वह समतावादी होने की जगह लगातार विषमता बढ़ाने वाली साबित हुई और आज आज़ादी के सात दशकों बाद भी हम अपनी जनता के बड़े हिस्से को ज़रूरी सुविधाएं भी मुहैया नहीं करा पा रहे. सामाजिक ताना बाना भी बुरी तरह उलझा और ध्वस्त हुआ है. एक अपेक्षाकृत बराबरी वाला संविधान अपनाने के बावजूद समाज के भीतर जातीय, धार्मिक और इलाकाई भेदभाव लगातार बढ़ता गया है. बाबरी विध्वंस के बाद से देश में दक्षिणपंथी ताक़तें मज़बूत हुई हैं और धर्म का स्पेस राजनीति में घटने की जगह भयावह रूप से विस्तारित होता चला जा रहा है. कश्मीर और उत्तर पूर्व में जिस तरह उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के प्रतिरोध और दमन देखे जा रहे हैं वह देश के रूप में हमारी परिकल्पना को ही प्रश्नांकित कर रहे हैं. ऐसे में भगत सिंह को याद करना उपनिवेशवादी आन्दोलन की क्रांतिकारी तथा जनपक्षधर धारा को याद करना है. यह सवाल सिर्फ एक महान क्रांतिकारी शहीद की स्मृति को ज़िंदा रखने का नहीं बल्कि उस विचार और स्वप्न को जीवित रखने का है और इसे आगे ले जाने की जिम्मेवारी उनकी है जो खुद को भगत सिंह का वारिस कहते हैं।

लेखक परिचयः अशोक कुमार पाण्डेय

ashok-kumar-pandey-haryanakhas

24 जनवरी 1975 को मऊ, उत्तर प्रदेश में जन्में लेखक अशोक कुमार पांण्डेय का जुड़ाव कविता, आलोचना, अनुवाद एवं वैचारिकी विधाओं से रहा है। उनकी मुख्य कृतियों में ‘लगभग अनामंत्रित’, ‘प्रलय में लय जितना’, ‘माँ की डिग्रियाँ एवं अन्य कविताएँ’ (चयन) शामिल हैं। वैचारिक विषयों पर शोषण के अभयारण्य – भूमंडलीकरण के दुष्प्रभाव और विकल्प का सवाल, मार्क्स : जीवन और विचार, कार्ल मार्क्स और उनकी विचारधारा आदि प्रकाश में आ चुकी हैं। वहीं प्रेम: विश्व साहित्य से अमर सूक्तियाँ, आज़ादी की लड़ाई और भारतीय मुसलमान, कविताओं और वैचारिक गद्य का फुटकर अनुवाद भी इनके द्वारा प्रकाशित किया गया है। इसके अलावा लेखक कई पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं एवं देश के 12 युवा कवियों में शुमार हैं।

 

भगत सिंह – कितने दूर कितने पास Reviewed by on . भगत सिंह हमारी राष्ट्रीय चेतना में कितने गहरे बसे हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि धुर दक्षिणपंथी दलों से लेकर धुर वामपंथी दलों तक उन्हें अपना नाय भगत सिंह हमारी राष्ट्रीय चेतना में कितने गहरे बसे हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि धुर दक्षिणपंथी दलों से लेकर धुर वामपंथी दलों तक उन्हें अपना नाय Rating: 0

Leave a Comment

scroll to top