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हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर

September 27, 2016 11:41 am by: Category: इतिहास खास, खबर खास, शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

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यह पंक्तियां शहीद भगतसिंह को बहुत प्रिय थीं और वे अक्सर इनको गुनगुनाया करते थे

हमको भी मां बाप ने पाला था

दुख सह सह कर

हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर

वक्ते रुखसत इतना भी न आए कहकर

जो याद हमारी आए दो अश्क बहा लेना 

शहीद भगत सिंह के पूर्वजों का गांव है खटकड कलां । यह नवांशहर से जालंधर जाने वाली सड़क पर स्थित है । सन् 1979  में पंजाब सरकार ने आदर्श स्कूल खोले थे और मुझे वहां हिंदी प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली । मेरे से एक मित्र ने सवाल किया कि खटकड कलां में क्या करोगे ? मैंने उस मित्र को कहा कि आज तक शहीद भगतसिंह के गांव के बारे में सुना है , अब इसे जानने की कोशिश करूंगा कि क्या तिलस्म है जिसने भगतसिंह को शहीद ए आजम बनाया ?  वैसे एक बात स्पष्ट कर दूं कि भगतसिंह का जन्म खटकड कलां में नहीं बल्कि पाकिस्तान के चक नम्बर 107 में हुआ ।  उनका नाम भागां वाला रखा गया था क्योंकि उनके जन्म पर चाचा व पिता जेल से छूटकर आए थे । भागां वाला से नाम भगतसिंह बन गया । देश विभाजन के बाद चक नम्बर 107 का यह हिस्सा पाकिस्तान में रह गया तो भगतसिंह के पैतृक गांव खटकड कलां में शहीद स्मारक बनाया गया । शहीदी दिवस 23 मार्च को खटकड कलां व फिरोजपुर के निकट हुसैनीवाला में श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं । हां , भगतसिंह के परिवार ने अपना खटकड कलां का पैतृक घर राष्ट्र के नाम अर्पित कर दिया । भगतसिंह की माता विद्यावती ने अपना अंतिम समय यहीं बिताया । जब ज्ञानी जैल सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री थे , तब उन्होंने माता विद्यावती को पंजाब माता की उपाधि के साथ-साथ एक कार भेंट की थी । इस पर पंजाबी के कवि संतराम उदासी ने एक गीत खास तौर पर आक्रोश जाहिर करते लिखा और गाया था

भगतसिंह दी मां बेशक बनेयो

पर हाड़े बनेयो न कोई पंजाब माता

कहां तो देश भर का गौरव, अभिमान थी और कहां विद्यावती मां पंजाब माता बन कर रह गई ?

हां, शहीद भगतसिंह के पिता किशन सिंह की समाधि पहले परिवार के खेतों में थी , बाद में इसे ही शहीद स्मारक के पास नये सिरे से स्थापित किया गया ।

सन् 1979 तक भगतसिंह की हैट वाली प्रतिमा स्थापित थी स्मारक के सामने लेकिन सन् 1981 में जब ज्ञानी जैल सिंह गृहमंत्री थे तब नयी प्रतिमा स्थापित व अर्पित की । पुरानी प्रतिमा नवांशहर में चंडीगढ रोड पर स्थित विद्यावती भवन के सामने स्थापित की गयी । नवांशहर को जिला बना कर इसका नाम भी शहीद भगतसिंह नगर रखा गया है ।

भगतसिंह का परिवार आर्य समाज के रंग में रंगा था और इन्होंने बचपन में अपने पिता के साथ खेतों में पूछा था कि बीज बोते समय सवाल किया था कि इससे क्या होगा ?

पिता ने जवाब दिया कि इससे बहुत बड़ी फसल पैदा होगी, तब भगतसिंह ने कहा कि पिताजी,  फिर क्यों न बंदूकें बोई जाएं, जिससे अंग्रेजों को भगाया जा सके ।

दूसरी बड़ी बात यह कि भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह जेल में थे और चाची हरनाम कौर रोती रहती, जिससे बालक भगतसिंह के में अंग्रेजों के प्रति गुस्सा बढता रहता । फिर हुआ जलियांवाला कांड । लाहौर से तेरह साल के भगतसिंह अपनी बहन अमर कौर को बता कर चुपचाप रेल से अमृतसर पहुंचे और बाग की रक्तसनी मिट्टी लेकर पहुंचे । वे शहीद करतार सिंह को अपना आदर्श मानने थे और उनका चित्र सदैव जेब में रखते । वे जेल में गाया करते

सेवा देश दी करनी बड़ी ओखी

गल्लां करनियां ढेर सुखलियां ने

जिन्हां देश सेवा बिच पैर पाया

उनहां लक्ख मुसीबतां झल्लियां ने ।

लाहौर के नेशनल कॉलेज में भगतसिंह की क्रांतिकारी भावना को पंख लगे । वैसे वे नाटकों में भी रूचि रखते , खूब पुस्तकें पढते । नौजवान भारत सभा का गठन किया । यहीं  सुखदेव और अन्य क्रांतिकारियों से मुलाकात हुई । लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने की योजना बनी क्योंकि इस अपमान को सहन नहीं कर सके । नाटकीय ढंग से भाभी दुर्गा के साथ भाग निकले भगतसिंह ।

पहले असेंबली में बम फेंकने वालों में भगतसिंह का नाम नहीं था, सुखदेव ने उन्हें इसके लिए प्रेरित किया। किस तरह से,  यह उन दोनों के बीच के लम्बे-लम्बे पत्रों को पढ़ कर ही जान सकते हो ।

भगतसिंह का जब विवाह करने का प्रयास किया गया,  तब वे घर से भाग निकले और कानपुर पहुंच गए । वहां प्रताप अखबार में बलवंत सिंह के नाम से उपसंपादक बन गए ।  उनकी रिपोर्टिंग के आलेखों की पुस्तक भी पढने लायक है , जिसमें होली के दिन रक्त के छींटे प्रभावित करता है ।

माता विद्यावती ने यह बात स्पष्ट कर दी थी कि शादी की बात चली जरूर थी , पर तय नहीं हुई थी । भगतसिंह पर बनी फिल्में भी देखी थीं मां ने । बसों में शहीद भगतसिंह की घोडी किस्सा खूब बिकता था ।

भगतसिंह अंतिम समय तक पुस्तक पढ़ने के शौक को जारी रखे रहे और जब उन्हें फांसी के लिए बुलाने आए, तब उन्होंने कहा कि ठहरो, अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है । वे पुस्तक समाप्त कर ही गये । उन्होंने अपने भाई को लिखे पत्र में लिखा भी था कि पढ़ो, पढो, पढने से ही क्रांति की सान तेज होती है । भगतसिंह की जेल में लिखी पुस्तक मैं नास्तिक क्यों हूं , खूब पढी जाती है । उन्होंने अंत में यह भी कहा था

मेरी मिट्टी से भी खुशबुए वतन आएगी ।

शहीद ए आजम बनने वाला भगतसिंह मात्र 23 वर्ष की आयु में ही जो कर गए,  वह किसी किसी से हो पाता है । उनके लिखे पत्रों  को पढ कर भी बहुत कुछ व्यक्तित्व का पता चलता है ।

बस , भगतसिंह का 23 मार्च का मेला अब सिर्फ सरकारी बन कर रह गया है , क्योंकि दूसरे दलों को खटकड कलां में मंच ही नहीं लगाने दिया जाता । उन्हें पास के गांव काहमा में मंच लगाने पडते हैं । दाना-पानी नाम से एक रेस्तरां बनाया गया , पर अक्सर यह बंद मिलता हैं । इससे दूर से आने वाले पर्यटकों या शोधार्थियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता हैं । भगतसिंह के भांजे जगमोहन सिंह का कहना हैं कि भगतसिंह की प्रतिमाएं लगाने की नहीं बल्कि विचारों को फैलाने की कोशिश होनी चाहिए ।

लेखक परिचय: कमलेश भारतीय 

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लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर। उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहायस हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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