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भाटला दलित सामाजिक बहिष्कार – संविधान बराबरी की बात करता है लेकिन

दलित उत्पीड़न - सविधान बराबरी की बात करता है, सविधान भूमि बंटवारे की बात करता है, सविधान लोक तंत्र की बात करता है। लेकिन क्या आज तक हमने होने दिया सविधान को लागू।

July 18, 2017 12:34 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

सुनो! सुनो! सुनो!

“गाम का नै बंधी कर राखी सै। बाहर खेतां मैं कोनी जाणा। जो सीरी, ब्रसोदिया, किसी नै ठेका मै जमीन ले राखी सै वो जा सके सै और कोई घास आली या और कोई भी खेत में न जा सके सै।”

        ये लाइने किसी फिल्म या किसी नाटक की लाइने नही है। ये हरियाणा के हिसार जिले के भाटला गांव में उच्च कहलाने वाली जातियो का दलित (मजदूर-भूमिहीन) जातियो के खिलाफ फरमान है। फरमान के अनुसार दलित जातियां उच्च जातियों के खेत में मजदूरी करने, पशुओं के लिए घास लेने नही जा सकती, कोई भी स्वर्ण उनसे बात नही करेगा, अपनी दुकान से कोई भी सामान उनको नही देगा, दूध नही देगा। इसको गांव में सामाजिक बंधी बोलते है। ये बड़ी बर्बर और अमानवीय है। ये सामाजिक बंधी क़ानूनी बैन होने के बावजूद हरियाणा, उतर प्रदेश, राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में अक्सर लगती रहती है। इस सामाजिक बंधी का शिकार होती है भूमिहीन जातियां। इन फरमानों के द्वारा उच्च जातियां जो सीधा सन्देश देती है कि जो दलित है, उनको आज भी 21वीं सदी में, भारत की आजादी के 70 साल बाद भी, समानता का सविधान होने के बावजूद कोई सामाजिक, राजनितिक, आर्थिक अधिकार नही है। ये दलित जातियां गुलाम है उच्च जातियों की, अगर किसी दलित ने गुलामी की जंजीर तोड़ने का प्रयास किया तो उसको सामाजिक, राजनितिक, आर्थिक सजा दी जायेगी। ये फरमान सीधा-सीधा भारतीय सविधान को ठेंगा है। ये फरमान एलान करता है कि इस किताब में चाहे कितनी भी अच्छी तहरीर लिख लो। लेकिन गांव में सत्ता स्वर्ण जातियो की ही रहेगी।

सविधान बराबरी की बात करता है, सविधान भूमि बंटवारे की बात करता है, सविधान लोक तंत्र की बात करता है। लेकिन क्या आज तक हमने होने दिया सविधान को लागू।

   केंद्र में चाहे किसी भी पार्टी की सरकार रही हो दलितो के साथ अन्याय होता रहा है। लेकिन 2014 के बाद बनी केंद्र में बीजेपी की सरकार के बाद दलितो, आदिवासियों, मुस्लिमो पर हमलों की बाढ़ सी आ गयी हैं। ये हमले गांव से लेकर दिल्ली जैसे महानगरों में बढ़े है। रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या, उना में दलितों के साथ गाय के नाम पर बेहरमी से मारपीट हो या बालू, भाटला, पतरहेड़ी, सहारनपुर की दलित उत्पीड़न की घटनाएं हो। आज दलित सबसे ज्यादा असुरक्षित है। मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद 2016 में दलितो पर हमले के 47000 हजार मामले दर्ज किये गए। रोजाना 2 दलित मारे जाते है, 5 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं होती है। 27 घटनाएं दलित उत्पीड़न की हर रोज दर्ज होती है। 93% दलित गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करते है।

         अभी देश में राष्ट्रपति का चुनाव होना है। सत्ता में विराजमान धुर दलित विरोधी पार्टी ने अपना उमीदवार दलित चेहरे के रूप में रामनाथ कोबिन्द को बनाया है। वही विपक्षी दलों ने भी अपना उमीदवार दलित चेहरे के बराबर में दलित चेहरा मीरा कुमारी को बनाया है। ऐसा लगता है जैसे इन सभी पार्टियों को दलितो से बहुत प्यार है। वही दूसरी तरफ पुरे देश में जगह-जगह दलितो पर अत्याचार की घटनाएं तेजी से बढ़ रही है। इन घटनाओं के खिलाफ कोई भी पार्टी ईमानदारी से संघर्ष नही कर रही है। इसका मतलब दलितो को ये सिर्फ यूज कर रहे हैं। इसका मतलब “हाथी के दांत खाने के ओर दिखाने के ओर”

वही दूसरी तरफ दलित उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने वाले नोजवानो को सरकार देशद्रोह जैसे झूठे मुकदमो में फंसा रही है। सरकार और प्रशासन स्वर्णो के साथ मजबूती से खड़ा है लेकिन वही दूसरी तरफ इन हमलों के खिलाफ दलित प्रतिरोध के रूप में जबरदस्त उभार आया है। नोजवान मजबूती से लड़ रहे है।

दलाल बन चूका परंपरागत दलित नेतृत्व को इन आंदोलनों ने बाईपास किया है। मायावती, पासवान, रामदास या कोई और नेताओं की इन आंदोलनों में कोई जगह नही बची है। ये सब नेता गाहे-बगाहे संघियो कि गोदी में बैठे मिलते है।

वर्तमान दलित आंदोलन की बागडोर गांव से लेकर महानगर तक तेज तर्रार नोजवानों के हाथ में है। इन्ही आंदोलनों ने जिग्नेश और चंद्रशेखर जैसे युवा व् जुझारू नेतृत्व को पैदा किया है। भीम सेना जैसे अपेक्षाकृत उग्र संघर्ष सामने आये है।

ऊना के दलित आंदोलन में जमीन की मांग से पूरे देश के दलित आंदोलन में भूमि सुधार की मांग ने दोबारा राष्ट्रीय स्तर पर दस्तक दी है। कृषि भूमि का समान बंटवारा दलितो को मैला ढोने, सीवर सफाई, मरे हुए जानवर उठाने जैसे कामो से मुक्ति दिलाएगी।

लेकिन अभी भी दलित आंदोलन दलित जातियों की एकता न होने के कारण कमजोर है। जिस दलित जाति पर हमला होता है तो दूसरी दलित जातियां आज भी उनके पक्ष में बहुमत में नही आ रही है। बहुत सी जगह तो दलित जातियां पीड़ित जातियों के खिलाफ स्वर्णो के पक्ष में खड़ी मिलती है। जो दलित आंदोलन के लिए सबसे खतरनाक है। दलित जातियों के साथ-साथ पिछड़ी जातियों  में एकता बनाये बिना दलित आंदोलन को कामयाब नही किया जा सकता।

दलित आंदोलन में आज सबसे जरूरी है कि सामाजिक मुद्दे के साथ आर्थिक मुद्दे भी उठाए जाये। आर्थिक मुद्दे 90% दलित जातियां जो मजदूर है, के समान है। आर्थिक मुद्दे जैसे भूमि का बंटवारा, खेत मजदूर के लिए कानून बनाने की मांग, श्रम कानून लागू करवाना, आरक्षण को लागू करवाना जैसी मांगो से दलित जातियां एकता की तरफ बढ़ेगी। दलित जातियों को राजनितिक तौर पर भी सचेत करने की जरूरत है। परम्परागत दलित नेताओ ने दलितो को सिर्फ सत्ता हासिल करने के लिए वोट के रूप में इस्तेमाल किया है। दलित जातियों में विभाजन का कारण भी ये दलित नेता है। जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिए कभी भी दलित जातियों की एकजुटता नही होने दी। दलित की लड़ाई सिर्फ दलित लड़ेगा, जाति की लड़ाई सिर्फ उस जाति वाला और फिर गोत्र तक इन्होंने ऐसा बोलकर बाँटने का काम किया है। लेकिन आज हमको इन प्रगतिशील, बुद्विजीवियों, नोजवानो, किसान, मजदूर जो स्वर्ण जातियों से आते है जो दलित आंदोलन के साथ खड़े है उनको साथ लेकर चलने की जरूरत है। ये दलित नेता आज भी इस नए उठ रहे दलित आंदोलन को जिसमे दलितो की एकता बनने के आसार हैं उनको तोड़ने के काम में लगे हुए है। इसलिए दलितो को राजनीतिक तौर पर जागरूक होने की भी बहुत ज्यादा जरूरत है। आज डॉ भीम राव अम्बेडकर का नारा ‘मिल मजदूर की और जमीन जोतने वाले की’ को साकार करने के लिए लड़ना होगा। देश-विदेश में चल रहे जल-जंगल-जमीन बचाओ आंदोलनों के प्रति भी दलितो को एकजुटता दिखानी जरूरी है। आने वाले समय में ये पीड़ित आवाम एकजुट होकर उत्पीड़न के खिलाफ मजबूत लड़ाई लड़ेगा।

लेखक परिचय

Uday Che पूर्व छात्र नेता हैं स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य करते हैं। सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं। दलित एवं पीड़ितों के हक की आवाज़ अपने संगठन के माध्यम से उठाते रहते हैं। उदय चे हिसार के हांसी में रहते हैं।

नोट:- प्रस्तुत लेख में दिये गये विचार या जानकारियों की पुष्टि हरियाणा खास नहीं करता है। यह लेखक के अपने विचार हैं जिन्हें यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। लेख के किसी भी अंश के लिये हरियाणा खास उत्तरदायी नहीं है।

भाटला दलित सामाजिक बहिष्कार – संविधान बराबरी की बात करता है लेकिन Reviewed by on . सुनो! सुनो! सुनो! "गाम का नै बंधी कर राखी सै। बाहर खेतां मैं कोनी जाणा। जो सीरी, ब्रसोदिया, किसी नै ठेका मै जमीन ले राखी सै वो जा सके सै और कोई घास आली या और को सुनो! सुनो! सुनो! "गाम का नै बंधी कर राखी सै। बाहर खेतां मैं कोनी जाणा। जो सीरी, ब्रसोदिया, किसी नै ठेका मै जमीन ले राखी सै वो जा सके सै और कोई घास आली या और को Rating: 0

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