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भीष्म साहनीः एक प्रगतिशील कथाकार

August 9, 2016 7:30 am by: Category: शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

कहते हैं लेखन जब मानवीय मूल्यों के पक्ष की बात करे तभी वो ‘लेखन’ है। यूं तो हिंदी रचनाकारों के इतिहास में साहित्य के नाम पर खुद के लिए लिखने वालों की भी कमी नहीं रही, मगर जनहित के लिए कलम चलाने वाले गिने-चुने कलमकारों में;जिन्होनें हिंदी साहित्य में प्रेमचंद की कड़ी को आगे बढाया, जिन्होनें मानवीय मूल्यों की हिमायत की, जो मानवीय अनुभूतियों और तत्कालीन जीवन के अन्तर्द्वन्द्वों को सामने लेकर आए, जिन्होनें समाज की कुरीतियों, समस्याओं को अपनी रचनाओं का विषय बनाया, ऐसे कलमकार थे भीष्म साहनी।37495-kvlzkubwgq-1468211225

जन्म 8 अगस्त 1915 रावलपिंडी, पाकिस्तान। पिता का नाम हरबंस लाल साहनी, माता का नाम लक्ष्मी देवी। कहा जाता है कि इनके पिता अपने समय के प्रसिद्ध समाजसेवी हुआ करते थे, जिनके व्यक्तित्व का प्रभाव इन पर भी पड़ा। हिन्दी फ़िल्मों के ख्यातिप्राप्त अभिनेता बलराज साहनी इनके बड़े भाई थे। भीष्म साहनी की शुरूआती शिक्षा घर पर ही हिन्दी और संस्कृत में हुई। उसके बाद की शिक्षाओं में स्कूल से उर्दू और अंग्रेज़ी की पढ़ाई करने के बाद वे 1937 में ‘गवर्नमेंट कॉलेज’, लाहौर चले गए जहां से उन्होनें अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया और सन् 1958 में पंजाब विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।

बटवारे से पहले साहनी ने व्यापार भी किया और साथ-साथ अध्यापन कार्य भी करते रहे। उसके बाद उन्होनें पत्रकारिता एवं इप्टा नामक मंडली में अभिनय भी किया। ये मुंबई फिल्म जगत में भी किस्मत आजमाने गए, मगर सफलता न मिलने पर वापस अंबाला आकर अध्यापन कार्य करने लगे। इसके बाद उन्होनें विदेशी भाषा प्रकाशन गृह मास्को में अनुवादक के तौर पर भी कार्य किया। यहाँ भीष्म साहनी ने दो दर्जन के क़रीब रशियन भाषायी किताबों, टालस्टॉय, आस्ट्रोवस्की, औतमाटोव की किताबों का हिन्दी में अनुवाद किया। साथ ही वे प्रगतिशील लेखक संघ एवं अफ़्रो एशियाई लेखक संघ से भी जुड़े रहे।

साहनी का गद्य लेखन एक ख़ास रंग और चमक लिए हुए है। उन्हें कभी भाषा को गढ़ने की ज़रुरत नहीं महसूस होती। सुडौल और खूब पक्की ईंटों की खनक इनके गद्य की खास पहचान है। इनकी कहानियां काल की सीमाओं से बाहर आकर बात करती है। यूं तो हिन्दी लेखन में समाजोन्मुखता की लहर बहुत पहले से ही थी मगर मार्क्सवादी चिन्तन को मानवतावादी दृष्टिकोण से इसमें जोड़ने का काम भीष्म साहनी ने किया। जनवादी कथा आन्दोलन के दौरान भीष्म साहनी ने सामान्य जन की आशा, आकांक्षा, दु:ख, पीड़ा, अभाव, संघर्ष और विडम्बनाओं को अपने उपन्यासों से ओझल नहीं होने दिया। नई कहानी में उन्होंने कथा साहित्य की जड़ता को तोड़कर उसे ठोस सामाजिक आधार दिया। उन्होंने अपनी रचनाओं में नारी के व्यक्तित्व विकास, स्वातन्त्र्य, एकाधिकार, आर्थिक स्वतन्त्रता और स्त्री शिक्षा पर बल दिया। साहनी लोकगीतों के भी अच्छे जानकार थे।

‘झरोखे’, ‘तमस’, ‘बसन्ती’, ‘मायादास की माड़ी’, ‘हानुस’, ‘कबीरा खड़ा बाज़ार में’, ‘भाग्य रेखा’, ‘पहला पाठ’, ‘भटकती राख’ आदि इनकी प्रमुख रचनाएं मानी जाती है जिसमें से ‘तमस’ पर साल 1986 में एक फ़िल्म भी बन चुकी है, जिसे कई पुरस्कारों से भी नवाजा गया। 1998 में भारत सरकार द्वारा इन्हें ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया।

इसके अलावा इन्हें ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ (1975), ‘शिरोमणि लेखक सम्मान’ (पंजाब सरकार) (1975), ‘लोटस पुरस्कार’ (अफ्रो-एशियन राइटर्स असोसिएशन की ओर से 1970), ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ (1983) और ‘पद्म भूषण’ (1998) से सम्मानित किया गया था। 11 जुलाई, 2003 को साहनी ने इस दुनिया को विदा कह दिया।

 

 

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