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क्या-क्या बनते रह गए चौधरी साहब…!

October 11, 2016 10:19 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

birender singh ka dard

हरियाणा में वैसे तो सभी वरिष्ठ नेता ‘चौधरी साहब’ के रूप में जाने जाते हैं और युवा नेता ‘भाई साहब’। कुछ नेताजी, प्रधान जी, तो कुछ सिर्फ ‘साहब’ के तौर पर बुलाए जाते हैं। पर आज जिस चौधरी साहब की बात हो रही है, वो हैं डूमरखां गांव के निवासी व सर छोटूराम के नाती और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के रिश्ते में भाई चौ. बीरेंद्र सिंह। यह स्टाइल कुछ कुछ ‘आपकी अदालत’ जैसा हो गया। चलो, कोई बात नहीं। अब चौ. बीरेंद्र सिंह का एक दर्द है जो जब तब उभर ही आता है। लाख कोशिश कर लें, यह दर्द जाता ही नहीं है। वैसे इस दर्द को दर्द की बजाय सबसे हसीन सपना भी कह सकते हैं। चौ. बीरेंद्र सिंह के जीवन का सबसे हसीन सपना है- हरियाणा का मुख्यमंत्री बनना। इसे छिपाने की चौ. साहब ने कभी कोई कोशिश भी नहीं की। इसमें हर्ज ही क्या है? वो तो साफ, दो टूक शब्दों में कहते हैं कि मैं राजनीति में दरियां बिछाने नहीं आया। जिस नेता का कद बढ़ता है, वह मुख्यमंत्री बनने का हसीन सपना तो देखने ही लगता है।

बात जिला जींद के जुलाना की है। चौ. साहब अपने कार्यकर्ताओं के बीच समस्याएं सुन रहे थे। तभी भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष पुष्पा तायल ने उन्हें बताया कि उनके सामने जो कार्यकर्ता लिस्ट रखी है, उसमें उनका नाम नहीं है। बस, इस पर चौ. साहब का पुराना दर्द एकाएक छलक उठा, जुबां पे आ गया। उन्होंने जवाब दिया- राजनीति में ऐसा ही चलता है। मेरा नाम भी मुख्यमंत्री की सूची में दो बार कट चुका है। एक बार राजीव गांधी के समय में तो दूसरी बार 2005 में। दोनों बार सूची में संभावित मुख्यमंत्री पद की दौड़ में थे लेकिन दोनों बार वे दौड़ में पिछड़ गए और एक बार चौ. भजन लाल तो दूसरी बार निकट रिश्ते के भाई भूपेंद्र सिंह हुड्डा बाजी मार ले गए। दोनों बार चौ. बीरेंद्र सिंह ने मंत्रिमंडल में शामिल होना स्वीकार कर लिया और कार्यकर्ताओं और रैलियों में यह बात लगातार कहते रहे कि मुझे मंत्री बनने का कोई चाव नहीं, पर कार्यकर्ता के काम होते रहें, इसलिए शामिल हूं। तो क्या बनने का चाव है? इसके जवाब में वे यही कहतें- राजनीति में मैं दरियां बिछाने नहीं आया।

कभी राजीव गांधी के मित्र, कभी कांग्रेस हाईकमान सोनिया गांधी के जन्मदिन पर रैलियां कीं लेकिन चौ. बीरेंद्र सिंह मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। आखिर हाईकमान ने उन्हें पवन बंसल के बाद लगभग केंद्रीय मंत्री बनाने का फैसला कर, उनके दर्द को कुछ कम करने का प्रयास करना चाहा परंतु वे हरियाणा से तो चले लेकिन समझो बीच राह में ही रेलमंत्री बनते-बनते रह गए। बस, एक ही रात में बाजी पलट गई। लड्डू बंटे, मुंह में नहीं पहुंच सके, मिठास नहीं घोल पाए। जैसे अंग्रेजी का मुहावरा है, जिसका अर्थ है कि चाय के प्याले और होंठों के बीच कई बार बहुत फासला रह जाता है। कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ। फिर चौ. साहब के सब्र का बांध टूट गया। चुनाव से पहले हाईकमान से चेहरा बदलने की, मुख्यमंत्री बदलने की मांग भी नहीं सुनी गई। हां, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का चेहरा मुलाना की बजाय तंवर में बदल गया। पर चौ. साहब तो कांग्रेस को छोड़ कमल थाम कर नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में पहुंच गए। पहले ग्रामीण विकास और अब इस्पात मंत्री पर दिल है कि मानता नहीं, यह बेकरारी बढ़ती ही जा रही है मुख्यमंत्री बनने की। बार-बार दिल यह गाए मुख्यमंत्री ही बनूंगा। ऊपर से भाजपा के सांसद राजकुमार सैनी चौ. साहब के पीछे पड़े कह रहे हैं कि चौ. बीरेंद्र सिंह भाजपा में कांग्रेस कल्चर थोंपना चाहते हैं। सैनी ने तो यहां तक कहा कि बीरेंद्र सिंह व भूपेंद्र सिंह हुड्डा की पार्टियां चाहे अलग हों, पर सोच एक है। गया वक्त कभी लौटता नहीं पर चौ. बीरेंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री सूची से नाम कटने पर दोनों बार मंत्री बनना न स्वीकार किया होता तो कार्यकर्ताओं को उनमें अपना हीरो नजर आता। अब क्या हो सकता है?

वक्त की हर शै गुलाम, वक्त का हर शै पे राज,

आदमी को चाहिए वक्त से डर कर रहे।

क्या जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिजाज।

-कमलेश  भारतीय (लेखक हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं।)

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