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वर्तमान के आसपास को बयां करती कहानियां

September 26, 2016 8:22 pm by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

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कहानी समीक्षा / एस.एस.पंवार

कहानियां हमारे यथार्थ जीवन से जो मेल खाती हैं वही शायद वो भाव उकेर पाती है जो सच के बिलकुल करीब होता है। पूर्व पत्रकार एवं लेखक रोशन वर्मा की कहानियां भी कुछ ऐसी ही हैं। प्रभावी आवरण के साथ लिपटा उनका कहानी संग्रह चांद-नगर काफी अच्छा और प्रभावी दिखता है। जमीनी धरातल से जुड़ी आपकी कहानियां बेहद पसंद आईं। खासकर आपकी भाषा शैली, आंचलिक शब्द-चित्र, यथार्थता और राजनीतिक समझ के साथ प्रयोग हुए संदर्भमयी संवाद…..कहानियों को बेहद प्रभावी बनाए हुए हैं, समाजवाद की एक हल्की-सी लकीर आपके साहित्य में परिलक्षित होती है। एक ओर जहां कहानियां पढते वक्त पाठक के मन में लेखक के अपने समय का अहसास जिंदा हो उठता है, तो वहीं  संग्रह अपने आप में आत्मकथारूप भी जान पड़ता है।

कहानी “मुल्ला पांडे का रोजनामचा” में आम-जनजीवन और दिनचर्या का जो बिंम्ब उकेरा गया है वो काफी दिलचस्प और यथार्थ है, कहानी में राममनोहर लोहिया और अवतार सिंह पाश के संदर्भ देकर लिखी पंक्तियों के साथ-साथ ‘अब तो संवेदना की ड्योढी पर कलम टूटती है और शब्द यहां-वहां माथा फोड़तें है’ जैसी पंक्तियों ने कथ्य को और अधिक संजीदा किया है।

वहीं “उस रात…. समय वही था”  में आपके द्वारा प्रकृति-चित्रण और मानवीकरण का जो नमूना पेश किया गया है वो काबिल-ए-गौर है। कहानी में प्रयुक्त पंक्ति ‘अमीर और अमीर होता जा रहा है, गरीब और गरीब होता जा रहा है’ में लेखक का सामाजिक जुड़ाव मुखर हुआ है । कहानी में घटना-चित्रण करते वक्त शब्दों के साथ कोई विशेष समझौता नहीं किया गया। कहानी को पढते वक्त गोर्की के जीवन की कुछ यादें भी स्मृति-पटल पर दस्तक दे गई थी, पर मुझे लगा कि उनकी रचनाओं में मैं इतना जुड़ नहीं पाया था जितना इसे पढते वक्त मैनें महसूस किया है, ये मेरी हरियाणा से जुड़ी पृष्ठभूमि की ही वजह हो सकती है। कहानी का आखिरी हिस्सा अनूठे-चित्रण के साथ लिखा गया है।

“धुंध से गुजरते हुए” के पहले गद्यांश ने तो मार ही डाला समझो। क्या खड़ा चित्रण है, सिर्फ चार पंक्तियां पढी….. और आपका आंगन जैसे मेरे कमरे में उतर आया हो। कहानी का चित्रण पारिवारिक बिम्बों को उकेरने में आपके सिद्धहस्त होने की खबर देता है। कहानी एक छोटी-सी बस्ती से शुरू होकर एक वीरान जंगल से गुजरती है…..लेखक केवल सोचता-भर है…….और अंत में एक-दो झुग्गी झोंपड़ियां पाकर पाठक को अलविदा कह देती है।

“वो फिर नही आया”  में आपके पशु-प्रेमी जीवन की झलक मिली है, एकदम मौत का दृश्य दुखदायी लगा। “काल चक्र” लेखक के बारे में जानने संबधि काफी सवाल खड़े करती है, पाठक को काफी रमा देने वाली शैली में लिखी हुई रचना है। कहानी की पंक्ति ‘घर छोटा है, और एक और कमरा किताबों के लिए होगा यही सोचते उसकी आधी उम्र गुजर गई’ और ‘गांव के मध्य में मंदिर के पास सरकारी अस्पताल के कमरे में डाकघर स्थित था’ जैसी पंक्तियां समाज और व्यवस्था का अच्छा चित्र खींचती है। कहानी इतनी रमा देने वाली है कि साहित्य में खो जाने वाला पाठक इसकी शुरूआत भूल सकता है।

“रात गुजर गई” अच्छी रचना है, कहानी नाट्य के रूप में रूपान्तरित किया जा सकता है, उक्त कहानी बाकि कहानियों से अलग-थलग प्रेममयी लिपी में लिखी कहानी है। नायिका-चित्रण बेहद प्रभावित करता है।

कहानी “नेहा” की पंक्ति ‘जिस दिल में सच्ची चाहत बसती हो और वासना का कोई स्थान न हो, उस दिल पर जो सदमा गुजरता है, उसे भूला नहीं सका था वो’ जैसी पंक्तिया आम पाठक को छू लेने वाली है, कहानी के कई पड़ाव आम पाठक वर्ग को अपने आसपास हो रही घटनाओं से जोड़ने का प्रयास करेंगे और ‘पैर के अंगूठे से जमीन कुरेद रही थी वो’ जैसे जुम्ले आंतरिक मनोस्थिति को दर्शाने में अहम फर्ज अदा करते हैं। हिल स्टेशन का दृश्य रोचक है।

“चांद नगर” में राहुल की बातें शुरूआत में अच्छी नहीं लगी, जो संशोधन और संक्षिप्तता मांग रही है। उस हिस्से को पढते वक्त ये लगा कि बेमन से शुरूआत की हुई हो जैसे। बाकि कहानी अच्छी और रहस्यमयी है, प्रीति की विदाई सहन नहीं कर पाया मैं, रूला देने वाली है।

“धरती पुत्र” पाठक को जोड़े रखने वाली कहानी है, किसी सत्य घटना का चित्रण मालूम पड़ता है। “रात का सफर” पूरी कहानी में अच्छा रस है, शुरूआती प्रकृति-चित्रण बेहद दिलचस्प है। कहानी की कुछ पंक्तियां लिख देना चाहता हूं….

“आठवीं में पढती है और बातें करती है दार्शनिकों वाली” “जब कभी लड़ती थी तो बीच में ही मुद्दा ले आती थी” “मेरे और तुम्हारे पढ़ने के जाने के बाद अम्मी घर में काम में परेशान रहती है” “एक रात कितना परेशान किया था उसने जब रात में जब किताब अलमारी में रखते हुए बरखा का एक खत उसके हाथ लग गया था उसने अम्मा को बता डालने की धमकी तक दे डाली थी बड़ी मुश्किलों के बाद दो चॉकलेट, ढेर सारी टॉफियां लाने का वादा करके मनाया था उसे” ये पंक्तियां कहानी की पृष्ठभूमि के साथ पढने में काफी रस पैदा करती है।

और “प्रथम प्रेम” की आम युवा वर्ग की कई आपबीतियां जीवंत करती है, मेरी पहली रचना “अधूरी कहानी” से मिलती जुलती रचना है।

कहानी संग्रहः चांद नगर, कीमत 200 रूपये, प्रकाशन लक्ष्य बुक्स 

 

 

लेखक परिचयः रोशन वर्मा

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27 जुलाई 1971 को जन्में लेखक  रोशन वर्मा हरियाणा के ही कैथल जिले से संबंध रखते हैं। अब तक अनेक पत्र-पत्रिकाओं में काम कर चुके वर्मा ने अपने लेखकीय जीवन की शुरूआत 14 साल की उम्र में स्थानीय समाचार पत्रों से की। अब तक देश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनकी करीब-करीब हर विधा की रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं।उनकी पहली कविता 1985 में सुवेश एवं पहली कहानी 10 मार्च 1993 में दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित हुई। अब तक वे कहानी संग्रह ‘चांद नगर’ के अलावा, लघु कथा संग्रह ‘अब वहां’, गज़ल संग्रह ‘रूप नगर’ एवं हरियाणवी सिनेमा पर लिखी किताब ‘हरियाणवी सिनेमाः सदर्भ कोश’ शामिल हैं। उनकी रचनाओं का कई जगह पंजाबी एवं उर्दू में अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। उनके कहानी संग्रह का दूसरा संस्करण लक्ष्य प्रकाशन से जल्द प्रकाशित होने वाला है।

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