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“चेतावनी परजीवी जौंको को”

December 27, 2017 9:48 am by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

“चेतावनी परजीवी जौंको को”

— रामधारी खटकड़

कर उस दिन को याद महल पै तेरै चढाई हो ज्यागी
भूखी जनता काट्टैगी तनै , सिर करड़ाई हो ज्यागी…(टेक)

महंगाई तनै बढा-बढाकै मोटा माल कमाया रै
मेहनतकश के घर टोटे नै जमकै डेरा लाया रै
दिन-दिन सै बदहाल जिन्दगी क्रोध बदन म्हं छाया रै
सोचां सैं हम खड़े-खड़े , जा क्यूकर पिंड छुड़ाया रै
बेरा ना था नीत तेरी इसी हड़खाई होज्यागी..

घी-दूध के सपने आवैं , कुणबा सुख्या म्हारा रै
रोटी-दाळ तै काम चलै था,वो भी होग्या भारया रै
दाळ की कीमत चढी गगन म्हं मुश्किल होया गुजारा रै
गण्ठा रोटी नूण मिरच हाय यू खुसता जारया रै
याणे बालक भूखे रोवैं किस ढाळ समाई होज्यागी….

आलू प्याज गोदामां म्हं तनै छिपा-छिपाकै धर राखे
चोरबाजारी धंधा तेरा धन के कोठे भर राखे
जनता के हक लूट-लूटकै बेईमानां नै चर राखे
तू न्यूं सोचै सै या पूंजीवाद तेरी दादालाही होज्यागी….

संकट बढता जाना सै इब खून म्हं गर्मी आवैगी
मुक्ति की मशाल बलै तेरै सिर पै स्यात चढावैगी
मेहनतकश की ताकत जिस दिन पलकै ठाणा ठावैगी
किसे टूटज्यां सिस्टम के जब जनता जोश दिखावैगी
रामधारी की कलम चलै फिर खून की स्याही
होज्यागी…..

 

लेखक परिचय – रामधारी खटकङ हरियाणा के रोहतक में रहते है। लोक कवि और सामाजिक कार्यकर्ता है।

 

नोट:- प्रस्तुत Poem में दिये गये विचार या जानकारियों की पुष्टि हरियाणा खास नहीं करता है। यह लेखक के अपने विचार हैं जिन्हें यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। Poem के किसी भी अंश के लिये हरियाणा खास उत्तरदायी नहीं है।

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