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हरियाणा में फिर शुरु होंगे छात्र संघ चुनाव

कक्षा के मॉनिटर तक का फैसला होगा छात्रों के हाथ

June 24, 2016 3:50 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

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हरियाणा में आधे अधूरे यानि अप्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव करवाये जाने की घोषणा के बाद सत्ता पक्ष और विपक्षी दलों की और सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। एक और जहां सत्तासीन दल के छात्र संगठन और सत्तासीन पार्टी से ही जुड़े पूर्व छात्र नेता इसे प्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा लिया गया ऐतिहासिक फैसला बता रहे हैं वहीं विपक्षी दल इसे अपने लोगों को एडजस्ट करवाने की एक सोची समझी साजिश के तहत भी देख रहे हैं। आइये एक नजर डालते हैं हरियाणा में छात्र संघ चुनाव पर।

 

कब लगी थी छात्र संघ चुनाव पर रोक

1980 से लेकर 1990 के दशक में छात्र राजनीति काफी हिंसक हो चुकी थी। 1986 में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया यानि एसएफआई के राज्याध्यक्ष और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के छात्र नेता जसबीर सिंह की हत्या हुई। 1989 में एसएफआई से जुड़े हरियाणा कृषिविश्वविद्यालय के छात्र नेता सूबे सिंह श्योकंद की भी हत्या हुई। एमडीयू में भी छात्र संघ प्रधान देवेंद्र कोच की हत्या हुई थी। लगातार होते हिंसक माहौल को देखते हुए विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की सिफारिश पर 1996 में तत्कालीन बंसीलाल सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया।

पहले भी होते थे अप्रत्यक्ष चुनाव

1989 से पहले तक प्रदेश में अप्रत्यक्ष रुप से ही छात्र संघ के नेता चुने जाते थे लेकिन लंबे छात्र आंदोलन के बाद चौधरी देवीलाल की सरकार ने इसे प्रत्यक्ष रुप से करवाना शुरु किया था। वर्तमान भाजपा सरकार की घोषणा के बाद विपक्षी दल और उनसे जुड़े छात्र संगठन 27 साल पुरानी चुनाव प्रक्रिया को छात्रों पर थोपने का आरोप लगा रहे हैं।

 

क्या है आशंकाएं

एसएफआई जैसे वामपंथी छात्र संगठन जिनकी प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव करवाने में अहम भूमिका रही है सरकार के इस फैसले से आशंकाएं जता रहे हैं कि इससे सरकार खाना पूर्ति करती रही है। यह प्रक्रिया गैर लोकतांत्रिक है और सभी छात्रों को चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने का मौका नहीं मिलेगा साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि इससे सरकार अपने करीबी छात्र संगठनों के नेताओं को छात्रों पर थोपेगी जिससे छात्रों की मांग को सही तरीके से नहीं उठाया जा सकेगा। एसएफआई एवं अन्य छात्र संगठनों ने सरकार से प्रत्यक्ष चुनाव बहाली की मांग करते हुए आंदोलन की चेतावनी भी दी है। वहीं भारतीय जनता पार्टी की छात्र ईकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने इसे ऐतिहासिक फैसला करार दिया है और सरकार के फैसले का स्वागत किया है।

 

क्या होगी अप्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव की प्रक्रिया

सरकार की घोषणा के अनुसार आरंभ में कक्षा स्तर पर रिप्रेजेंटेटिव या कहें मॉनिटर चुनें जायेंगें उसके बाद ये मॉनिटर ही कॉलेज के अध्यक्ष का चुनाव करेंगें। विश्वविद्यालयों में यह प्रक्रिया कला, वाणिज्य, विज्ञान आदि संकायों के अनुसार अपनाई जायेगी। सरकार का कहना है कि रिप्रेजेंटेटिव सर्वसम्मति से चुनें जायेंगें।

प्रत्यक्ष चुनाव से क्यों बच रही है सरकार

प्रत्यक्ष चुनाव प्रक्रिया को लेकर तर्क दिया जा रहा है कि इससे छात्र राजनीति में हिंसा व अधिक पैसा खर्च होता है जो अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से नहीं होगा। लेकिन सरकार का यह तर्क कुतर्क जैसा है अन्य चुनावों में भी छिटपुट हिंसा की घटनाएं होती है तो क्या कल को उन चुनावों की प्रक्रिया भी इसी आधार पर हो जायेगी।

क्या पिछले दो दशकों में थम गई छात्रों की हिंसक घटनाएं

पिछले बीस सालों में क्या वाकई छात्र राजनीति नहीं हुई और किसी छात्र नेता की हत्या भी नहीं हुई। अकेले कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पिछले दशक में ही कई छात्र नेताओं की हत्या हो चुकी है। असल में छात्रों के बीच हिंसा का कारण चुनाव नहीं बल्कि आपसी गुटबाजी और कहासुनी होती है। ओर ज्यादा गहराई से पड़ताल की जाये तो इसका कारण राजनीतिक पार्टियों में हिंसात्मक गतिविधियों में लिप्त छात्र और युवाओं को दिये जा रहे अवसर भी मिलेंगें।

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