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दबे कुचले लोगों का “प्रभात”

February 1, 2017 10:03 am by: Category: शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

आज हरियाणा के मजदूर आंदोलन के जुझारू और अगवा नेता दिवगंत साथी कामरेड प्रभात सिंह की जयंती है। 47 वर्ष की कम उम्र में 24 अक्टूबर 2008 को एक सड़क दुर्घटना ने हमसे एक लोकप्रिय साथी को छीन लिया और इस हम असहाय की स्थिति में कुछ भी कर पाने की हालत में नही थे। (प्रभात सिंह का जन्म 1 फरवरी 1961 को हिसार जिले के न्योली कलां गाँव में एक किसान परिवार में हुआ था) प्रभात सिंह सीटू के प्रांतीय प्रधान और लंबे समय तक उपप्रधान भी रहे तथा अन्य जनसंगठनों के राज्य स्तरीय पदाधिकारी भी रहे वहीं माकपा राज्य सचिव मण्डल के सदस्य भी चुने गये।

सीटू का 3 दिवशीय राज्य स्तरीय शिक्षा शिविर 24,25,26 को पहले से ही रोहतक में निर्धारित था, कामरेड प्रभात को भी उसमें शामिल होना था। सीटू राज्य अध्यक्ष की जिम्मेदारी मुझपर होने के नाते सुबह 8:30 के बीच मेरे पास प्रभात का फ़ोन आया की मैं दोपहर बाद शामिल हो पाऊंगा। क्योंकि उनके पिता श्री अर्जन सिंह पहले से ही बीमार थे और जीवन साथी बिमला भी बीमारी के चलते अग्रोहा मेडिकल कालेज में उपचाराधीन थी। 2 बजे के आसपास मैंने ही कामरेड को फ़ोन किया और पूछा आ पाओगे या नही तो तब उन्होंने कहा कि आने की स्थिति में नही हूँ।

मुझे तेज़ बुखार होने के चलते शाम को घर ( भिवानी ) आना पड़ा,जब मैं बस स्टैंड से घर के लिए ऑटो मे था तभी किसान नेता मास्टर शेरसिंह ने फ़ोन करके जानकारी दी कि प्रभात इस दुनियां में नही रहे,जिसको मैं किसी भी सूरत में यकीन करने को तैयार नही था,उनका फ़ोन कटते ही कर्मचारी नेता रामफल देशवाल ने भी मुझे फोन करके ऐसा ही कुछ बताया।

ऑटो से उतरते ही मैंने तुरन्त सुखबीर जो रोहतक में शिक्षा शिविर में ही था ( कामरेड प्रभात का बेटा वर्तमान में सीटू राज्य कोषाध्यक्ष ) के पास फोन किया जो कामरेड सुरेश ने उठाया और बताया कि ऐसा कुछ नही है,बस चोट लगी है हम हिसार के लिए निकल चुके हैं,इससे भी मेरी तसल्ली जब नही हुई तो मैंने कामरेड सुरेंद्र सिंह ( महासचिव सीटू हरियाणा) से फोन करके पूछा तो मुझे जानकारी मिली की प्रभात का एक्सीडेंट हुआ है और उन्हें ज्यादा चोट लगी है। शायद कामरेड सुरेंद्र को सच्चाई का पता था पर उनकी ये हिम्मत नही हो पा रही थी की ये बता पाये की प्रभात शाररिक रूप से अब हमारे बीच नही रहे।

मेरी कामरेड सुरेंद्र से बात होते ही मैंने तुरन्त मास्टर जी के पास फ़ोन किया और हमारे सम्मानित साथी होते हुए भी मैंने उनको कुछ भला बुरा भी कह दिया की कम से कम पूरी जानकारी न हो तो ऐसे कुछ भी नही बोलना चाहिए और प्रभात को कुछ नही हुआ वे ठीक हैं, मास्टर जी भी मेरी बात का बुरा इसलिए नही माने कि उनको मेरी बातों से ज्यादा प्रभात सलामत है शायद ये ज्यादा ख़ुशी थी। परन्तु मेरे दिलोंदिमाग में फिर भी कुछ कुछ ख्याल आते रहे। मैंने घर जाते ही हिसार सीटू कार्यालय के लैंडलाइन नम्बर पर फ़ोन किया,जैसे ही फ़ोन उठाया गया तो मुझे समझने में एक सैकेंड भी नही लगी की कामरेड प्रभात सिंह अब नही रहे क्योंकी जिस साथी ने फ़ोन उठाया वो मेरी आवाज सुनते ही वह अपने आपको रोक नही पाया और उसके आसुंओं ने सब बयां कर दिया। मेरे घर में हम सबको ही ऐसा लग रहा था जैसे अब इस दुनिया में कुछ बचा ही नही,क्योकि व्यक्तिग रूप से प्रभात का सिर्फ मुझपर ही नही मेरे पुरे परिवार पर ही न सिर्फ प्रभाव था बल्कि उनसे बहुत ज्यादा प्यार भी था हम सबको ही। तभी 2004 के भट्ठा मजदुर आंदोलन के दौरान उनकी कही हुई बात अचानक मुझे याद आई कि विनोद यार देख लेना तुम एक दिन मेरी मौत सिर्फ 2 तरह की होगी या तो किसी आंदोलन में शहादत मिलेगी नही तो कभी न कभी सड़क दुर्घटना में, क्योकि कामरेड आमतौर पर बहुत लंबा सफर मोटरसाइकिल पर तय करते थे न दिन का पता था और न रात का।

दुर्घटना से 4-5 पहले ही प्रभात का मेरे पास फ़ोन आता है कि मैं और बिमला रेल से भिवानी आ रहे है तुम मुझे स्टेशन पर अपनी बाइक दे जाना मुझे लोकरी ( कामरेड राजसिंह के घर छोटे बेटे के रिश्ते के लिए जाना था ) जाना है,अगले दिन शाम को कामरेड रोहतक पार्टी बैठक से सीधे भिवानी आते है बाइक देने और आते ही बोलते है भूख लगी है कुछ खाने को है क्या मैंने कहा थोड़ी देर में रोटी बन जायेगी,बोला नही अभी जाना पड़ेगा मुझे घर बूढ़ा ( पिताजी ) बीमार है कुछ भी हो वही लाकर दे दो रोटी घर जाकर खा लूंगा,तब मेरी 8 वर्षीय बेटी दीपू ( दीपिका ) ने उनको कुछ खीरे लाकर दिए,वही अंतिम भोजन था हमारे घर प्रभात का।

प्रभात से मेरी मुलाकात:-खेती की 5 एकड़ जमीन होने के बावजूद उसमे आमदनी रामभरोसे यानी बरसात पर ही निर्भर थी,इस बेरोजगारी के चलते मेरा परिवार भट्ठा मजदूर के रूप में भेरिया ( हिसार ) के भट्ठे पर काम करने गया हुआ था। मैं अपने गाँव में अपनी दादी के पास रहते हुये 1991 में 5वीं कलास में साथ लगते गाँव एक प्राइवेट स्कूल में जाता था। बुखार की वजह से कई दिन स्कूल से गैरहाजिर रहने पर एक अध्यापक द्वारा मेरी पिटाई ने मुझे स्कूल को अलविदा कहने पर मजबूर कर दिया।

1992-93 में अपने परिवार के साथ एक बाल मजदूर के रूप में उसी भट्ठे पर चला गया। अक्सर प्रभात वहां मजदूरों की मीटिंग करने के लिए आता था और जैसे ही प्रभात आता तो सब मजदूर काम छोड़कर उसके आसपास बैठ जाते उनमे मेरे पिताजी भी होते थे। जैसे ही प्रभात वापिस जाता मैं अपने पिताजी जी पूछता की कौन है ये और क्यों आता है यहां,तब मुझे बताया जाता की ये यूनियन का प्रधान है इससे मालिक बहुत डरते है आदि आदि।

1994 की फरवरी के महीने में रात के समय प्रभात फिर आता है और मजदूरों की मीटिंग करते हुये मालिको की लूट और मजदूरों के शोषण की बात करते हुये मार्च में अनिश्चित कालीन हड़ताल पर जाने का अपने जोशीले स्वभाव मेंआह्वान करता है,जिसका निश्चित रूप से मुझपर भी कुछ प्रभाव पड़ा,और उसी दिन हड़ताल को सफल बनाने के लिए भट्ठा कमेटी ( जिसको आज हम संगठन की प्राथमिक इकाई कहते हैं ) का गठन किया गया। अंधों में काना राजा वाली कहावत है जब कमेटी बनाई गई,उसका सचिव चुनने का सवाल आया तो मेरे इलावा एक भी मजदूर ऐसा नही था जो एक दिन भी स्कूल गया हो और मजदूरों की इसी मजबूरी ने मुझे उस कमेटी का सचिव बना दिया। उसके बाद भी प्रभात 3-4 बार वहां आया और उनसे बातचीत होती रही।

मार्च में हड़ताल शुरू हो जाती है मालिक लोग पूरी तरह से मजदूर आंदोलन को कुचलने पर उतारू होते हैं जगह जगह झगडे,मारपीट मालिकों द्वारा गुण्डे भट्ठों पर बैठाये जाने की इधर उधर से खबरे मिलती हैं। मजदूर नेताओं के खिलाफ झूठे पुलिस केश दर्ज और गिरफ्तारियां होती हैं,और इन्ही गिरफ्तारियों में सीटू के वर्तमान प्रधान कामरेड सतबीर सिंह के साथ 4 अन्य मजदूरों को भी पुलिस उठा लेती है। मुझे आज भी अच्छे से याद है इस गिरफ्तारी के विरोध में हजारों मजदूर हिसार कोर्ट में जमा थे। प्रभात सिंह मालिकों की शोषणकारी नीयत और मजदूरों के अधिकारों और संघर्ष आदि सवालों पर मजदूरों को संबोधित कर ही रहे थे कि इसी वक्त हाथ में हथकड़ी लगे हुये सतबीर सिंह और अन्य गिरफ्तार मजदूरों को पुलिस कोर्ट में पेश करने के लिए लेकर आई,एक तरफ मजदूर हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है जैसे नारे लगा रहे थे तो दूसरी तरफ से गिरफ्तार साथी बड़े ही जोश के साथ इंकलाब जिंदाबाद,सीटू जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। इन नारों की आवाज़ हिसार कोर्ट की दीवारों से टकराकर वापिस आ रही थी। मजदूरों के चेहरे देखकर एक बार तो ऐसा लग रहा था जैसे ये अभी हर कानून कायदों को तोड़ते हुए पुलिस के चंगुल से अपने नेताओं को एक मिनट में आज़ाद करवा लेंगे,पर ये गुस्सा प्रभात के द्वारा कहे गए इस शब्द के साथ शांत हुआ की हमारी लड़ाई आज सीधे तौर पर मालिक वर्ग से है पुलिस से नही,बेशक हमारे साथी जेल में रहे पर हमें अपनी लड़ाई को हर सूरत में जारी रखना है। प्रभात के इस भाषण और गिरफ्तार साथियों द्वारा बेखोफ होकर लगाये जा रहे नारों ने मुझपर भी एक अमिट छाप छोड़ी क्योकि इससे पहले मैंने कभी ये कल्पना ही नही की थी कि कोई इस तरह भी पुलिस के खिलाफ बोल सकता है या उसके सामने नारे लगा सकता है।

हड़ताल के दौरान एक रात सुबह करीब 4 बजे हमारे पास साथी कृष्ण कुमार ( जिसकी प्रभात से पहले ही आंदोलन के दौरान 14-4-2002 को एक सड़क दुर्घटना ने हमसे छीन लिया ) आते हैं और बोलते है कि कुछ इलाकों में हड़ताल कमजोर हो चुकी है इसलिए वहां पैदल मार्च करना है थोड़े लोग होंगे तो पुलिस प्रभात को भी गिरफ्तार कर लेगी और हमारा आंदोलन कमजोर हो जायेगा। कृष्ण ने कहा कि आप हमारे साथ चलिए मेरे समेत अन्य और दर्जनों मजदूर बिना देरी किए उनके साथ चल पड़े। प्रभात के नेतृत्व में टोकस पातन,जाखोद खेडा,मात्रश्याम के करीब दो दर्जन भट्ठों पर करीब 20 किलोमीटर का पैदल मार्च करते हुए हम न्योली कलां प्रभात सिंह के गाँव पहुँचे। उस समय मैं नही समझ पाया पर अब समझ में आ रहा है कि हम 250-300 मजदूरों में से सिर्फ 8-10 ही लोगों से प्रभात एक बन्द कमरे में अकेले बात क्यों कर रहा था,शायद वो उसके सबसे विश्वनीय साथी थे इसीलिए। कुछ देर बाद प्रभात सिंह उस कमरे से बाहर आये और आकर एक बार फिर मजदूरों को अपने जोशीले भाषण से संबोधित करते हुये हर गुंडागर्दी का मुकाबला करने के लिए तैयार रहने का आह्वान किया और उसके ठीक 20 मिनट बाद गाँव के ही एक भट्ठे पर मालिकों के आठ-दस गुंडे जो शकल से पेशेवर अपराधी लग रहे थे,ये गुण्डे मजदूरों को हड़ताल तोड़ने पर मजबूर कर रहे थे उसी भट्ठे पर पैदल मार्च करते हुए जैसे ही हम वहां पहुंचे मालिकों के इन गुंडों ने प्रभात को निशाना बनाते हुए हमला किया और कुछ ही देर में गोली चलने की आवाज सुनाई दी निशाना इसलिए चुक गया क्योंकि तोशाम के रहने वाले माईराम नाम के एक मजदुर ने गुण्डे को गोली चलाते हुए देख लिया और वह मजदूर उसकी बन्दुक पर झपट पड़ा। प्रभात से करीब 2 फिट की दुरी पर वो गोली जमीन में लगी। लेकिन प्रभात का हौसला और मजदूर पर उसका विश्वास गोली चलने के बावजूद भी डगमगाया नहीं,मजदूरों के दम पर मालिकों के गुंडों की बंदूक छीन कर तोड़ दी और उन गुंडों को घुटनों के बल चलने पर मजबूर कर दिया। मुझे आज भी अच्छे से याद है की प्रभात के इर्द गिर्द 8-10 लोग उसके बॉडीगार्ड के रूप में खड़े थे जिनमे मैं भी शामिल था। उसी के बाद प्रभात की नजर में मैं विश्वशनीय हुआ। यही वो निर्णायक घटना थी जिसकी बदौलत मैंने यहाँ तक का सफर तय किया है। लम्बी हड़ताल में आगे आगे मजदुर और उनके नेता, तो पीछे पीछे पुलिस और मालिको के गुण्डे । कब किसकी जान जायेगी,किसकी मौत होगी इसका अंदाज़ा नही लगाया जा सकता था क्योकि इससे पहले भी जानलेवा हमले हो चुके थे और इन हमलों में हिसार में 14 मार्च 1991 को हवासिंह और उसके ठीक 7 दिन बाद 22 मार्च को रोहतक में सूरतसिंह को अपनी शहादत देनी पड़ी थी। सैकड़ों लोग हैं जो अलग अलग तरह से इस गुंडागर्दी का शिकार हुये थे। 1994 की ढाई महीने लम्बी हड़ताल के बाद भी लड़ाई न जीते न हारे,और मजदूर भी ये तय कर चूका था की मार जाएंगे,लेकिन बिना जीत के मालिकों के सामने सर झुकाकर काम नही करेंगे। मजदूर भट्ठों पर रहने की बजाए अपने गावों में चले गये। इस आंदोनल में मालिक और उनके गुण्डे हमेशा इस ताक में रहते थे कि कब प्रभात की हत्या की जाये,पुलिस इस फिराक में थी कि कब उसको गिरफ्तार किया जाये,लेकिन प्रभात हमेशा एक बात कहते थे कि मरने का पता नही पर जब तक मैं खुद पेश नही होता तब तक पुलिस मुझे पकड़ नही सकती। आंदोलन को भूमिगत रहते हुये कैसे संचालित करना है ये पूरा अनुभव प्रभात को हो गया था। इसी आंदोलन के दौरान कि मुझे एक घटना याद है कि प्रभात के छोटे भाई राजा की सगाई के लिए रिश्तेदार आये हुए थे पुलिस को इसकी भनक लग गई और पुलिस ने कामरेड के घर को घेर लिया जैसे ही पुलिस दिखाई दी प्रभात अपने मकान की छत से दूसरे की छत पर होते हुए गली में कूद गया और पीछे पुलिस-आगे प्रभात लेकिन प्रभात पुलिस के हाथ नही आया। ऐसा ही खानक पहाड़ के मजदूर आंदोलन में हुआ सीटू नेता सतबीर सिंह,धर्मबीर कुंगड़ सहित अन्य 3 साथियों को समझौता वार्ता के बहाने गिरफ्तार कर लिया गया था अब प्रभात ही बचा था जिसके इर्द गिर्द पूरा आंदोलन निर्भर था। प्रभात ने पुरे 2 महीने से ज्यादा भूमिगत रहते हुए आंदोलन का नेतृत्व किया। मैं खुद पूरा समय उनके साथ इस था बहुत नजदीक से ये सब देखा।

1994 के आंदोलन में प्रभात पर भी अनेको झूठे पुलिस केश बने आंदोलन समाप्त होने के बाद प्रभात ने मुझे कहा कि चल मुझे कोर्ट में ले चल पेश होना पड़ेगा उस समय तक पेश होने का क्या मतलब होता है ठीक ठीक मुझे ये भी पता नही था,मैंने सोचा हाजरी लगाकर वापिस आना होगा, कामरेड जैसे ही गये जाते ही पुलिस ने उनको बैठा लिया और पेश करके 10 दिन के लिए जेल भेज दिया गया,मैं अकेला वापिस दफ्तर आया और खूब रोया,तब कई साथियों ने मेरा ये कहते हुए बहुत मजाक उड़ाया की पहले तो अपनी माँ यानी प्रभात को जेल में जाने के लिए छोड़ आया और तब रो रहा है।

इसके बाद 2008 तक के दर्जनों मोके ऐसे हैं चाहे वो भट्ठा मजदूर आंदोलन के हों या फिर खानक पहाड़ का आंदोलन। जिसमे प्रभात की निर्णायक भूमिका रही और मुझे उनके साथ रहने का मौका मिलता रहा। सिर्फ आंदोलन ही नही 1994 से 1998 तक मैं ( 1998 में मुझे भिवानी संगठन की जिम्मेदारी के तहत आना पड़ा ) प्रभात के साथ उनके ही घर,उनके पास रहा। उनके साथ रहते हुए मैंने उनकी जो हालत देखी उस पर शायद बाहर के दायरे के लोगों को यकीन नही होगा की प्रभात संगठन के लिए रोजमर्रा के खर्चों के लिए तो तंगी भुगतता ही था साथ साथ घर के लिए भी एक एक पैसे के लिए तरसता था । हर रोज़ घर में रोटी,दवाई पानी और बच्चो की पढ़ाई के लिए पैसों की तंगी का सामना किया लेकिन इसके बावजूद कभी मजदूर वर्ग से दगा करने का ख्याल तक उनके मन में नही आया। कामरेड की सादगी एक उदाहरण मैं दे सकता हूँ जिसका मैं खुद गवाह भी हूँ । प्रभात जब भी भिवानी आते थे आमतौर पर मेरे पास ही रुकते थे एक बार वो आये और बोले विनोद कपड़े नही रहे चल तेरे वाली 11 नम्बर दूकान पे चलते हैं ( भिवानी की कृष्णा कालोनी में इस्तेमाल किए हुये कपड़े बेचने की एक दूकान थी जो आज भी पुराना बस स्टैंड पर है जहाँ से आमतौर पर हम दोनों 100 रूपये में एक पेंट और एक कमीज लेते थे ) वहां से एक दो जोड़ी कपड़े लेकर आते हैं जब हम गये उस दूकान पर तो वहां पहले से ही 3-4 भट्ठा मजदूर खुद कपड़े लेने आये हुए थे हमे देख कर वो शरमाने लगे की ये यानी हम उनको क्या कहेंगे कि पुराने कपड़े ले रहे हैं,मैं भांप गया कि ये मजदूर क्या सोच रहे हैं और मैंने प्रभात को बताया तो प्रभात उन मजदुरो से बोला भाई मेरे सकोच ना करो जिस काम से तुम यहां आये हो हम भी उसी काम से आए हैं तब उन मजदूरों को बड़ी राहत मिली और वो हमारे लिए साथ की एक दूकान से चाय लेकर आये। उसके बाद प्रभात दो जोड़ी कपड़े लेकर हिसार के लिए रवाना हो गए।

प्रभात के अंदर वर्गीय समझ कितनी गहरी थी ये एक घटना से अंदाज़ा लगाया जा सकता है एक बार हम दोनों एक जिले में मजदूरी बढ़ोतरी के लिए आयोजित समझौता वार्ता में एक साथ थे,एक भट्ठा मालिक ने प्रभात को सम्बोधित करते हुए कहा रै प्रभात इंन नै ( मजदूरों को ) और कितणा कै दिवावगा तो प्रभात बड़े ही सहज भाव से कहता है सेठ जी मैं तै इन नै इतना दीवाण्या चाहूँ हूँ के एक दिन तेरा बी यही जी करै की मैं भी इन मजदुरों के साथ पथेर भराई निकासी ऐ कर लूँ। प्रभात अनपढ़ भट्ठा मजदुरो के बीच सीटू की वर्गीय समझ को ले जाने के लिए आमतौर पर अपने भाषण में एक बात कहता था कि ” मालिक तो नाम में ही खोट है,मालिक तो गधे का भी भला नी हौंदा वो भी या ऐ सोचगा कै घास घाट तै घाट खा और ईंट 35 की बजाए 60 लाद कै भट्ठे ताये चौकड़ी ना तोड़,वो कहते थे कि 100 में से 10 लोग करते कुछ भी नही और मालिक सबकुछ के हैं 90 प्रतिशत लोग दिनरात खून पसीना भाते है फिर भी भूखे मरते हैं और ये 10 लोग 90 लोगों का खून चुसके जी रहे है ये वो अमर बेल है जिसकी अपनी कोई जड़ नही होती खुद हरी रहेगी लेकिन जिस पेड़ पर पड़ जाती है उसको सूखा देती आदि आदि।

प्रभात का मजदूरों के प्रति प्रेम और बेहद लगाव की अनेको मिसाल दी जा सकती हैं। वह आमतौर पर कहते थे कि मैं पैदा जरूर किसान के घर हुआ हूँ लेकिन मजदुर का गोद लिया हुआ बेटा हूँ। यही कारण है कि आज भी प्रभात के ना होने बावजूद भी उनका प्रभाव मजदूरों में कम होने की बजाए और बढ़ा है। कितनी ही बार कुछ लोग प्रभात को ये कहते हुए सुनाई दिए प्रभात ये मजदूर शराबी है,टीबी जैसी अनेको बीमारियों से घिरे हुए है तुम इनके लिए लड़ रहे हो ये तो ठीक है पर कम से कम इनके साथ रोटी खाने या उनके बिस्तर में सोने से तो परहेज कर ले नही तो तु भी इनकी तरह बीमार पड़ जाएगा,ये सुनकर प्रभात बड़ी ही अजीब सी मुस्कुराहट और मजदूरों का पक्षधरता बनकर कहता था कि जिस मजदुर में ये सब बिमारी हैं जिस मजदूर में समाज को बांस (बदबू ) आती है यही वास्तव में इस दुनियादारी की निर्माता है इसी द्वारा बनाई हर चीज़ है ये न हो तो समाज ( दुनिया ) की साँसे बन्द हो जाती और आप मुझे इन्ही से दूर रहने की शिक्षा दे रहे हैं? यही प्यार था मजदूरों के प्रति की प्रभात जहाँ भी उसको दिखाई देता बिना देरी किये उनके पास चला जाता उनको संगठित करने के लिए।

प्रभात के अंदर सिर्फ मजदूरों को उनके आर्थिक हक दिलवाने की ही ललक नही थी बल्कि वह छुआछात और जाति उत्पीड़न का भी कट्टर विरोधी था। अनेको घटनाये याद आ रही है जिनमे प्रभात खुद पहलकदमी लेता था और इस तरह के उत्पीड़न के खिलाफ मजबूती से अपना पक्ष रखता था। एक बार की घटना है एक भट्ठा मजदुर आंदोलन के कार्यकर्ता मखन लाल ( डाबला गाँव राजस्थान ) के बेटे की शादी थी गाँव राजपूत बहुसंख्यक था इसलिए घुड़चढ़ी नही होने देने की धमकी मखन के परिवार को दे दी गई। मखन ने कामरेड प्रभात को ये बात बताई तो प्रभात अपने साथी कामरेड सतबीर और अन्य साथियों को लेकर ना केवल उसके गाँव जा पहुँचा बल्कि किसान नेता अमराराम जो उस वक्त माकपा के विधायक थे,से बात करके पुलिस को बुलाया और घुड़चढ़ी करवाकर ही वापिस आया। कुछ लोग बड़ी आसानी से ये भी बोल सकते हैं कि खुद पर बीते तो जाने,और मैंने कुछ ऐसे लोग भी देखे हैं जो जातिवाद पर चोट तो करते हैं लेकिन जब बात खुद के घर की हो तो उनकी साँसे तेज़ चलने लग जाती है ,पर प्रभात के कदम इस सवाल पर भी कभी नही डगमगाये । छोटी बहन ने प्रभात के सामने जब ये सवाल रखा की भाई मैं मेरे साथ पढ़ने वाले एक दलित सहपाठी से शादी करना चाहती हूँ तो प्रभात ने बिना किसी की परवाह किये पूरे गांव और इलाके का विरोध का सामना करते हुए खुद अपने हाथों से ही अपनी बहन की शादी दलित परिवार में की ये बात अलग है कि सालों साल प्रभात और उड़के परिवार ने सामाजिक उत्पीड़न सहन किया।

प्रभात की एक बात हमेशा याद रखने वाली है वो कहते थे की हम जिसके लिए लड़ रहे हैं और जो इस लड़ाई में हमारे साथ चल रहा है उससे ज्यादा और कोई भी विश्वशनीय नही हो सकता और जो सबसे ज्यादा विश्वशनीय है उसी साधारण मजदूर को,मजदूर से कार्यकर्ता और कार्यकर्ता से नेता के रूप में विकशित करो। कामरेड जोर देकर कहते थे कोई भी व्यक्ति चाहे कितना भी लड़ाका क्यों ना हो या उसने चाहे कितनी ही बड़ी कुर्बानियां क्यों ना दी हों पर सबसे बेहतर नेता वही है जो संगठन में ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ता विकसित करता है। जो ये काम नही करता वह ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी नही निभा रहा होता। ये बात उन्होंने खुदपर लागू करके भी दिखाया। उनके रहते हुए ही जब मुझे लाल झंडा भट्ठा मजदूर यूनियन का राज्य अध्यक्ष और सुरेश को महासचिव चुना गया तो बड़ी ही ख़ुशी और स्नेह के साथ मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझसे जो बात उन्होंने बोली थी वो आज भी मेरे कानों में गूंज रही है कि विनोद मैं आज बहुत खुश हूँ कि वास्तव में जिन लोगों की यूनियन है उन्ही में से उनका नेता विकसित हुआ है और मेरा तो ये सपना है कि एक दिन मैं सामने दरी पर बैठूं और तुम्हारा भाषण सुनू। (दुर्भाग्यवश आज प्रभात मेरा भाषण सुनने के लिए मौजूद नही है) ये बात सुनने में मामूली सी या सिर्फ अपनापन वाली लगती होगी लेकिन इसमें कितनी गहराई है इसका अंदाज़ा सहजभाव से नही लगाया जा सकता।

मैं हमेशा से ही यह महसूस करता रहा हूँ आज भी कर रहा हूँ कि प्रभात मेरे लिए सिर्फ एक राजनैतिक,सांगठनिक जन्मदाता ही नही थे बल्कि वो बड़े ही गर्व के साथ जैसे एक बाप अपने बेटे के प्रति जिम्मेदारी निभाता है ठीक उसी तरह उस जिमेदारी को उठाते थे। जब मेरी शादी का सवाल आया तो मुझे जन्म देने वाले माँ बाप से ज्यादा ख़ुशी प्रभात के चेहरे पर दिखाई दी, क्योंकि मेरी शादी के प्रति सभी जिम्मेदारियां हिसार में एक साथ रहते हुए उन्होंने और संगठन ने ही उठाई थी।

प्रभात जिस साथी को जितना प्यार करते थे उसकी कमजोरियों पर उसके आलोचक भी उतने ही थे लेकिन इस पूरी आलोचना में उनका नजरिया सुधार और विकास पर आधारित था ना की किसी को नीचा दिखाने या उसको लज्जित करने का।

प्रभात अक्सर महिलाओं के बारे में एक बात कहता था कि आज महिलाओं की सुंदरता का जो पैमाना समाज ने बना रखा है कि ” नाक सुआ सा मुहँ बटवा सा रंग गोरा गोरा इसको बदले बिना महिलाओं को भी न्याय नही मिल सकता और वे जोर देकर कहते थे की जब तक महिलाओं की सुदरता का पैमाना आज कागज चुगने वाली ( कूड़ा बीनने वाली) महिला को देख कर जब तक ये नही कहा जाता कि एडी फट्टी फट्टी सी ,मुँह भुंडा सा,होठ गुलगुले से और रंग काला सा लिए ये देखो एक सुंदर सी महिला कंधे पर पल्ली लटकाये कितनी मेहनत कर रही है तब तक महिलाओं की मेहनत का हिसाब नही लगाया जा सकता और जब तक महिला की इस मेहनत का हिसाब नही लगता समाज शोषण की बेड़ियों से मुक्त नही हो सकता।

प्रभात को हम सब से बिछड़े हुए 8 साल हो चुके हैं परंतु आज भी ऐसा लगता है कि ये कल की ही बात हैं। निश्चित ही येे बड़ी पीड़ादायक और अहसनिये तकलीफ थी और आज भी है। परंतु पूरी टीम के साथियों ने न केवल एक दूसरे को हौसला दिया बल्कि प्रभात जिन विचारों का प्रहरी था उन विचारों को आगे बढ़ाते हुये संघर्ष को आगे ले जाने की ललक पैदा की और आज बेशक प्रभात शाररिक रूप से हमारे साथ नही है उनकी कुर्बानियों को कोई भुला नही सकता,तमाम तरह के शोषण के खात्मे पर विजयी होकर समानता पर आधारित समाज के निर्माण के क्रांतिकारी विचार को कोई मार नही सकता। हम लड़ेंगे,हम कुर्बानियां देंगे और एक दिन निश्चित ही जीतेंगे इसी उम्मीद के साथ,प्रभात के साथी,प्रभात जैसे साथी, प्रभात के पदचिन्हों पर और प्रभात के दिखाये रास्ते पर सैकड़ो साथी साथ चल रहे हैं।

प्रभात की याद में हरियाणा के मजदूर आंदोनल के केन्द्र यानी सीटू के राज्य कार्यालय के निर्माण पर लगभग 47 लाख रूपये खर्च करके इसी टीम के सहारे बना पाने म हम कामयाब हुए हैं। इस बीते अर्से में हुए आंदोलनों में मजदूरों की भागीदारी भी 2-3 गुणा तक बढ़ाने और सीटू की सदस्यता के साथ साथ राज्य स्तर की कुछ और यूनियनों का निर्माण कर पाने में सफलता और ये सफलता निश्चित ही कार्यकर्ताओं की सख्या बढ़ोतरी के साथ ही हो पाई है।

लेकिन इसके बावजूद हम सबके लिए ये आत्मसंतुष्टि का समय नही है कि बहुत कुछ हो गया सच तो ये है कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है अभी तो हम सिर्फ नाममात्र के हिस्से तक ही पहुच पाये हैं बहुत बड़ी संख्या से अभी हम कोसों दूर हैं और जब तक इस बहुमत संख्या से दूर रहेंगे प्रभात का सपना साकार नही हो सकता । मेहनतकश जनता को लामबंध करना ये आज के दौर में और भी ज्यादा जरूरी है क्योंकि आज इस देश प्रदेश में जिस योजनाबद्घ तरीके से जनता की रोजी रोटी पर हमला बढ़ रहा है वहीं भाजपा और आर.एस. एस जैसी साम्प्रदायिक ताकते समाज के ताने बाने को तहस नहस करते हुए मेहनतकशों के बीच नफरत के बीज बो रही है उससे हमारा देश आज़ादी,भाईचारे को खतरा पैदा हो गया है । इसलिए आइये हम सब मिलकर हमारे अंदर जो भी कुछ छोटी मोटी कमजोरियां हैं या इस जिम्मेदारी के प्रति उदासीनता है उसे मिलकर तोड़े और और आगे बढ़ें। यही प्रभात को सच्ची श्रदांजलि होगी,सही मायने में प्रभात के प्रति यही हमारा सच्चा संकल्प होगा।

मैं ना लेखक हूँ और ही कोई कवि जो इन सब यादों को सुंदर शब्दो में लिख पाता। ट्रेड यूनियन जीवन के अपने लगभग 23 में से 15 साल प्रभात के साथ काम करते हुए जो अनुभव किया,जितना उससे सिखा उसी में से कुछ पहलुओं पर जिनका आज भी मेरे सांगठनिक जीवन में अहम योगदान है सिर्फ वही कुछ बातें लिखी हैं,और ये सिर्फ मैं ही दावा नही कर रहा की मैं उनके बहुत घनिष्ठ था,बल्कि मेरे जैसे और कितने ही ऐसे साथी होंगे जो अलग अलग मौकों पर प्रभात के साथ रहे,उनके अपने अनुभव हैं कुछ इसी तरह के हैं।

( मेहनतकश वर्ग की और से प्रभात सिंह को सलाम )

दबे कुचले लोगों का

“प्रभात”

भट्ठे की आग,मजदूरों संघर्ष,

सूरज की लालिमा से निकला है,

“प्रभात”

कामरेड प्रभात सिंह अमर रहें।

विनोद कुमार, मजदूर संगठन सीटू के नेता हैं।

 

दबे कुचले लोगों का “प्रभात” Reviewed by on . आज हरियाणा के मजदूर आंदोलन के जुझारू और अगवा नेता दिवगंत साथी कामरेड प्रभात सिंह की जयंती है। 47 वर्ष की कम उम्र में 24 अक्टूबर 2008 को एक सड़क दुर्घटना ने हमसे आज हरियाणा के मजदूर आंदोलन के जुझारू और अगवा नेता दिवगंत साथी कामरेड प्रभात सिंह की जयंती है। 47 वर्ष की कम उम्र में 24 अक्टूबर 2008 को एक सड़क दुर्घटना ने हमसे Rating: 0

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