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डांस पे चांस नहीं, डांसर पे गोली मार दे

December 19, 2016 9:51 am by: Category: खबर खास 1 Comment A+ / A-

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एक फिल्मी गाना है- डांस पे चांस मार ले पर पंजाब के मौड़ मंडी कस्बे में एक शादी समारोह के दौरान डांसर के साथ डांस करने का चांस न मिलने पर दूल्हे के भाई ने डांसर को ही गोली मार दी, जिसके चलते स्टेज पर गाने की धुन पर थिरकती डांसर देखते-देखते ढेर हो गई। शादी समारोह में अफरा-तफरी मच गई। शादी समारोह एकदम मातम में बदल गया। यह कोई पहली घटना नहीं है। अभी इससे पहले हरियाणा में करनाल के निकट एक शादी समारोह में पहुंची साध्वी देवा ठाकुर और उसके साथियों द्वारा चलाई गई गोलीबारी का कांड ठंडा नहीं हुआ। दोनों घटनाओं के वीडियो टीवी चैनलों पर दिखाए गए। पंजाब में डांसर कुलविंद्र कौर पर गोली चलाने वाले दूल्हे के भाई ने पहले डांसर के साथ डांस करने की इच्छा जाहिर की थी, जिस पर डांसर ने इन्कार कर दिया। गुस्से, शराब और गोली तीनों ने मिलकर गर्भवती कुलविंद्र कौर को मार डाला। जबकि करनाल के निकट तो साध्वी देवा ठाकुर को श्रद्धा के चलते निमंत्रण दिया गया था। साध्वी अपने साथियों सहित शादी समारोह में पहुंची और बाकायदा कभी पिस्तौल तो कभी रायफल से गोलियां चलाईं और एक बार रायफल कुछ झुकी रह जाने से गोली हवा में जाने की बजाय सामने खड़ी महिला को जा लगी। साध्वी देवा ठाकुर मौके से फरार हो गई पर बाद में आत्मसमर्पण करना ही पड़ा।

शादी, घुड़चढी आदि अवसरों पर पहले पटाखे छोड़े जाते थे लेकिन अब पटाखों से आगे निकलकर गोलियां चलाने का प्रचलन बढ़ता ही गया है। इसके कारण इन मौकों पर नशे की हालत में हवा में गोली चलने की बजाय समारोह में मौजूद किसी न किसी को लगने के समाचार सुर्खियां बनते ही रहते हैं। अभी एक ऐसा समाचार भी आया था, जिसमें सिर्फ घर की गैलरी में शादी समारोह का नजारा देख रही पंद्रह वर्षीय लडक़ी को गोली जा लगी, जो कि समारोह में शामिल ही नहीं थी। सिर्फ शादी का नजारा देखने पर ही उस युवती को प्राण गंवाने पड़े। हरियाणा सरकार के प्रतिबंध के बावजूद गुरुग्राम में फिर शादी समारोह में फायरिंग हुई।

हम लोग दहेज प्रथा को बुरा मानते हैं और इसके लेने व देने पर रोक लगाने की शपथ लेते हैं लेकिन शादी के दौरान पटाखे फोडऩे और गोलियां चलाने पर रोक क्यों नहीं लगाते? आखिर इस तरह के आडंबर को रीति-रिवाज का रूप क्यों दिया जा रहा है? यह कौन-सा शादी की खुशी जाहिर करने का तरीका है, जिससे किसी की जान पर बन आती है? इस तरफ समाज का ध्यान क्यों नहीं जा रहा? ऑनर किलिंग का विरोध करने के साथ-साथ अनजान किलिंग का भी विरोध करना चाहिए कि नहीं? शादियां तो अब तक नोटबंदी का शिकार भी नहीं हुई क्या? कहां से आता है इतना पैसा कि चकाचौंध भरी रोशनियों में शराब में धुत्त होकर दिखावे के लिए गोलियों की गूंज से पंडाल गुंजाया जाए। पांच सौ रुपए के चाय-पानी से शादी करके भी लोग खुश हैं और सामूहिक विवाह में रिक्शाओं पर 21 जोड़ों की बारात एक ही बैंड बाजे से निकलती है। फिर हमारा समाज अब तक बाहरी दिखावे में क्यों अटका हुआ है? किसी ने एक बात कही थी कि हमारे समाज में रिश्वत और काला धन दोनों का रिश्ता दहेज से जुड़ा है। कालेधन के खिलाफ लड़ाई के साथ-साथ दोनों सादगी भरी शादियों का अभियान भी चले ताकि डांसर पर गोली न चले।

तभी तो गुरुदत्त की फिल्म का गाना याद आता है:-

यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?

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लेखक परिचय

लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइश हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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Comments (1)

  • kamlesh bhartiya

    shadi byah ke avsron par abhi tak yeh reet nibhi ja rahi hai. pata nahin kab humara samj aise buriyon se mukh morega?

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