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दंगल फिल्म के दस डायलॉग

December 29, 2016 3:37 pm by: Category: खबर खास, मनोरंजन खास Leave a comment A+ / A-
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फोटो- लिरिक्स मिंट से साभार

नोटबंदी के बावजूद दंगल 300 करोड़ की कमाई करने के करीब है… इस फिल्म के गाने हानिकारक बापू हो या धाकड़, या फिर टाइटल सोंग दंगल दंगल, गिलहरियां सभी को लोगों ने खूब सराहा है.. थियेटर से बाहर निकलते ही सभी की जबान पर दंगल दंगल और एक प्रकार की आत्मिक संतुष्टि होती है। लेकिन कुछ संवाद है जो सबकी जुबान पर चढ़ जाते हैं.. या आपके ज़हन में गूंजते रहते हैं.. यहां अपने पाठकों के लिये हम प्रस्तुत कर रहे हैं दंगल फिल्म के दस बेहतरीन संवाद जिन्हें फिल्म देखने के बाद आप याद रख सकते हैं।

  1. म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के – इस संवाद की खासियत यह है कि यह हरियाणा की बेटियों उनके पिताओं के लिये गर्व करने वाला संवाद बन गया है.. भले ही आज भी हरियाणा में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं मुहिम चलानी पड़ रही है लेकिन जिन बेटियों को हमने जन्म लेने दिया है उनकी उपलब्धियों पर हम कह सकते हैं कि म्हारी छोरियां छोरों से कम है के हो सकता है आने वाले दिनों में लिंगभेद व लिंगानुपात कम करने में इस संवाद की भी भूमिका बने।

  1. गोल्ड तो गोल्ड होता है छोरा लावे या छोरी – जब एक बाद एक लड़की होने पर महावीर फौगाट निराश हो रहे थे तो एक दिन गीता व बबीता किसी लड़के की धुनाई कर देती हैं यहीं फौगाट के दिमाग की बत्ती जलती है और उसकी समझ में आता है कि लड़कियां भी उन्हें गोल्ड मेडल तो दिला ही सकती हैं गोल्ड तो गोल्ड होता फिर वो लड़के को मिले या लड़की को… महावीर फौगाट की सोच में बदलाव के अहम बिंदू को दर्शाता है यह संवाद… और उनके लिये भी सीख है जो लड़के और लड़की में फर्क समझते हैं।

  1. अपणी माटी की हमेशा इज्जत करना बेटा… क्योंकि जितणी इज्जत तुम माटी की करोगी… उतणी इज्ज़त माटी से तुम्हें मिलेगी… जब कुश्ती सिखाने के लिये कोच महावीर फौगाट अपनी बेटियों को अखाड़े में उतारते हैं तो सबसे पहले उन्हें यही गुरुमंत्र देते हैं… अखाड़े का हर कोच अपने शिष्यों को यह मंत्र दे सकता है यह सिर्फ मंत्र सिर्फ अखाड़े की मिट्टी के बारे में नहीं है यह अपने गांव, अपने शहर, अपने प्रदेश और अपने देश व अपनी दुनिया पर भी लागू कर सकते हैं जितना प्यार हम अपने देश से करेंगें देश से भी हमें बदले में प्यार मिलेगा। यह एक आदर्शवादी और देशभक्ति भरने वाला संवाद है।

  1. बहुत हो गयी पहलवानी अब दंगल होगा… इस समय मासूम गीता बबीता अपने पर पहलवानी थोपने से तंग आ चुकी होती हैं… खाने-पीने से लेकर सोने जागने का जो त्याग उन्हें करना पड़ता है.. स्कूल से लेकर घर तक के रस्ते में जो कुछ उन्हें सुनने को मिलता है उससे उकता जाती हैं और पिता के आदेश को नकारने की ठान लेती हैं…. तब कहती हैं कि बहुत हो गयी पहलवानी अब दंगल होगा।

  1. सिर्फ बॉडी बनाने से कोई पहलवान नहीं बन जाता… पहलवानी जो है ना, वो खून में होती है... इस संवाद से आप सहमत असहमत हो सकते हैं… मेरा व्यक्तिगत मानना है कि प्रशिक्षण पर काफी कुछ निर्भर करता है… ख़ून मतलब जन्म से कोई पहलवान पैदा नहीं होता…. इसके प्रति उत्तर में फिल्म का ही संवाद ले लिजिये जो इस संवाद को ख़ारिज़ करता है

  1. मेडलिस्ट पेड़ पे नहीं उगते… उन्हें बनाना पड़ता है… प्यार से… मेहनत से… लगन से.… यह किसी भी प्रोफेशन पर आप लागू कर सकते हैं पहलवान भी पेड़ पर नहीं उगते… या जन्म से कोई पहलवान पैदा नहीं होता उन्हें बनाना पड़ता है जिसमें प्यार के साथ मेहनत… लगन भी जरूरी हैं

  1. दंगल लड़ने से पहले डर से लड़ना पड़ता है – यह जीवन का आधार वाक्य भी हो सकता है दंगल सिर्फ कुश्ती का दंगल नहीं है… किसी भी तरह का जोख़िम उठाने से पहले आपको डर से तो जीतना ही पड़ता है एक विज्ञापन की पंच लाइन भी है डर के आगे जीत है यह उसी तरह की बात है वो काफी सतही है लेकिन यह एक अनुभवी व्यक्ति के मुख से निकला वाक्य लगता है।

  1. मेडल लाने के लिये स्पोर्ट कोई नहीं देता… पर मेडल ना मिले तो गाली सब देते हैं.. ओलंपिक खेल इसकी मिसाल हैं…. जब मेडल नहीं ला पाये तो यही लोग हैं जो खिलाड़ियों के बारे में पता नहीं क्या क्या कहने लगते हैं और जब वे जीत हासिल करते हैं तो डोल बजाकर, नोट से लेकर फूल मालाओं से उनका स्वागत करते हैं। सरकारें भी खिलाड़ियों को पहले तो पूछती नहीं है फिर जैसे तैसे संघर्ष कर कोई इक्का दुक्का मेडल ले आता है तो उसे करोड़ों मिलते हैं… बाकि खिलाड़ी आर्थिक अभाव में मिट्टी मे ही मिल जाते हैं।

  1. अगर सिल्वर जीती तो आज नहीं तो काल लोग तनै भूल जावैंगे… गोल्ड जीती तो मिसाल बण जावैगी और मिसालें दी जाती हैं बेटा… भूली नहीं जाती… कोई भी खिलाड़ी इस संवाद से प्रेरणा ले सकता है क्योंकि यह सच ही है कि मिसालें भूली नहीं जाती बल्कि दी जाती हैं।

  1. कहने को तो एक राऊंड सिर्फ दो मिनट का होता है… पर सोच्या जावै तो दो मिनट मैं 120 सैंकेड होते हैं… उस एक सैकेंड का इंतजार कर जब सामने वाला गलती करै – यह कुछ कुछ वैसा ही जैसा चक दे इंडिया में अपनी टीम को प्रेरित करने के लिये कोच कबीर खान ( शाहरूख खान) 70 मिनट के महत्व को बताते हैं। कुश्ती में दो मिनट के राऊंड में ही खिलाड़ी को अपने दांव दिखाने व दूसरे के दांव से खुद को बचाने का हुनर दिखाना होता है।

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