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दंगल समीक्षा – धाकड़ है धाकड़ है दंगल धाकड़ है

December 29, 2016 12:20 pm by: Category: खबर खास, मनोरंजन खास 1 Comment A+ / A-

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चलो जी आमिर खान सहित दंगल की पूरी टीम की मेहनत रंग ला रही है और फिल्म दर्शकों की वाह वाही के साथ कामयाबी के रिकॉर्ड कायम करने की ओर बढ़ रही है। लेकिन हरियाणा की समझ रखने वाले, कुश्ती की समझ रखने वाले व गीता-बबीता के पिता व कोच महावीर फौगाट के बारे में जानकारी रखने वाले लोगों की प्रतिक्रियाएं भी फिल्म को देखने बाद आ रही हैं। हरियाणा की महिलाएं जो ख्याति प्राप्त हैं वे भी दंगल फिल्म पर लिख रही हैं। फिल्म धाकड़ है इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन कुछ बिंदू हैं जिन पर सवाल उठते हैं। फिल्म के कुछ लचीले पहलुओं का जिक्र फूल सिंह मलिक ने अपनी फेसबुक वॉल पर किया है। डालें एक नज़र-

दंगल फिल्म के कुछ लचीले पहलु:

A fair and fine analysis!

हरयाणा की बेटियों, उनके पिता के संघर्ष और प्रशंसा करने की हद तक हरयाणवी कल्चर को सँजोये हुए इस फिल्म की बिना सवाल-जवाब के प्रमोशन करना जहाँ मेरी नैतिक जिम्मेदारी बनती थी, वहीँ अब जब फिल्म सुपर-डुपर-हिट हो चुकी है तो कुछ ऐसे बिंदु सिर्फ चर्चा के उद्देश्य से (क्रिटिक नहीं) रख रहा हूँ जो हर हरयाणवी के लिए तो खासतौर पर चर्चा लायक हैं:

1) आज तक ऐसा कोई कुश्ती-दंगल नहीं देखा, जिसमें टिकट लगती हो| जबकि मूवी के टर्निंग पॉइंट में दंगल आयोजकों द्वारा लड़की को एंट्री ही इस लालच में दी दिखाई गई कि इससे उनके ज्यादा टिकट बिकेंगे| जबकि हकीकत में ऐसा नहीं होता, दंगल देखने वाले अच्छा परफॉर्म करने वाले पहलवान को अपनी स्वेच्छा से वहीं दंगल में ही दान देते रहे हैं; जैसा कि फिल्म में गीता को पहला दंगल हारने के बाद भी उसकी परफॉरमेंस से खुश हो कर एक बन्दे ने उसको पचास रूपये दिए|

2) मीट-मॉस-मुर्गा से पहलवान अक्सर दूर ही रहते हैं| खुद मुझे इस फिल्म के माध्यम से ही पता लगा कि भारतीय पहलवान मीट-मुर्गा भी खाते हैं| अब यह पहलु सच्चाई के चलते फिल्म में रखा गया या डायरेक्टर की अपनी सोच के तहत, पता करने की बात है|

3) महावीर सिंह फौगाट जी को लड़कियों को दंगल में उतारने की प्रेरणा इस वजह से नहीं मिली थी कि “क्या फर्क पड़ता है गोल्ड तो गोल्ड होता है फिर लड़का लाये या लड़की!” बल्कि खुद महावीर जी के अनुसार उनको इसकी प्रेरणा उनके गुरु मास्टर चन्दगीराम जी से मिली थी, जो खुद दिल्ली में लड़कियों का अखाडा तब से चलाते थे, जब महावीर जी उनके शिष्य भी नहीं बने थे| तो यह एंगल सिर्फ और सिर्फ फिल्म की कोमर्सियलीजेसन व् फिल्म को तड़का लगाने की वजह से दिया गया है| शायद फिल्म को सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ मुहीम से जोड़ने हेतु|

4) हरयाणा में 14 साल की उम्र में गरीब-घरों की लड़कियों के तो बेशक ब्याह हो जाते हों, अन्यथा जो परिवार उनको पढाने तक की हैसियत में रहता है या कहो कि लोअर-मिडल क्लास के लेवल तक का भी है तो वो अपनी बेटी को पढ़ा-लिखा के ब्याहना पसन्द करता है| और यह रीत कितनी पुरानी है यह बात इसी बात से समझ लीजिये कि देश का पहला और शायद आजतक का भी इकलौता महिला विश्वविद्यालय हरयाणा ही के गोहाना में है, वो भी बीसवीं सदी के तीसरे दशक से| हाँ, यह जरूर है कि शुद्ध हरयाणवी कल्चर में बेटी से शादी से पहले नौकरी करवाना पसन्द नहीं किया जाता| लोअर-क्लास को छोड़ के लड़की को कम उम्र में ब्याहने की परम्परा हरयाणा से एक सदी से भी पहले खत्म हो चुकी|

एक आध और लचीले पहलु हैं फिल्म के, परन्तु मुख्यत: यह चार पहलु काबिले-गौर हैं| बाकी फिल्म से कोई शिकायत नहीं, कोई ऐसी बड़ी कमी नहीं कि जिसके चलते इसको खामखा क्रिटिसाइज़ किया जाए|

क्या गीता बबीता के अकादमिक कोच असल में भी खलनायक थे?

यह तो फूल मलिक जी की समीक्षा थी कुछ बिंदुओं की ओर तो इसमें ध्यान जाता है। लेकिन इनके अलावा एक बात और है जिस पर 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में गीता-बबीता के चीफ कोच रहे प्यारा राम सौंधी से बातचीत कर बीबीसी ने लेख भी प्रकाशित किया है जिसमें उन्होंने कहा है कि अभी उन्होंनें फिल्म नहीं देखी है लेकिन जिन जानकारों ने देखी है उन्होंने बताया है कि उनकी छवि को खराब दिखाया गया है। इससे वे आहत जरुर हैं लेकिन आगे कोई कदम उठाने के बारे में वे फिल्म देखने के बाद ही विचार करेंगें।

फिल्म में इस कोच की भूमिका खलनायक से कम नज़र नहीं आती, कोच के पहले ही दृश्य से आप उसमें निहित अंहकारी प्रशिक्षक को देख सकते हैं आखिर तक तो उनका यह रूप चरम पर ऊभर कर आता है जब वे महावीर सिंह फौगट को ईर्ष्यावश कमरे में बंद करवा देते हैं। और उन्हें गीता के राष्ट्रमंडल में हुए आखिरी मुकाबले से वंचित कर देते हैं। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार हकीकत में ऐसा नहीं हुआ था।

इसलिये इस दृश्य को फिल्मी करार दिया जा सकता है हालांकि फिल्म में सपष्टीकरण दिया गया है कहानी काल्पनिक है। लेकिन यह महावीर फौगाट और गीता-बबीता के संघर्ष पर बनी है तो इतनी काल्पनिक भी नहीं है।

असलियत में भले ही कोच की भूमिका नकारात्मक न रही हो लेकिन सरकारी संस्थानों में विशेषकर खेल के मामले में प्रशिक्षकों से लेकर प्रशासकीय भूमिका पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। इसका कुछ भंडाफोड़ पिछले दिनों सोना चौधरी के नॉवल गेम इन गेम में भी हुआ है। 2016 में ही हुए ओलंपिक खेलों में भी नरसिंह यादव व सुशील के बीच जो विवाद हुआ उस खेल को तो हमने देखा ही है। खैर दंगल फिल्म में लड़कियों को लेकर खेल प्रशासन के अधिकारियों के रवैये की एक झलक तब भी मिलती है जब महावीर फौगाट मैट के लिये कुछ आर्थिक सहयोग की अपील लेकर खेल विभाग के एक अधिकारी (जगबीर राठी) से मिलते हैं। अभिनय के लिहाज से जगबीर राठी ने छोटी सी भूमिका में अपना शत प्रतिशत दिया है और वे अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहते हैं।

लेकिन पटियाला अकादमी के कोच वाला मसला मात्र फिल्मी है तो भी और हक़ीकत है तो भी विवाद गरमा सकता है। यदि यह गलत है तो फिल्म पर कोच की छवि खराब करने का आरोप बनता है और सही है तो कोच सहित एक बार फिर व्यवस्थागत खामियां उभर कर सामने आती हैं।

कुल मिलाकर फिल्म को फिल्म के नज़रिये से देखें तो बहुत ही बेहतरीन है, आमिर खान एक बार फिर मिस्टर परफेक्टनिस्ट बने हैं उम्र की तीन अवस्थाओं में वे दिखते हैं तीनों में लाजवाब लुक, गीता बबीता की भूमिका निभाने वाली फातिमा सना शेख, सान्या मल्होत्रा, जायरा वसीम, सुहानी भटनागर की अदाकारी भी बेहतरीन है। साक्षी तंवर का अभिनय भी कमाल है। एक और अहम भूमिका निभाई है अपारशक्ति खुराना ने जो कि फिल्म के कथावाचक भी हैं। अपारशक्ति खुराना अभिनेता से पहले अपनी आवाज़ के लिये ही जाने जाते हैं दिल्ली में वे नामी गिरामी रेडियो जॉकी हैं, वैसे उनकी पहचान विक्की डॉनर और दम लगा के हंइसा फेम आयुष्मान खुराना के भाई के रूप में भी है।

फिल्म के गानों को लिखने वाले अमिताभ भट्टाचार्य की जितनी तारीफ की जाये कम है, हानिकारक बापू हो या फिर धाकड़ या गिलहरियां सभी गाने बेहतरीन लिखे गये हैं। हानिकारक बापू व धाकड़ तो शुद्ध हरियाणवी मिज़ाज के गाने हैं। निर्देशक नितेश तिवारी को ही सारा श्रेय जाना चाहिये क्योंकि इन सभी पात्रों की डोर उन्हीं के हाथ में तो थी।

इतना ही नहीं फौगाट के संघर्ष की कहानी को शब्दों में पिरोने वालों में भी नितेश तिवारी शामिल हैं फिल्म को लिखा है नितेश तिवारी, पियूष गुप्ता, श्रेयष जैन और निखिल मेहरोत्रा ने।

दंगल समीक्षा – धाकड़ है धाकड़ है दंगल धाकड़ है Reviewed by on . चलो जी आमिर खान सहित दंगल की पूरी टीम की मेहनत रंग ला रही है और फिल्म दर्शकों की वाह वाही के साथ कामयाबी के रिकॉर्ड कायम करने की ओर बढ़ रही है। लेकिन हरियाणा की चलो जी आमिर खान सहित दंगल की पूरी टीम की मेहनत रंग ला रही है और फिल्म दर्शकों की वाह वाही के साथ कामयाबी के रिकॉर्ड कायम करने की ओर बढ़ रही है। लेकिन हरियाणा की Rating: 0

Comments (1)

  • Dharmvir

    हरियाणा खास कार्यक्रम सार्थक प्रयास

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