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हर शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है..?

November 8, 2016 9:55 am by: Category: खबर खास 2 Comments A+ / A-

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वैसे तो यह एक गज़ल की पंक्ति है- इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है, लेकिन दीपावली के बाद से यही पूछा जा रहा है कि हर शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है? सीने में जलन, आंखों में चुभन सी क्यों है? दीपावली बीत गई, अमावस्या की अंधेरी रात बीत गई पर स्मॉग से भरे दिन खत्म होने का नाम नहीं ले रहे। देश की राजधानी दिल्ली, दिल वालों की दिल्ली को पहले डेंगू व चिकनगुनिया ने लपेट में लिया। अभी इससे दिल्ली उभरी भी नहीं थी कि स्मॉग का हमला हो गया। कम से कम अठारह सौ स्कूलों में आपातकालीन छुट्टियां करनी पड़ीं। कश्मीर में तो आतंकवादियों ने स्कूल इमारतें जला दीं, इसलिए पढ़ाई ठप हुई लेकिन दिल्ली में स्कूल भवन तो कायम हैं पर स्मॉग की मार को नन्हें बच्चे कैसे सह पाएंगे, इसे देखते हुए स्कूल बंद करने पड़े।

दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल को डेंगू, स्मॉग, चिकनगुनिया के दुष्प्रभावों से न निपट पाने के कारण फटकार पर फटकार झेलनी पड़ रही है। उपराज्यपाल नजीब जंग से जंग छोडक़र इन मुसीबतों से दिल्ली को छुटकारा दिलाने की जंग लडऩे की सलाह दी जा रही है। पर केजरीवाल कहां मानने वाले हैं, वे जेएनयू के लापता छात्र नजीब को ढूंढने यूनिवर्सिटी कैंपस पहुंच कर छात्रों को इंडिया गेट जाकर प्रदर्शन की सलाह दे डालते हैं। नजीब को ढूंढते मानो केजरीवाल नजीब जंग से ही एक जंग शुरू कर रहे हैं। अभी तक तो प्राणियों पर आफत थी, दिल्ली में जीवों पर भी आफत आ गई, बेचारे बर्ड फ्लू के शिकार हो गए। बात दिल्ली से निकली तो हिसार तक पहुंच गई। पता नहीं, बर्ड फ्लू को भी टीवी चैनल देख-देख कर यह जानकरी मिल गई कि अरविंद केजरीवाल की शिक्षा हिसार में हुई थी और उनके पिता यहीं नौकरी करते थे। बस, दिल्ली के बाद बर्ड फ्लू का सीधा हमला हिसार के ब्लू बर्ड में हुआ। आखिरकार कुछ तो रिश्ता है दिल्ली और हिसार के बीच, जो बर्ड फ्लू की बतखें मरी देखी गईं। उसके बाद झील में बची बतखों को भी इस रिश्ते की खातिर जान देनी पड़ी। पूरा अभियान चलाया गया।

आज तक एक इंटरव्यू में केजरीवाल पंजाब में भी ऐसे हालातों का जिक्र करते दिखाई दिए। पहले डेंगू, चिकनगुनिया पर भी यही बात कही गई कि यहां दूसरे राज्यों से इलाज करवाने आए मरीजों के कारण यह संख्या बढ़ रही है। अब पंजाब से तो स्मॉग आने से रही। यह भी माना जा रहा है कि जीरी के लगाने वाले किसानों ने पराली को जला दिया, जिसमें दीपावली के पटाखों का धुआं मिलकर स्मॉग बन गया। नाक को ढंकने के लिए पट्टियां लगानी पड़ीं। इस स्मॉग के चलते सुबह व शाम को वाहनों की भिडंतों में लोगों की शामत आने लगी है। कुछ भगवान को प्यारे हो रहे हैं तो कुछ अस्पतालों में ले जाए जा रहे हैं।

आमतौर पर कहा जाता है कि अगला युद्ध पानी के लिए होगा लेकिन ऐसा लगता है कि उससे पहले गृहयुद्ध तो स्मॉग को लेकर होगा, प्रदूषण को लेकर होगा, जहरीली हवा को लेकर होगा, पेड़ उजाड़ते जा रहे हैं, वन कम होते जा रहे हैं, पहाड़ों पर हरियाली कम और सीमेंट-पत्थर के मकान ज्यादा दिख रहे हैं। क्या बच्चा, क्या जवान, क्या बूढ़ा, क्या पहलवान, स्मॉग से, प्रदूषण से जंग लड़ कर दिखाओ। हम तो प्लास्टिक की थैलियों को ही प्रतिबंध के बावजूद बढ़ावा देते आ रहे हैं। पटाखे न जलाओ का आह्वान करके भी रात भर पटाखे छोड़े जाते हैं। फिर ताजी हवा कहां से आएगी?

कैसे कोई गज़ल गाएगा-

दिल में इक लहर सी उठी है अभी

कोई ताजा हवा चली है अभी..

आइए, कोशिश करें, प्रदूषण को दूर करने में ताकि ताजी हवा चले।

किसी शायर के शब्दों में:-

जो एक घर बनाओ तो पेड़ लगा लेना,

परिंदे सारे घर में चहचहाएंगे…

kamlesh-bhartiya

लेखक परिचय

लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहायस हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

 

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Comments (2)

  • kamlesh bhartiya

    bahut bahut dhanywad. jagdeep. nice job.

  • kamlesh bhartiya

    rehaish ke spelling thik kar lo. rehais nahin hota. rehaish hota hai.

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