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जनता के हक की लड़ाई को न्याय-युद्ध कहते थे ताऊ

September 25, 2016 4:32 pm by: Category: शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

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हरियाणा के निर्माता रहे स्वर्गीय चौधरी देवीलाल सिर्फ  स्वतंत्रता सेनानी, किसानों, गरीबों, मजदूरों और कमेरे वर्ग के मसीहा ही नहीं थे बल्कि एक युगपुरुष थे। उनकी करनी और कथनी में कोई फर्क नहीं था और वे बेहद संघर्षशील, जुझारू व निर्भीक राजनेता थे, जिनकी जड़ें जमीन और देश के आम जनमानस के साथ जुड़ी हुई थी। युगपुरुष, स्वतन्त्रता सेनानी, निर्भीक किसान नेता चौधरी देवी लाल का जन्म 25 सितम्बर, 1914 को वीरों की धरती हरियाणा के सिरसा जिला के अन्तर्गत गांव तेजाखेड़ा में किसान परिवार में चौधरी लेखराम सिहाग के घर हुआ। चौधरी देवीलाल की प्राथमिक शिक्षा गांव चौटाला में हुई तथा इसके बाद उन्होंने डबवाली के सरकारी स्कूल से मिडल परीक्षा पास की। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये उन्होंने सन् 1927 में मोगा शहर के एस.डी. स्कूल में प्रवेश ले लिया। यह ऐसा समय था, जब सम्पूर्ण भारतवर्ष में स्वतन्त्रता की लपटें उठ रही थीं। समाचार-पत्रों में देशभक्त मतवालों के किस्से सुर्खियों में छपते थे। लाला लाजपतराय, सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के किस्से समाचार-पत्रों में पढक़र और उनसे प्रेरित होकर चौधरी देवी लाल का मन भी देश-सेवा की ओर आकर्षित होने लगा। फरवरी, 1927 में जब ‘साइमन कमीशन’ भारत आया तो कांग्रेस ने इसके पूर्ण बहिष्कार का फैसला किया था। चौधरी देवीलाल भी अपने को इससे अछूता न रख पाए तथा अपने एक मित्र चौधरी बलबीर सिंह के साथ दिसम्बर, 1929 को लाहौर में कांग्रेस के अधिवेशन में सम्मिलित हुए। उनके स्कूल के प्रधानाचार्य उनके इस रवैये से काफी नाराज हुए और उन्हें छात्रावास से निकाल दिया गया। परन्तु किशोर देवी लाल अपनी उस जिद पर अटल रहे और बजाय माफी मांगने के परीक्षा दिए बिना ही स्कूल छोड़ दिया क्योंकि उनके सिर पर अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने और देश सेवा का जुनून सवार था। बताया जाता है कि वे मात्र 15 वर्ष की आयु में अपने घर वालों को बिना बताये ही आजादी के आन्दोलन में शामिल हो गए थे।

चौधरी देवीलाल एक सशक्त एवं क्रांतिकारी व्यक्तित्व के धनी थे। वे निर्भीक, पराक्रमी, अत्यन्त साहसी और मानवता के पुजारी थे। अन्याय व अत्याचार का मुकाबला करने के लिये वे सदैव तत्पर रहते थे। उन्होंने देश के किसानों के शोषण के विरुद्ध जोरदार आवाज उठाई थी, क्योंकि युग-युग से पीड़ित व शोषित किसान तथा ग्रामीण समुदाय के प्रति उनका असीम प्रेम था। जनता के हक की लड़ाई को वे ‘न्याय-युद्ध’ कहते थे। उनका जीवन खुली किताब था। वे सच्चे अर्थों में गांधीवादी होने के साथ-साथ सरलता, सज्जनता, सादगी, तप और त्याग की प्रतिमूर्ति थे। उनका ग्राम स्वराज और ग्राम पंचायत व्यवस्था में अटूट विश्वास था। वे स्वतन्त्रता संग्राम के नायक होने के साथ-साथ ग्राम स्वराज की लड़ाई लडऩे वाले एक अप्रतिम योद्धा थे। 1987 में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने देशभर के विपक्षी दलों को कांग्रेस के खिलाफ एक मंच पर इकठ्ठा किया और देश में जनता दल के गठन में अहम् भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से ही 1989 में जनता दल की सरकार बनी और गांधी-नेहरू परिवार के शासन को देश से उखाड़ फैंकने वाले चौधरी देवीलाल को सर्वसम्मति से देश का प्रधानमंत्री चुन लिया गया। जुबान के धनी चौधरी देवीलाल ने अपना वचन निभाते हुए अपना प्रधानमंत्री पद का ताज वीपी सिंह के सिर पर रख दिया और खुद उप-प्रधान मंत्री बनना स्वीकार किया। यह उनके पचहत्तर वर्ष के राजनैतिक जीवन में नैतिक मूल्यों और आदर्शों की सबसे ऊंची उड़ान थी। अपने संघर्षमय जीवन में चौधरी देवी लाल हार-जीत की परवाह नहीं करते थे। वे सन् 1956 में तत्कालीन संयुक्त पंजाब में मुख्य संसदीय सचिव भी रहे और हरियाणा बनने से पूर्व संयुक्त पंजाब की विधानसभा में उपेक्षित हरियाणा के विकास के लिये अपनी आवाज बुलन्द की। उन्होंने हरियाणा के प्रति हो रहे अन्याय के विरुद्ध श्री गोपीचन्द भार्गव, श्री भीमसेन सच्चर और स. प्रताप सिंह कैरों जैसे दिग्गज मुख्यमंत्रियों से टक्कर ली। उनके ही संघर्ष का परिणाम था कि सन् 1966 में हरियाणा का अलग राज्य के रूप में गठन हुआ जिसकी आज एक अलग पहचान है।

चौधरी देवीलाल किसानों की लड़ाई वातानुकूलित कमरों में बैठ कर नहीं लड़ते थे। गाँव-गाँव और चौपालों तक उनकी सीधी पहुँच थी इसीलिए उन्हें सम्मानपूर्वक ताऊ के नाम से संबोधित किया जाता था। लोगों के बीच गाँव में चारपाई पर बैठकर हुक्का पीते-पीते ही वे जन समस्याएं सुनते थे और अधिकांश का मौके पर ही निराकरण कर देते थे। चौधरी देवीलाल को जनतन्त्र के मंच पर लोकप्रियता के लिये लेन-देन, सौदेबाजी और बनावट नहीं आती थी। वे स्पष्ट वक्ता थे और कहा करते थे कि ‘लोक राज, लोक लाज से चलता है।’ लड़ाई तो ‘लुटेरों’ और ‘कमेरों’ के बीच है। इस देश में पूँजीपति, सत्ता से रिश्ता जोडक़र काश्तकारों और गरीब जनता का भरपूर शोषण करते हैं। यह व्यवस्था बदली जानी चाहिए। वे नहीं चाहते थे कि चंद पूँजीपति, गणतन्त्र पर हावी हो जाएं। अत: उन्होंने कभी भी उद्योगपतियों, पूँजीपतियों और साहूकारों से चुनाव हेतु धन लेने की बजाय ‘एक नोट, एक वोट’ का नारा दिया।

चौधरी देवीलाल ने अनुभव किया कि भारत का प्रजातंत्र, नौकरशाही, नवधनवाद, नवसामन्तवाद और संकीर्ण जातिवाद के चंगुल में फंस कर रह गया है। सारा प्रशासन कुछ सुविधा-भोगियों के लिये तथा वर्तमान प्रजातंत्र में प्रजा शब्द अर्थहीन और गौण हो गया है और तन्त्र प्रमुख। हमारी संस्कृति में समाजवाद विद्यमान है- ‘‘न किसी के पास ज्यादा हो न किसी के पास कम’’। किसानों के शोषण का उन्मूलन ही भारत का समाजवाद है। अत: उन्होंने 6 अप्रैल, 2001 को परलोक सिधारने से पूर्व देश के नीतिविदों और राजनेताओं को सावधान किया था कि ‘‘कृषि क्षेत्र की देश की राष्ट्रीय आय में भागीदारी बढ़ाने के लिये गिरते पूंजीनिवेश को रोकना होगा ताकि खेती अलाभप्रद बनकर ही न रह जाये तथा वैश्वीकरण की आंधी में कहीं चौपट ही न हो जाये’’। आपातकाल के दौरान अन्य राष्ट्रीय नेताओं के साथ हरियाणा के सपूत और देश के इस महान् नेता चौधरी देवीलाल व उनके बेटे चौधरी ओमप्रकाश चौटाला को 19 महीने जेल में रखा गया। आपातकाल की समाप्ति के बाद देश में जनता पार्टी का शासन स्थापित हुआ और 21 जून, 1977 को उन्होंने पहली बार हरियाणा के मुख्यमंत्री के पद को सुशोभित किया और 27 जून, 1979 तक इस पद पर बने रहे। दूसरी बार 1987 में वे फिर हरियाणा के मुख्यमंत्री बने और जनता को स्वच्छ प्रशासन दिया। इस छोटी-सी अवधि में उन्होंने ग्रामीण विकास और जनकल्याण की अनेक योजनाएं शुरू कीं। इनमें मैचिंग ग्रांट और गांव-गांव में चौपालों के निर्माण की योजना प्रमुख हैं। उन्होंने अपने चुनावी वादों के दौरान जनकल्याण की जो बातें कही थीं उन्हें पूरा कर एक आदर्श स्थापित किया। ‘भ्रष्टाचार बन्द और बिजली-पानी का प्रबन्ध’, ‘प्रशासन आपके द्वार’, ‘हर खेत को पानी, हर हाथ को काम’, ‘हर तन पै कपड़ा, हर सिर पै मकान’, तथा ‘हर पेट में रोटी, बाकी बात खोटी’, उनके प्रिय नारे थे। उन्होंने पहली बार देशभर में दस हजार रुपये तक छोटे किसानों के ऋण माफ करवाये और हरियाणा में वृद्धों को मासिक वृद्धावस्था सम्मान पेंशन, बेरोजगारों को साक्षात्कार के लिये मुफ्त यात्रा सुविधा, न्यूनतम मजदूरी में बढ़ौतरी, किसानों को बिजली और पानी की निरन्तर आपूर्ति तथा कृषि उत्पादों का उचित मूल्य दिलवाया। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में उप-प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने राष्ट्रीय कृषि नीति व जल नीति बनाने के लिये सराहनीय भूमिका निभाई। चौधरी देवीलाल को किसानों के मसीहा, महान स्वतन्त्रता सेनानी, हरियाणा के जन्मदाता, राष्ट्रीय राजनीति के भीष्म पितामह, करोड़ों भारतीयों के जननायक तथा त्याग और संघर्ष के पर्याय के रूप में जाना जाता है। महात्मा गांधी की तरह उनका मानना था कि असली भारत तो गांवों में ही बसता है। जब तक गांवों का आत्मनिर्भर इकाई के रूप में चहुंमुखी विकास नहीं होगा, तब तक गांधी जी के ‘स्वराज’ का सपना पूरा नहीं होगा। वे हमेशा विपक्षी दलों को एकजुट करने में अहम् भूमिका निभाते रहे और देश में सत्ता दलों के नेता उनका भारी सम्मान करते थे। हमें आज एक बार फिर उनकी कमी महसूस होती है। यद्यपि आज वे हमारे मध्य नहीं हैं किन्तु उनके आदर्शमय, त्यागमय व तपोमय जीवन से हम सब भारतवासी युगों-युगों तक प्रेरणा लेते रहेंगे।

लेखक अशोक आरोड़ा पूर्व स्पीकर एवं इंडियन नैशनल लोकदल के प्रदेशाध्यक्ष हैं।

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