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दोपदी सिंघार की कविताएं

August 10, 2016 6:44 pm by: Category: साहित्य खास 2 Comments A+ / A-

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“कवि हूं, आदीवासी हूं, संघर्ष भरी अपनी कथा रही ।” बस ! इतना-सा परिचय और सोशल मीडिया पर समीक्षाओं-प्रशंसाओं की भरमार… आखिर क्या है ऐसा दोपदी सिंघर की रचनाओं में… आईए जानते हैं हरियाणा ख़ास पर संकलित उनकी चुनिंदा रचनाओं के माध्यम से…

15 अगस्त

बासी भात खाके भागे भागे पहुँचे
ठेकेदार न इंजिनीर था
दो तीन और मजूर बीड़ी फूँक रहे थे
दो एक ताड़ी पीके मस्ताते थे
ठेकेदार बोला आज १५ अगस्त है
गांधी बाबा ने आजादी करवाई है आज
आज परब मनेगा आज त्योहार मनेगा
आज खुशी की छुट्टी होगी
आज काम न होगा

गाँठ में बँधा था सत्रह रूपैया
घर के भांडे खाली
‘बाऊजी अदबांस दे दो कल की पगार
रोटी को हो जाए इतना दे दो
कुछ काम करा लो लाओ तुम्हारा पानी भर दूँ
लाओ तुम्हारा चिकन बना दूँ
लाओ रोटी सेंक दूँ’
डरते डरते बोली मैं तो वो बोला

‘भाग छिनाल
रोज माँगने ठाढ़ी हो जाती है माथे पे
आजादी आज त्योहार है
खुशी की बात हो गई
ये मंगती भीख माँगने हमेशा आ जाती है
जा जाके त्योहार मना
गांधीबाबा ने आजादी जो करवाई है
उनको जाके पूज गँवार दारी’
सत्रह रुपए खरचके
मैंने आजादी का परब मनाया

सुना है दूर दिल्ली में नई लिस्ट आई है
सत्रह रूपैया जिनकी गाँठ है
उनको सेठ ठहराया है
सेठानी जी ओ दोपदी
तुमने सत्रह रुपए का आटा नोन लेके
गजब मनाई आजादी।

रेप

‘तेरा रेप हुआ

या पचीस हजार को आई है’

बोला हँसा और बोला

‘तेरा रेप कौन करेगा

सतयुग में दोपदिया पाँच खसम किए है

कलयुग पचास करेगी

तेरा रेप हुआ है

झूठी मक्कार

काला कालूटा बदन देख अपना

बासभरी बालभरी बगलें सूंघ अपनी

तू कहती है तेरा रेप हुआ है

कल बोलेगी बच्चा होगा

परसों बोलेगी मेरा है पंच का है सरपंच का

तेरा रेप हुआ है

हँसा बोला हँसा

‘तू सनसनी फैलाने आई है

हमें डराने आई है

नेता बनने आई है

रूपैया बनाने आई है

अपने खसम का मुँह देख

बम्मन ने जो रेप किया दरबार ने रेप किया

तो तुझपे अहसान किया

तेरी सात पीढ़ी तारी है

तू कहती है तेरा रेप हुआ है’

कहा नहीं कुछ बस जरा आँख डबडबाई

मुँह ही मुँह बड़बड़ाई

‘नहीं साब बच्चा नहीं होगा

अब बिदरोह होगा

आज लिख भी सकूँ न पूरा शब्द सही सही

एक दिन ऐसा आएगा

जब कोई किसी का हाथ खींचके

बलात्कार न करने पाएगा।

पेटीकोट

आपने बताया है

आदिवासी औरत पेटीकोट नहीं पहनती

आदिवासी औरत पोल्का नहीं पहनती

एक चीर से ढँक लेती है शरीर

आप सर आप मेडम

आप सदियों से नहीं आए हमारे देस

आपने कहा बैठा नहीं सकता कोई दरोगा

किसीको चार दिन चार रात थाने पर

आप सर आजादी से पहले आए होगे

हमारे गाँव

वो आजादी जो आपके देश को मिली थी 1947  में

आप नहीं आए हमारे जंगल

आपको नहीं पता पखाने न हो

तो हम औरतें नहीं छोड़ती अपने खसम

कि दो रोटी लाता है रात को एक टेम लाता है

पर लाता है लात मारता है पर रोटी लाता है

रोटी है तो दूध है

दूध है तो मेरा बच्चा

आप नहीं आए हमारे गाँव

नहीं तो पूछते क्यों औलाद से माया रखती है दोपदी

क्या करेगा तेरा बच्चा

भूखा दिन काटेगा जंगल जंगल भटकेगा और मरेगा

आप नहीं आए हमारे गाँव

नहीं तो बताती

ये जंगल बचाएगा ये जानवर बचाएगा

ये गोली खाएगा ये किसी आदिवासन को

लेकर भाग जाएगा

यहीं हमारी रीत है

आप नहीं आए हमारे गाँव

नहीं तो बताती कि जो लोग आते है आपकी तरफ से

उनकी निगाह बड़ी लम्बी है

आप एक चीर से शरीर ढाँकने की बात करते हो

हम पेटीकोट पोल्के में नंगे दिखते है

आप जरूर ही नहीं आए हमारे गाँव।

मन की बात

प्रधानजी जब तब रेडियो पर बताते हो मन की बात

कि मन लगाके पढ़ो आगे बढ़ो काला धन मत रखो

आप किससे बात करते हो प्रधान जी

सेठलोग रेडियो कहाँ सुनते

वो तो देखते है सेठानियों का नाच उनके घर टीवी है

और हमारे बच्चे नहीं करते परीक्षा का टेंसन

उन्हें पैदा होते ही पता होता है

कि उन्हें तो फेल होना है

हमारे यहाँ कोई आत्महत्या नहीं करता प्रधानजी

यहाँ हत्याएँ ही होती है

बता आते है आपको मामाजी कि सुसेड हो गई

प्रधानजी आपने बताया था कि सबको काले धन का

पंद्रह हजार रुपया दोगे

सेठों की पेटी गाँव देहात के हवाले करोगे

आप पुल बनवा दो आप उससे अस्पताल खुलता दो

आप स्कूल चला दो

बातों से बात नहीं बनती आप हमें बस पढ़ने लिखने लायक

हो जाए ऐसा मास्टर भिजवा दो

रूपिया तो हम जुटा लेंगे

धरती देगी जंगल देगा महुआ नीम करोन्दा देंगे

मामाजी से कहना

हमारी लाड़लियों को साइकल नहीं चाहिए

पैर चाहिए खड़े होने को

और अटल बिहारी सड़क जाती है

मसान, कच्चा मसान था गाँव में तो लोग

बरसात में सड़क को करते है मसान

बाकी साल उसपर भूत नाचते है

प्रधान जी हमारी मन की बात भी कभी सुनना

अकेले में जो चिंता करते हो इतनी देश की

उसमें गुनना।

फटफटी चलाने का सपना

शर्माती थी पहले कहते

अब नहीं शर्माऊँगी, अपना सपना बताते

क्या शरम

फटफटी दौड़ाने का सपना है मेरा

मेड़ मेड़ दौड़ाऊँगी

किसी का खेत नहीं उजाड़ूँगी

जैसे उजाड़ती है सरकार

किसी का सर नहीं फोड़ूँगी

जैसे फोड़ते है सेठों के लाल

मोनु बोला मम्मी तू पागल है

विधायक मंत्री लोग हवाई जहाज में आते जाते है

तू फटफटिया दौड़ाने का सपना सजाती है

दुनिया किधर से कहाँ पहुँच गई

तुम चलाते थे फटफटी माँग माँग के

साइकल से भी धीमी, माथा फटने से भय खाते थे

फिर कैसे कर दिया माथा अपना

फोड़ो फोड़ो, अब माथा फोड़के

सपना तोड़ न पाओगे

मोनु मरना और मारना

लेकिन डरना मत

लड़ना, लड़ते रहना और तू डरना मत

सपने को मत मरने देना

उनको मर्डर करने देना

पर तू मरना मत

जब वारंट निकलेगा

हम फटफटी पर भाग जाएँगे

मगर फटफटी कहाँ से लाएँगे

आओ आओ सपना देखे

कि खरचा इस पर न धेला न सिक्का

बस अपनी गर्दन कटवाना है

सरकारों की कालर पकड़के

अपने सपने पूरे करवाना है।dopadi3

सलवार की गांठ

अम्मा ने समझाया बार-बार

जिनगी में बहुत जरूरी हो गयी गांठ

खींच कर लगाई गांठ पर गांठ

बांध-रखना अच्छे से

खुल न जाये यहाँ- वहां

खेलते- कूदते हुए

उठते बैठते हुए ,आते समय ,जाते समय

देख लेना, समझ लेना, जान लेना, बूझ लेना

टोय टोय लेना गांठ, कस कस लेना गांठ

सखी दोपदी !

कैसे बताऊँ अम्मा को!

कैसे समझाऊं अम्मा को!

खेत में, खलिहान में, रास्ते में, स्कूल में

परिवार में, पड़ोस में

गांव में देश में

कितनी तेज़ तेज़ धार वाली आँख

बाँधू संभालू लाख

कहाँ- कहाँ ! कैसे-कैसे!!

खुल-खुल जाती गांठ

खोल खोल दी जाती गांठ

अम्मा लगाती जाती गांठ पर गांठ

खुल खुल जाती गांठ खोल दी जाती गांठ।

 

संकलन- एस.एस.पंवार

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Comments (2)

  • Shankar kr pPaterya

    सरहानीय प्रयास के हरियाणा ख़ास के लीये बधा ई !

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