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यहां हर चीज नकली है क्या-क्या जांचोंगे?

जो पैसे लेकर काम कर दे वह ईमानदार!

April 3, 2017 11:11 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

यहां तो हर चीज बिकती है, कहां जी तुम क्या-क्या खरीदोंगे? यहां तक तो गनीमत थी, क्योंकि चीज तो असली और खरी मिलती थी। इसीलिए चुटकला बना था कि मुझे यह अधिकारी बहुत ईमानदार और पसंद है। दूसरे ने सवाल किया कि इसमें ऐसी क्या खुबी है? जवाब आया कि यह अधिकारी रिश्वत लेकर भी सही काम कर देता है। संकेत साफ है कि पैसा लेकर भी काम हो जाए तो बहुत बड़े ईमानदार माने जाऐंगे। अब तो अपने हरियाणा के रोहतक में सीएम फ्लाइंग द्वारा मारे गए छापों की जांच देखी जाए तो यही गाना पड़ता है कि यहां तो हर चीज नकली है, कहों जी तुम क्या-क्या जांचोंगे? किस-किस को जांचोंगे? अगर एक शहर में यह हाल है तो पूरे हरियाणा के शहरों में क्या हाल होगा? मजेदार बात है कि पहले तो खाने-पीने की चीजें नकली होती थी, अब तो जीवित प्राणी भी नकली मिलने लगे।

                यो अपणा हरियाणा सै। कहते हैं कि देसा में देस हरियाणा, जित दूध-दही का खाणा। पर नकली घी-दूध, ड्रिंक तक सबकुछ नकली। शराबी भी खुश ना हो, क्योंकि शराब भी नकली मिल रही है। बताओ, एक पूरी बोतल पीकर भी कोई कहें कि नशा नहीं चढ़ा तो हैरानी नहीं होगी। पी ले, भाई पी ले, जितनी पीनी है, कोई नशा नहीं होने वाला। खा ले भाई खा ले, घी-दूध कितना भी खा पी ले, नकली घी-दूध खाकर क्या पहलवान बनेगा? विजेंद्र, अखिल, साक्षी मलिक, पूजा ढांडा, जिसने बनना था, बन लिए। गीता, बबीता फोगाट की फिल्म दंगल आए गी ना दोबारा। अब तक देसी घी और नई तकनीक, दांव-पेंच से पहलवान और मुक्केबाज बनते आए, आगे क्या होगा? हे राम, सब जगह लिखा रहता है कि नक्कालों से सावधान। शुद्ध के नाम पर कितना कुछ मिलावटी बेचा जा रहा है।

                आपातकाल का दौर बहुत खराब दौर था। मीडिया के लिए तो सबसे बुरा। इस दौर में भी मिलावटी चीजें बेचने वाले पकड़े जाते थे। चायपती में क्या-क्या मिलाते थे, यह  सामने आने पर चाय पीना छोडऩे को मन हो जाता है। चावलों में कंकर आम बात थी। नकली-मिलावटी और फर्जी चीजों में जहर तक शामिल हैं। ज़हर पीकर भी प्राण नहीं छुटते। ल्यों कर लो बात।

                शिक्षा की बात करें तो सरकारी स्कूलों में अपनी जगह दूसरों को ठेके पर शिक्षक लगवाकर खुद पूरा वेतन ले जाते हैं। कैसे? पाठ्यपुस्तकें भी खरीदनें की जहमत नहीं उठाते और बाजार में पाठ्यपुस्तों पर आधारित गाईडें और कुंजियों की भरमार हैं। गैस पेपर के नाम से शुरू हुआ सिलसिला पूरी परीक्षा को ही प्रभावित कर रहा है। कभी आंसर की, कभी पेपर लीक तो कभी कुछ। कैसे परीक्षा? किस की परीक्षा? फर्जी परीक्षार्थी तो डयूटी के स्टाफ में फर्जी शिक्षक। हद हो गई यार। यह कहां जा रहे हैं हम? असली मरीज, नकली डाक्टर। क्या होगा इलाज? हिसार में तो नकली चोट और असली नोट मामला खूब चर्चा रहा। नकली और बिना डिग्री वाली शराब बनाने के लिए हिसार का एक गांव खूब मशहूर है। एक बार एसपी हमें मीडिया के ग्रुप में साथ लेकर गया। मीडिया के सामने ही नौजवानों ने इस नकली शराब के कारोबार को बेरोजगारी से जोड़ दिया। कमाल है भाई, क्या बेरोजगारी से लडऩे का यहीं एक उपाय है? लगता है हमारी सोच ही नकली हो गई है। कुछ तो बड़ा सोचो यार।

kamlesh-bhartiyaलेखक परिचय

कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइश हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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