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नाम में क्या रखा है !

September 15, 2016 6:06 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

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लोग अक्सर कह देते हैं नाम में कुछ नहीं रखा होता। अगर नाम में कुछ नहीं रखा तो नाम रखा क्यों जाता है, किसलिए जाता है, नाम पुकारते क्यों हैं और नाम जब ख्याति पा लेता है तो उस नाम के मालिक या इंसान इतना खुश क्यों होते हैं। 20 लोगों में जब आपका नाम पुकारा जाता है तो सिर्फ आप ही एकदम चेतन क्यूं होते हैं, कोई दूसरा क्यों नहीं। क्या आपका नाम बदल दिया जाए तो आपमें पहले से ज्यादा गुण आ सकते हैं ? मान लिजिए अगर आपका नाम मुकेश है और आप दसवीं पास विद्यार्थी हैं तो क्या आपका नाम अगर अरविंद कर दिया जाए तो क्या आप ग्रेजुएट हो जाएंगे, बिल्कुल नहीं, उल्टा आपको पागल जरूर कह देंगे लोग। हरियाणा की बीजेपी सरकार भी कुछ ऐसा ही कर रही है।

खाद्य एवं आपूर्ति विभाग का बदला नाम

हरियाणा सरकार ने अपने खाद्य एवं आपूर्ति विभाग का नाम बदलकर खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग कर दिया है। उधर मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने भी व इसको मंजूरी दे दी है। विभाग के राज्यमंत्री कर्णदेव काम्बोज कहते हैं कि बदले गए नाम से विभाग की समस्त कार्यप्रणाली परिदर्शित होती है। काम्बोज ने कहा कि ये विभाग लोगों को खाद्य पदार्थों की आपूर्ति करवाता है तथा उपभोक्ताओं की शिकायतों का निवारण भी करता है। उन्होनें कहा कि इससे पहले विभाग के नाम से विभाग के कार्यों की व्याख्या सही ढंग से नही हो रही थी, इसलिए नाम बदल दिया गया है।

अहम सवाल

भले ही सरकार ने अपना तर्क देकर पल्ला झाड़ लिया हो। सरकार के मुताबिक इससे पहले विभाग के नाम से विभाग के कार्यों की व्याख्या ठीक ढंग से नही होती थी, तो क्या अब सच में विभाग के कार्यों की व्याख्या ठीक ढंग से हुआ करेगी? क्या नाम बदल देने से विभाग की कार्यशैली में परिवर्तन आएगा? क्या हरियाणा का ‘खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग’ सच में खाद्य की आपूर्ति करने लगेगा? क्या विभाग का नाम बदल देने से उन भूखे लोगों तक खाना पहुंच पाएगा जो जिनको अब तक भरपेट खाना नहीं मिलता था, क्या मनरेगा मजदूरों को अब सचिवालय के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे? क्या खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग नाम कर दिए जाने के उपरांत अब उपभोक्ताओं को संबंधित विभाग से आरटीआई के जरिए मांगे गए उनके जवाब तुरंत मिल जाया करेंगे? क्या विभाग में मनरेगा की मजदूरी को लेकर हुई पिछे की धांधलियों के दाग धुल जाएंगे? ऐसे और भी न जाने कितने सवाल हैं जो अहम है।

पीछे भी बदले गए कई नाम

हरियाणा की बीजेपी ने अबसे पहले भी इस तरह कई नामों में परिवर्तन किया है। इससे ठीक पहले हरियाणा के ही एक विभाग जिसे कृषि विभाग कहा जाता था; का नाम बदलकर कृषि एवं किसान कल्याण विभाग कर दिया गया था। खैर, यहां भी विभाग के कार्यों की व्याख्या ठीक ढंग नहीं हुई होगी। मेवात को नूह और औद्योगिक क्षेत्र गुड़गांव को गुरूग्राम इसी सरकार ने ही किया था।  नाम बदलना सरकार की मर्जी होती है और सरकार के पास ऐसा अधिकार भी होता है कि वो किसी विभाग, शहर या गांव का नाम बदल सके। वैसे देखा जाए तो इन दोनों ही शहरों के नाम बदलने की जरूरत नहीं थी, इन नामों से किसी को कोई आपत्ति भी नहीं थी।

जहां जरूरत है वहां नहीं बदले गए नाम

वहीं सरकार उन गांवों के नाम नहीं बदलती जिनका लेने में लोगों को शर्म आती या जो नाम अच्छे नहीं है। करनाल ब्लॉक का गांव लंडौरा, हिसार के आदमपुर ब्लॉक का कुतियांवाली, उकलाना का चमारखेड़ा और कुरुक्षेत्र के शाहाबाद के लंडा और लंडी दोनों गांवो का नाम बदलने की बार मांग होती रही है। उधर मेवात के गधामोड़, चोरगढ़ी, चोरपुरी, कानी झारोकडी के नाम से भी लोग काफी परेशान है। लोग बार-बार सरकारों से कहते आए हैं मगर इनके नाम बदलने की मांग अभी पूरी नहीं होती दिख रही। वहीं जब गुड़गांव और मेवात का नाम बदला गया तो मीडिया में काफी बबाल भी हुआ था एक तरफ बीजेपी, आरएसएस और पारम्परिक लोग इससे सहमत थे तो आधुनिक पीढियां सरकार से काफी नाराज भी हुई। खैर छोड़िए, न मानने वाले लोग तो अब भी गुड़गांव को गुड़गांव कह लेते हैं।

खर्च तो बढता ही है

जब किसी विभाग या शहर का नाम बदला जाता है तो वहां के बस स्टैंड, डाकखानों या कहें कि सरकारी कार्यालयों के आगे लगे बड़े-बड़े बोर्ड भी बदल जाते हैं। पुराना सूचना पट्ट हटा दिया जाता है, उसका स्थान नया बोर्ड ले लेता है। ये सब करने में खर्च तो बढता ही है और ये करने का अर्थ है फिर से लाखों कागजात पुन: छपवाने पड़ेंगें यानि धन के साथ साथ पर्यावरण का नुक्सान, दूसरा सरकारी दफ्तरों की स्टेशनरी यानि कि मोहर, लेटरपेड या कोई आवेदन फॉर्म आदि आदि भी बदलने होंगे जिसकी लागत अलग से आएगी। धन का खर्चा तो है ही समय व मेहनत की बर्बादी जो इसे करने लगेगी उसका मूल्य आखिर कैसे आंका जाये; हमारे पास कोई पैमाना नहीं है। अब नुक्सान तो इसका इतना सारा है क्या सरकार के पास खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले नाम करने से होने वाले फायदों की कोई सूची है या फिर वही विभाग के कार्यों की व्याख्या वाला राग सरकार अलापेगी?

होना तो चाहिये था कि हरियाणा सरकार विभाग की ओर से नागरिकों को मिलने वाली बुनियादी जरूरतों पर गौर करती, सटीकता से कोई नियम विभाग की ओर से लागू करती या जिन गांवों तक विभाग की योजनाएं न पहुंच रही है वहां तक उनको पहुंचने का कोई समाधान तलाशती, मजदूरों का रूका हुआ वेतन दिलवा देती या अनपढ़ ग्रामीणों को राशऩ के लिए जो जिले के सचिवालय तक चक्कर काटने पड़ते हैं उन पर रोक लगाती। अब सवाल ये है कि क्या नाम बदलना ही विभाग के विकास के लिये काफी है?

लेखक एस.एस.पंवार हरियाणा खास के कंटेंट एडिटर हैं

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