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मुफ्त इलाज – पहलम बीमारी नै तो ईब यो ब्याज सिर गंजा करैगा

January 5, 2017 10:09 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

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सूरता काले नै बोल्या – काले माड़ा मन क्यूंकर कर रया सै भाई?

काला – के बताऊं सूरते वा थारी भाभी कई दिन तै बीमार सै।

सूरता – तो फेर उसनै खरखोदै सरकारी हस्पताल मैं लेज्या।

काला – लेग्या था उड़ै। दो हफ्ते दवाई दी। 782 रुपइयां की दवाई आई फेर आराम कोण्या आया।

सूरता – मैडीकल मैं नहीं दिखा कै ल्याया?

काला – उड़ै बी लेग्या था। सात चक्कर तै काट लिये। पांच सौ रुपये तै फालतू तै भाड़े-भाड़े के खर्च हो लिए। दवाइयां के भी 600-700 और लागगे। फेर डाक्टर बोले अक रंगीन एक्सरे होवैगा अर उसकी तारीख दे दी तीन महीने आगे की। 250 रुपइये का अल्ट्रासाउंड करया। मनै सोची अक तीन महीने मैं तो या ऊंए ना मर लेगी। मैं रोहतक नरूला मैं चाल्या गया भाई। उसनै डेढ़ हजार तै फालतू रंगीन एक्सरयां के ले लिये पर उसकी रिपोर्ट मैं भी बीमारी का खुलासा नहीं हुआ। तो डाक्टर बोले अक एक लिजा टैस्ट हो सै टी.बी. खातर ओ और करवा कै देख ले। 600-700 रुपइये उसमैं लागगे फेर उसमैं टी.बी. कोण्या आई।

सूरता बोल्या – चाल सोनीपत चालांगे उड़ै एक डाक्टर बहोत स्याणा सै। मैडिकल मैं धक्के खाये ओड़ मरीज कई ठीक कर लिये उसनै। काला बोल्या चाल पड़ांगे। आगले दिन सोनीपत गये – उड़ै डाक्टर बोल्या अक इसका तो परेशन बनैगा अर रुपइये 25000 लागैंगे इसकी आंत मैं गुलझट सै वा ठीक करणी पड़ैगी। सूरते नै काले कान्ही देख्या। काला बोल्या – सलाह करकै अर पीस्से का इंतजाम करकै फेर आवांगे। बड़ी भीड़ी धरती होगी। घर मैं च्यार याणे-याणे बालक। घरआली की लाम्बी बीमारी। करै तो के करै।

गाम मैं नेता जी आरे थे उनकै साहमी दुखड़ा रोया। ओ बोल्या – घबरावै मतना। मैडिकल मैं तेरा इलाज मुफ्त मैं हो ज्यागा। उसनै काण कै टेलीफून लाकै अर बेरा ना किसतै बात करी अर न्यों बोल्या थोड़ा घणा दवाई दवाइयां का खर्चा हो तै हो ना तै मैडिकल मैं फलाणे डाक्टर तै उस दिन जाकै मिल लिये अर थारा काम हो ज्यागा। काला तीन हजार रुपइयां का इंतजाम करकै फेर मैडिकल पहोंच्या। संतरा दाखिल तै होगी फेर उसमैं खून की कमी थी। डाक्टर बोला च्यार बोतल खून की चाहियें दो परेशन तै पहले चढ़ाणी पड़ैंगी अर दो परेशन कै बख्त चाहिये। काले मैं आपे खून नहीं रैहरया। ओ बोल्या – डाक्टर साहब खून कितै मोल नहीं मिलज्या। मैं गरीब माणस सूं अर कोए और माणस सै नहीं। डाक्टर बोल्या – खून का इंतजाम तो तनै ए करना पड़ैगा। हाथी का खून तो चढ़ता नहीं माणस कै। इसकै तो माणस का ए खून चढ़ैगा। ल्या चार माणस किते तैं बी। संतरा बोली चाल चालांगे गाम मैं। मनै मरणा सै तो चैन तै तो मर ल्यूंगी उड़ै।

काला सूरते धोरै आया अर बोल्या – सूरते खून की अड़गी। के करूं? सूरते नै खून दिया एक रिश्तेदार (स्साले) ने दिया फेर दो की कसर फेर बी रहैगी। अस्पताल मैं छह दिन होगे। संतरा के पेट का अफारा बढ़ता चाल्या गया। खून पै रोज डाट पड़ै काले पै अर ओ तले नै नाड़ करकै चुप चाप सुणले। कर करा के एक माणस मैडिकल के बार तै पकड़या अर उस ताहिं सात सौ रुपये दिये अर एक बोतल खून का इंतजाम और करया चौथी बोतल ताहिं बड्डे डाक्टर के पाहयां कान्हीं हाथ करकै बोलया – देखल्यो डाक्टर साहब थाम तो भगवान सो संतरा नै बचाल्यो। डाक्टर पसीजग्या अर चौथी बोतल उड़ै तै करवादी।

परेशन बणग्या। परेशन आले दिन 1200-1300 का सामान आया। अर दस दिन पाछै रही उड़ै। रोज की ग्लूकोज की चार बोतल दो सौ रुपइयां की लागती। एक टीका दो सौ रुपइये का दो बै लागता। दस दिन मैं आठ हजार की ग्लूकोज ल्याणी पड़ी। फेर शुकर सै संतरा के पेट का दर्द तै ठीक होग्या चाहे बीस हजार रुपइये तीन रुपइये सैकड़ा ब्याज पै लेणे पड़े। ईब कद सी अक यू कर्जा उतरैगा इसकी चिंता खायें जा सै काले नै। पहलम तै बीमारी नै सिर गंजा करया अर ईब यो तीन रुपइये सैकड़े का ब्याज सिर गंजा करैगा।

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लेखक परिचय

डॉ. रणबीर सिंह दहिया पीजीआई रोहतक के सेवानिवृत सर्जन हैं और हरियाणवी साहित्य व समाज की गहरी समझ रखते हैं…. फौजी मेहर के गांव बरौणा में पैदा हुए डॉ. दहिया उनकी विरासत को रागनी लेखन के जरिये आगे बढ़ा रहे हैं। वर्तमान में भी निशुल्क ओपीडी की सेवाएं जरुरत मंद लोगों के लिये देते हैं और समाज के प्रति समर्पित एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका अदा कर रहे हैं।

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