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आधी रात को मिली आज़ादी लेकिन….

August 15, 2016 1:31 am by: Category: इतिहास खास 1 Comment A+ / A-

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आजादी…… आजकल इस शब्द के अनेक मायने हैं, यह शब्द संदर्भ के साथ ही अपने मायने भी बदल लेता है। आजादी का आज इतना विस्तरित अर्थ हो गया है कि इसका असल अर्थ और इसे पाने के लिये हुई जद्दोजहद और कुर्बानियां तक विस्मृत होने लगी हैं। हमें आजादी मिले सात दशक बीत चुके हैं पिछले लगभग तीन चार दशकों में पैदा होने वाली पीढ़ियों के लिये इस आजादी को पाने के लिये चुकाई गई कीमत का अंदाजा लगाना ही बहुत मुश्किल है। लेकिन इतिहास को दस्तावेज़ों के जरिये जाना जा सकता है। तथ्यात्मक दस्तावेज़ जानकारियां देते हैं लेकिन कुछ किताबें ऐसी भी होती हैं जिनसे हम अपने अतीत से भावनात्मक रुप से जुड़ सकते हैं….. जिस तरह बोल्शेविक क्रांति को समझने के लिये जॉन रीड की ‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी’ या फिर क्रांतिकारी जीवन को समझने के लिये मेक्सिम गोर्की के ‘मां’ जैसी किताबें बेहतर मानी जाती है उसी कड़ी में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की कुछ सच्चाईयों को जानने में दॉमिनीक लैपिएर और लैरी कांलिंस की किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ यानि ‘आधी रात को आजादी’ का जिक्र किया जाता है। इस किताब की समीक्षा में पेरिस के अखबार ‘ली मोन्दे’ ने लिखा था, ‘ऐसी किताब जो कभी दूसरी नहीं हो सकती।’

क्या कहती है किताब आधी रात को आजादी

आधी रात को आजादी…. देश के स्वंतंत्रता आंदोलन की कहानी नहीं है बल्कि यह उन आजादी से ठीक पहले के कुछ दिनों की कहानी है जिसमें अतीत की कुछ कड़ियों को भी गांधी जैसे पात्रों के जरिये जोड़ा गया है। हालांकि किताब भारत को मिली आजादी पर आधारित है लेकिन इसके नायक सिर्फ और सिर्फ लार्ड माउंटबेटन हैं। यह उन्हीं की कशमकश…. और उन्हीं की जद्दोजहद को दर्शाती है…. भारत को आजादी मिलनी तो तय थी लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के सामने संकट यह था कि वह विदा कैसे ले…. आजादी आंदोलन के कारण हुए डिजास्टर को कैसे मैनेज करे लार्ड माउंटबेटन को यही जिम्मेदारी दी गई थी…. पूरी किताब उनके इर्द-गिर्द ही घुमती है। माउंटबेटन के साथ महात्मा गांधी के जीवन का चित्र बहुत अच्छा खिंचा गया है।

विभाजन के मुद्दे को समझने में मदद करती है किताब

विभाजन के मुद्दे पर हिंदु-मुसलमान आज भी एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं। लेकिन इस किताब को पढ़ने के बाद उपरी तौर पर हम विभाजन की असल वजहों को समझ सकते हैं…. राजनेताओं के अहम, मुस्लिम लीग व हिंदु महासभा की बंटवारे की जिद्द, महात्मा गांधी की उपेक्षा व अंग्रेजों की कुटनीति असल में देश के टुकड़े करने के असल कारक हैं। गांधी बार-बार आगाह करते रहे विनाश को रोकने के लिये प्रयास भी किये लेकिन ऐन वक्त पर वो बिल्कुल अकेले पड़ गये। उनके अनुयायि उन्हें महात्मा मानते थे… उनकी इज्जत भी करते थे लेकिन उनकी हालात परिवार में किसी असहाय बुजूर्ग की मानिंद ही थी।

सांप्रदायिकता के बीज किसने बोये

किताब के जरिये सांप्रदायिक दंगें कैसे अफवाहों से विकाराल रुप लेते हैं… और लोगों की भावनाओं को उद्वेलित कर उनसे अपने उल्लु कैसे सिद्ध किये जाते हैं इसके अच्छे उदाहरण हैं…… आज भी गाहे बगाहे घटनेवाली सांप्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि और तरीके मूल रूप से वही हैं लेकिन तकनीक का इस्तेमाल इन दिनों बढ़ने लगा है और यह काम पहले से और आसान हो गया है।

भारत के लिये गौरवशाली कुछ नहीं है

अगर किताब में लिखी सारी बातें सत्य हैं, जिसका की लेखकों ने दावा किया है कि इस किताब को तैयार करने में उन्हें काफी शोध करना पड़ा है…. तो इसमें बहुत से पहलु ऐसे हैं जिन पर हम कभी गर्व नहीं कर सकते। मसलन देश आजाद करवाने की तो हमने सोच ली लेकिन हमारे पास यह विकल्प या इच्छाशक्ति तक नहीं थी कि हम अंग्रेजों के बिना एक दिन भी शासन को चला लें…. इसलिये आजादी के बाद भी नेहरु और पटेल माउंटबेटन का मुंह ताकते रहे….. यही इस किताब की सारी बातें सत्य नहीं हैं तो यह भारत के गौरव को ठेस पंहुचाने का एक प्रयास है….. इसे एक सांस्कृतिक हमले के रुप में भी देखा जा सकता है जिसमें जवाहरलाल नेहरु और पटेल जैसे नेताओं को अनुभवहीन और राजनीतिक रुप से बहुत दीन दिखाया गया है।

महात्मा गांधी को किसने मारा

महात्मा गांधी की हत्या की पूरी साजिश को पुस्तक में दर्ज किया गया है….. किसने क्या योजना बनाई….. नाथु राम गोडसे के साथ इस हत्या में और कौन कौन शामिल थे आदि। किताब में आरएसएस जैसे संगंठन की संलिप्तता की ओर ईशारा किया गया है।

कश्मीर की उलझन और रियासतों का मिलन

छोटी छोटी रियासतों में बंटे मुल्क को एक करना आसान नहीं था….. आजादी मिलने के बाद तक भी तीन रियासतें भारत का हिस्सा नहीं थी…… उनमें से भी कश्मीर की समस्या तो ऐसी उलझी की आज तलक सुलझने में नहीं आ रही।

क्यों मिली आधी रात को आजादी

किताब का शीर्षक ही चूंकि आधी रात को आजादी है…… बड़े आश्चर्य की बात है कि अंधविश्वास कहें या विश्वास कहें ज्योतिषशास्त्रियों के चेतावनी देने के बाद ही आधी रात को आजादी का उत्सव मनाया गया। दरअसल ज्योतिषाचार्यों की गणना के अनुसार 15 अगस्त का दिन बहुत ही अशुभ था…….. इसलिये लुई माउंटबेटन ने चतुराई दिखाते हुए आधी रात को आजादी विकल्प ज्योतिषाचार्यों के सामने रखा जिस पर सबकी सहमति हो गई।

कुल मिलाकर किताब बहुत ही बेहतर तरीके से लिखी गई है। इसका एक एक पृष्ठ पढ़ने और संग्रहण करने के लायक है। पढ़ते हुए आपको लगेगा कि आप किताब नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि किसी सिनेमा हॉल में बैठककर किसी फिल्म का आनंद ले रहे हैं। कहीं आप गांधी के शांति की अपील करते हैं तो कहीं आप माउंटबेटन और नेहरु की तरह दंगों के अनपेक्षित परिणाम से पश्चाताप करते हैं। कहीं आप जिन्ना की अकड़ को तो कहीं गांधी की लोगों पर पकड़ को अच्छे से महसूस कर सकते हैं। किताब का पहला संस्करण 1975 में प्रकाशित हुआ था, उसके बाद इसके कई संस्करण आ चुके हैं। हिंदी में भी इसके कई अनुवाद हो चुके हैं। जयपुर के अनु प्रकाशन ने 2004 में इसे प्रकाशित किया है जिसका हिंदी में अनुवाद मनहर चौहान द्वारा किया गया है। इस पेपरबैक संस्करण की कीमत एक सौ पच्चीस रुपये रखी गई थी। हो सकता है यह संस्करण आपको फिलहाल न मिले लेकिन नये संस्करण और अन्य प्रकाशनों द्वारा प्रकाशित अनुवाद भी आपको मिल सकते हैं। इतिहास में रुचि रखने वाले और साहित्य प्रेमियों को तो एक बार यह पुस्तक जरुर पढ़नी चाहिये। स्वतंत्रता दिवस पर हरियाणा खास की ओर से आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

 

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Comments (1)

  • Dharmveer

    bahut khub good work

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