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गजे सिंह बांसळी वादक – ताऊ.. इब तेरी बांसळी नै कोण थामैगा

August 23, 2016 5:03 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-
ए वन तहलका हरियाणा फेम हरविंद्र मलिक जी को अपनी कला दिखाते ताऊ गजे फोटो मलिक जी के खजाने से साभार

ए वन तहलका हरियाणा फेम हरविंद्र मलिक जी को अपनी कला दिखाते ताऊ गजे फोटो मलिक जी के खजाने से साभार

हर साल हरियाणा दिवस के मौके पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित होने वाले रत्नावली महोत्सव में उनकी बांसळी को सुनकर आनंद आता था। हर साल गीता जयंती पर भी उनकी बांसळी की धुन गीता के उपदेशों सी लगती थी। सूरजकुंड के मेले में भी जब वे बांसळी पर गंगा जी तेरे खेत मैं धुन छेड़ते तो लगता जैसे साक्षात पंडित मांगेराम मंच पर अवतरित हो गये हों। लेकिन अब किसी भी समारोह में ये बांसळी की धुन सुनाई नहीं देगी। जींद जिले के गांव छात्तर निवासी गजे सिंह जिन्हें सब प्यार से ताऊ गज्जे कहते थे अब शारीरिक रुप से दुनिया में नहीं रहे। लगभग सात दशक के जीवन में यूं तो लोक संस्कृति की विरासत बचाते हुए उन्होंनें खूब उपलब्धियां हासिल की हैं। हरियाणा सरकार द्वारा उन्हें बांसळी वादन की कला को सहेजने के लिये सम्मानित भी किया गया। इसके अलावा राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर के लोक परम्पराओं पर आधारित कार्यक्रमों में भी वे जाते रहे। लेकिन अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी वे इस कला को लेकर चिंतित थे। 2014 में उनसे बातचीत करने का मौका मिला था तब उन्होंनें चिंता जताते हुए कहा था कि नई पीढ़ी इस कला को अपनाने में रुचि नहीं दिखाती, और दिखाएगी भी क्यों अपेक्षानुसार पैसा भी तो इसमें नहीं मिलता।

gaje and team with malik sir

गजे एंड पार्टी हरविंद्र मलिक जी के साथ यह फोटो भी हरविंद्र मलिक जी के खज़ाने से

ताऊ गज्जे की धुनों में पारम्परिक लोकगीतों से लेकर राग, देश, मालकोश, आदि का मिश्रित रुप सुनाई देता था। गंगा जी तेरे खेत, बंदे सतगुरु सतगुरु बोल, या लाडो पुछै दादा नै, राम और लछ्मण दशरथ के बेटे यानि कात्तक, सामण, फागण से लेकर बारहमासों के गीतों की धुन सुनाई देती थी।

हो सकते है बहुत सारे लोग तो बांसळी से भी परिचित न हों तो यह बांसळी बांसुरी बिल्कुल नहीं होती लेकिन हां यह भी एक खोखले बांस का एक छोटा सा टुकड़ा होता है लेकिन इसे बजाने का अंदाज बिल्कुल अलग होता है। बनावट भी बांसुरी से भिन्न होती है। यह बांसुरी से थोड़ी छोटी होती है और इसमें बांसुरी की तरह कोड यानि एबीसीडीजी आदि का चक्कर नहीं होता। ताऊ गजे सिंह के चले जाने से बांसळी वादन जिस कला के वे अकेले नायक थे को बहुत क्षति हुई है शायद ही ताऊ की बांसळी अब दूसरे हाथों में दिखे….

उनके निधन की खबर के बाद से ही सांस्कृति क्षेत्र के विद्वान उन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से श्रद्धांजलि दे रहे हैं। हरियाणा खास भी ताऊ गजे को सलाम करता है।

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