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गौरी लंकेश की हत्या – खोखला हो गया है तंत्र

September 7, 2017 11:47 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

एक तस्वीर की आंखों में बार बार देख रहा हूं कल से। तस्वीर देख भावुक हूं। दिल पसीज रहा है। गला भर आता है कभी-कभी। कोई नहीं है पास जो मेरी नम आंखों को सहला सके। मुझे सांत्वना दे सके। जो समझा सके मुझे विज्ञान की भाषा में कि कोई भी रिश्ता खून के रिश्ते जैसा कैसे लगने लगता है या कैसे कोई चला जाता है तो भाषा, खून, राज्य, धर्म या जात अलग होने पर भी हम उन्हें याद कर फफक पड़ते हैं। पत्रकार गौरी लंकेश का चला जाना मन को बार-बार आहत कर रहा है। एक ऐसी पत्रकार के चले जाने से, जो न मेरी जात की हो, न ही मेरा कोई पारिवारिक तआल्लुक है उसके साथ, न मेरे गांव, जिले या शहर की हैं वो। इवन राज्य तक बहुत दूर हैं। लेकिन मलाल इस बात का कि एक लोकतंत्र की हत्या इस तरह गले नहीं उतरती।

बहुत से कुंठित लोगों के कुतर्क सोशल मीडिया पर पढकर रहा नहीं जा रहा। सोचा लिख ही दूं कि मैं क्या कहना चाहता हूं इस पर। जो हिंदूत्व की दुहाई देने वाले लोग हैं उनसे मेरा कहना है कि वे जाकर रामचरितमानस का अध्ययन करें या किताबों में ये तलाश करें कि उनके धर्म का इतिहास क्या है, किसने इस धर्म की शुरूआत या स्थापना की? क्या वे जिस धर्म की दुहाई देते हैं उसके संबंध में उन्हें सच में ये पता है कि उसमें कट्टरता कहां से शुरू होती है, या जिसे वो अपना धर्म कहते हैं उसमें रूढियों या कट्टरताओं का प्रतिशत कितना है, आश्चर्य तो ये जानकर होगा कि जिस मीडिया से वो इस बात की खबर हासिल करते हैं कि पत्रकार गौरी लंकेश हिंदुओं के खिलाफ लिखती थी, जिसके कारण उसे मार दिया गया; उस मीडिया को ऑपरेट कौन कर रहा है?

अपने आप को हिंदु कहकर खुद की पीठ थपथपाने वाले क्या ये बात भूल जाते हैं कि वो जिस धर्म के नियमों को सर-माथे पर रखते हैं क्या उनमें ऐसा कोई भी उल्लेख मिलता है कि उनके खिलाफ बोलने वालों को जान से मार देना चाहिए? क्या हिंदु धर्म के धर्मगुरू या संचालक-संस्था ये आह्वान करती है कि उन्हें देश में लागू संविधान और कानून के नियमों को ताक पर रखकर काम करना चाहिए? अगर नहीं तो क्या उनकी भावनाएं आहत होने पर उन्हें कानून का दरवाजा खटखटाने का अधिकार नहीं है? ये तमाम बातें सोचने लायक है। इतनी ही नहीं और भी बहुत सारी बातें हैं जिन पर मैं हिंदु होते हुए भी प्रकाश डालूंगा तो शायद पाकिस्तान भेज दिया जाउंगा।

सबसे शर्मनाक तो ये कि एक पत्रकार की हत्या के बाद जो खुश हो रहे हैं, पत्रकार को कुतिया बोल रहे हैं, किसी हत्या की खुशी मना रहे हैं, उसे खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फॉलो कर रहे हैं। एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के प्रधानमंत्री होने के नाते क्या पीएम को ऐसे मसलों पर गंभीर नहीं होना चाहिए? हालांकि इस तरह हुई पूर्व की हत्याओं में सरकारें अपराधियो को तलाशने में अब तक नाकाम रही हैं। खैर छोड़ो। सोचने लायक बात तो ये है कि जिस देश के मौलिक अधिकार उस देश लोगों को लिखने, बोलने, सोचने, संगठन बनाने जैसे तमाम तरह की अनुमति देते है उस देश की सरकारें इस बात को लेकर संशय में नजर आती है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकारों की श्रेणी में आता भी है कि नहीं। अधिकारों, नियमों को खारिज करने वाली सरकारें निश्चय ही किसी जीवन का हिसाब लगाने के गणित में कमजोर ही मिलेंगी। और ये होता भी रहा है।

मंगलवार शाम को बैंगलुरू में कन्नड़ भाषा की लेखिका और चर्चित पत्रकार की अज्ञात हमलावरों द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई। पुलिस के मुताबिक उन पर अज्ञात हमलावरों ने उस वक्त हमला किया जब वे अपने घर लौट रही थीं। बताया जा रहा है कि गौरी लंकेश को काफी दिनों से धमकियां मिल रही थीं।

आपको बता दें कि बेबाक लिखने वालों, लेखकों, पत्रकारों की इस तरह हत्या का ये पहला मामला नहीं है। इससे पहले 20 अगस्त 2013 को पुणे (महाराष्ट्र) में जाने माने विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी गई थी। आज तक सरकार उनके हत्यारों का पता लगाने में नाकाम रही है। वहीं सामाजिक कार्यकर्ता और विचारक गोविंद पानसारे की हत्या भी 20 फरवरी 2015 को इसी तरह  हुई थी जिनके हत्यारों का आज तक कोई पता नहीं लग पाया है। इसी श्रेणी में डाक्टर एमएम कलबुर्गी का भी नाम आता है जो प्रख्यात विचारक और तर्कवादी दृष्टिकोण रखते थे। जिनकी हत्या उसी साल यानि 2015 में 30 अगस्त को कर दी गई।

सिलसिला इतना छोटा भी नहीं कि यहां थम गया होगा, जरूर मैं शायद याद न कर पा रहा हूं कि इस श्रेणी में कौन- कौन और लोग हैं जो मेरी कलम से अछूते रह गए है। बड़ा सवाल ये है कि क्या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाने वाली पत्रकारिता पर होने वाले हमले और उसके बाद अपराधियों का पता न लगना क्या लोकतंत्र की खोखली बुनियाद का संकेत नहीं है? क्या सरकारों को लिखने, बोलने की अभिव्यक्तियों पर मंडराने वाले खतरों को लेकर सख्ती से पेश नहीं आना चाहिए, क्या धर्म को सर्वस्व मामने वाली सरकार के अनुयायी ये भूल जाते हैं कोई दुश्मन ही अगर मर जाए तो हमारे धर्म में ये बात नहीं कही जाती जो हाल ही में किसी की हत्या पर कह दी गई है, ये तमाम बातें सोचनीय है।

लेखक परिचय – एस.एस पंवार स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य करते हैं, एक अच्छे कवि हैं। वर्तमान में वह फतेहाबाद के एम.एम कॉलेज में अध्यापन कार्य कर रहे हैं।

सपष्टीकरण – लेख में दिये गये विचार लेखक के नीजि विचार हैं जिन्हें यहां ज्यों का त्यों प्रकट किया गया है। लेख में प्रस्तुत तथ्यों, सूचनाओं के प्रति हरियाणा खास उत्तरदायी नहीं है।

गौरी लंकेश की हत्या – खोखला हो गया है तंत्र Reviewed by on . एक तस्वीर की आंखों में बार बार देख रहा हूं कल से। तस्वीर देख भावुक हूं। दिल पसीज रहा है। गला भर आता है कभी-कभी। कोई नहीं है पास जो मेरी नम आंखों को सहला सके। मु एक तस्वीर की आंखों में बार बार देख रहा हूं कल से। तस्वीर देख भावुक हूं। दिल पसीज रहा है। गला भर आता है कभी-कभी। कोई नहीं है पास जो मेरी नम आंखों को सहला सके। मु Rating: 0

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