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साहित्य जगत को अपूर्णनीय क्षति, नहीं रहे प्रोफेसर गुरदयाल सिंह

August 17, 2016 5:02 pm by: Category: शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

ज्ञानपीठ, पद्मश्री, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, चार बार बेस्ट फिक्शन बुक अवॉर्ड एवं पंजाब साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार प्रोफेसर गुरदयाल सिंह नहीं रहे। मंगलवार दोपहर को बठिंडा के एक निजी अस्पताल में उनका निधन हो गया। वे 83 बरस के थे।

gurdyal singh

उनके निधन की खबर मिलते ही साहित्य-प्रेमियों में एक शोक की लहर दौड़ गई। गुरदयाल सिंह पिछले कुछ समय से बीमार थे और बठिंडा के एक निजी अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था। प्रोफेसर गुरदयाल सिंह साहित्य के साथ-साथ पंजाब और पंजाबियत से संबंधित मामलों पर अच्छी पकड़ रखते थे।

1998 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया जबकि 1999 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साल 2015 में उनका नाम लिम्का बुक्स ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। कुछ समय पहले ही भारतीय साहित्य अकादमी नई दिल्ली ने उन्हें लाइफ फेलोशिप देने की घोषणा की थी।

जीवन-यात्रा

10 जनवरी, 1933 को पैदा हुए प्रो. गुरदयाल सिंह का जीवन काफी संघर्षों भरा रहा। घरेलू कारणों की वजह से पहले स्कूल छोड़कर काम करने लगे और बाद में 10वीं पास करके निजी स्कूल में अध्यापन करने लगे। उच्च शिक्षा लेकर लेक्चरर बने और 15 साल बाद पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में पहले रीडर बने और फिर प्रोफेसर के पद से सेवामुक्त हुए।

वे बचपन से ही कला और साहित्य में विशेष रुचि रखते थे और इसका आगाज उन्होंने चित्रकारी और गायकी से किया था। जैतो के गुरुद्वारा गंगसर में वे कीर्तन भी करते रहे। जब संतोष नहीं मिला तो उन्होंने लेखन कला की ओर रुख कर लिया और फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

1957 में छपी थी पहली कहानी

साल 1957 में उनकी पहली कहानी भागां वाले प्रो. मोहन सिंह की पत्रिका पंज दरिया में प्रकाशित हुई। 1962 में उनका पहला कहानी संग्रह सग्घी फुल्ल प्रकाशित हुआ। साल 1964 में लिखे पहले ही उपन्यास मड़ी दा दीवा ने उन्हें विश्व स्तर के लेखकों में लाकर खड़ा कर दिया और प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह, डॉ. अतर सिंह, डॉ. अमरीक सिंह, डॉ. जोगिंदर सिंह आदि ने इसे ट्रेंड सेटर करार दिया था।

इस उपन्यास पर बनी थी फिल्म

इनका उपन्यास मड़ी दा दीवा की हिंदी और अंग्रेजी के अतिरिक्त रूसी भाषा में पांच लाख प्रतियों की बिक्री हुई जो अपने आप में एक रिकॉर्ड था। इसके पश्चात जहां समय के साथ-साथ उनके उपन्यास अद्ध चानणी रात, अणहोए, कुवेला, अन्ने घोड़े दा दान, पोह फुटाले तों पहलां, परसा, रेते दी एक मुट्ठी, आहण आदि प्रकाशित हुए वहीं अनेकों कथा संग्रह भी प्रकाशित हुए। उनके उपन्यास अन्ने घोड़े दा दान पर आधारित पहली पंजाबी फिल्म है जिसे इटली के अंतरराष्ट्रीय फिल्म मेले में दिखाया गया। खुद प्रोफेसर साहब इस फिल्म को कई बार देखते थे। इसके अतिरिक्त यह फिल्म पांच अन्य देशों में प्रदर्शित की जा चुकी है।

साहित्य जगत को अपूर्णनीय क्षति, नहीं रहे प्रोफेसर गुरदयाल सिंह Reviewed by on . ज्ञानपीठ, पद्मश्री, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, चार बार बेस्ट फिक्शन बुक अवॉर्ड एवं पंजाब साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यका ज्ञानपीठ, पद्मश्री, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, चार बार बेस्ट फिक्शन बुक अवॉर्ड एवं पंजाब साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यका Rating: 0

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