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म्हारे रिवाज – कितने ठीक कितने गलत?

February 28, 2017 11:13 pm by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

आजकाल म्हारे रिवाजां का, म्हारी पुरानी परम्परावां का, म्हारी पुरानी संस्कृति का बड़ा ढोल पिट्या जावण लागरया सै। उपभोगतावाद की गली सड़ी संस्कृति का मुकाबला इस पुरानी जंग लागे औड़ संस्कृति तै करण की गुहार करी जा सै। फेर खूंटा ठोक की एक बात तो गांठ मार लयो अक यो जो उपभोगतावाद की बाजारू संस्कृति का हमला सै इसका मुकाबला पुरानी संस्कृति तै, पुराने रिवाजां तै अर पुरानी परम्परावां तै नहीं करया जा सकदा। इन दोनूं संस्कृतियां मैं एक बात कोमन सै अर वा सै औरत नै एक चीज समझण की नजर, वा सै औरत नै उसके शरीर के मांह कै दैखण की नजर, औरत नै एक दोयम दर्जे का प्राणी समझण की नजर। आज बख्त की मांग सै, आज के सभ्य समाज की मांग सै, आज के आधुनिक समाज की मांग सै अक औरत बी एक इंसान समझी जावै, औरत का समाज मैं बरोबर का दर्जा हो, औरत का समाज के विकास मैं बराबर का साझा हो, समाज के चलावण मैं फैसले करण का उसका बरोबर का हक हो। समाज के विकास में औरत अर पुरूष कान्धे तै कान्धा मिला कै चालैं अर एक सभ्य सुसंस्कृत समाज की रचना करैं अर एक स्वस्थ इंसानी संस्कृति, एक ऊंचे दर्जे की मानवतावादी संस्कृति की रचना हो। फेर कई रलधू तै न्यों कहदें सैं अक औरत पुरुष के बरोबर क्यूंकर हो सकै सै? ये लुगाई पहल मैं सिर पै चढ़ा ली, इननै और सिर पै चढ़ाल्यो। इस ढाल के फांचर ठोक तै सारै ए पा ज्यांगे। बाकी एक बात जरूर सै अक इस उपयोगितावादी बाजारू संस्कृति का मुकाबला म्हारे पुराने रिवाज, म्हारी पुरानी परम्परा अर म्हारी पुरानी संस्कृति क्यूं ना कर सकदी? इसमैं सबतै जरूरी बात सै अक म्हारी पुरानी संस्कृति मैं भी औरत का दोयम दर्जा था, वा भोग की चीज मानी जावै थी अर इसे नजर तै म्हारे रिवाज बी बनाए गए।

जिब बात चीत चालै तो मां बाप सैड़दे सी कहवैंगे अक हमतै छोरा छोरी मैं कोए फरक नहीं करते। हमनै तै छोरी बल्क तै फालतू प्यारी लागै से। हो सके सै उनकी बात मैं दम हो फेर थोड़ा सा खुरच कै देखां तो वे भी दुभांत करते पावैं सैं। कई गामां मैं जिब महिला भू्रण हत्या के खिलाफ अभियान मैं गए तो बेरा पाट्या अक जिब छोरी हो सै तो जच्चा नै पांच सेर घी देवण का रिवाज सै अर जिब छोरा होवै तो दस सेर घी देवण का रिवाज सै। हमनै बताया अक या तो चौड़े मैं छोरी गेल्यां दुभांत सै तो वे महिला बोली ना या दुभांत कोण्या यो तै रिवाज सै।

ईब इननै कूण समझावै अक इन रिवाजां मैं, इन परम्परावां मैं ए तो दुभांत कूट-कूट कै भर राखी सैं। जिब छोरा हो तै थाली बजाई जावै खुशी मनावण खातर अर जै छोरी होज्या तै ठीकरा फोड़ कै मातम मनाया जावै। इस रिवाज मैं दुभांत कोण्या दीखती हमनै। लड़के के पैदा होवण पै नामकरण संस्कार धूमधाम तै करया जा अर लड़की होण पै नहीं। चुची धवाई का रिवाज छोरा पैदा होवण पै अर सोने की टूम ताहिं दी जावैं पर छोरी होवण पै कोए चूची ना धोवैं अर कोए ना धुवावै। छोरा होवण पै पिलिया अर छुछक का रिवाज बड़े चाव मैं भरकै मनाया जावै। छटी का दिन छोरे का ए क्यूं मनाया जावै। इस ढाल के रिवाजां की इतनी लाम्बी लिस्ट बनाई जा सकै सै जितनी लाम्बी द्रोपदी की साड़ी थी। जिब छोरा छोरी बरोबर तै फेर छोरा होवण की दवाई बाछड़े आली गां के दूध मैं क्यों खाई जावै? अर जै छोरी गर्भ मैं आ भी जावै तो इस बाजारू संस्कृति की दाब मैं अल्ट्रासाउण्ड करा कै बेरा पाड़ लिया जा अर छांट कै छोरी पै कटारी चला दी जा। वाह रै भारत देश महान तेरे क्या कैहने? गायां के वध पै तो रोज जलसे जलूस काढ़े जावैं अर इंसानां के वध पै चुप्पी साध ली जावै। वेहे डाक्टर जो छांट के महिला भ्रूण हत्या करण लागरे सैं, वे गौशाला के रक्षक अर और बेरा ना के बने पावैं सैं। जिब छोरिया की गिनती इतनी कम हो ज्यागी अक पांच भाइयां मैं तै एक का ब्याह हुआ करैगा ज्यूकर पहलम म्हारे रिवाज थे तो कै मन बीघे की उतरैगी? छोरा जरूरी चाहिए ना तै वंश क्यूकर चालैगा? या सै म्हारी पुरानी संस्कृति। छोरा नहीं होगा तै चिता नै लाकड़ी कूण देगा? पहलम तै रिवाज बनाया अक छोरी अर्थी गेल्यां शमशान घाट पै नहीं जा सकदी अर फेर सवाल ठा दिया अक चिता नै लाकड़ी कूण देवैगा?

हमनै अपणे पड़दादा का नाम ताहिं बेरा नहीं अर बात वंश की करां सां। छोरियां ताहिं न्यों कहया जावै सै अक मलाई खावैगी अर दूध पीवैगी तो मूंछ जाम ज्यांगी। कहण का मतलब यू सै अक जिब हम औरत नै एक इन्सानै माणण नै तैयार कोण्या, जिब उसनै बरोबर कर दर्जा ए देवण नै तैयार कोण्या तो इस बाजारू संस्कृति का मुकाबला क्यूकर कर सकां सां? असल मैं आज की जो अप संस्कृति सै वा म्हारी पुरानी संस्कृति की रूढ़िवादी परम्परावां अर आज की बाजारू संस्कृति की औरत नै एक चीजों के रूप मैं देखण की रूग्ण मानसिकता का घालमेल सै जयाहें तै तो चाहे जांघीया क्यूं ना बेचना हो गैल्या औरत जरूर मटकती दिखाई जावैगी। जै इस पुरानी रूढ़िवादी अर आज की बाजारू संस्कृति के घालमेल तै पैदा हुई सड़ांध का मुकाबला करना सै तो पुरानी संस्कृति की, पुराने रिवाजां की आंख मींच के कौली भरवाण तै काम कोण्या चालता। म्हारी पुरानी संस्कृति मैं भी जो अमानवीय रिवाज सैं, जो रूढ़िवादी परम्परा सैं जो गैर मानवतावादी रूझान सैं उनकी छंटनी करकै जो सम सामयिक स्वस्थ पहलूं सैं उनका साहरा लै कै इस बाजारू संस्कृति तै टक्कर लेकै नई संस्कृति, नए इंसान (औरत पुरुष दोनों) की, एक समतावादी, न्यायपूर्ण समाज की रचना ही हमें इस घालमेल के हमले से बचा सकै सै। फेर शाका यू सै अक इतनी डूंघी बातां पै सोच विचार कूण करै? एक बात और याद राखण की सै अक ये घालमेल संस्कृति आले आण आले बख्तां मैं महिलावां पै अपणा हमला तेज करैंगे। हो सकै सै ये तालिबान अर इराक की ढालां फतवे भी जारी करदें अक म्हारी संस्कृति नै खतरा सै, महिलावां नै घर तै बाहर नहीं लिकड़ना चाहिए, सिर पै चुन्नी जरूर होनी चाहिए अर हम भी सैड़ देसी इनकी गेल्यां होल्यांगे अक बात इनकी सौलां आने सही। फेर अफगानिस्तान मैं, पाकिस्तान मैं अर इरान मैं के होया इसका हमनै बेरा नहीं। इस घालमेल संस्कृति के मुकाबले मैं या फासीवादी संस्कृति हमने किते का नहीं छोड़ैगी आ फेर हम कहवांगे ओहले। हमनै के बेरा था न्यों बणज्यागी?

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लेखक परिचय

डॉ. रणबीर सिंह दहिया पीजीआई रोहतक के सेवानिवृत सर्जन हैं और हरियाणवी साहित्य व समाज की गहरी समझ रखते हैं…. फौजी मेहर के गांव बरौणा में पैदा हुए डॉ. दहिया उनकी विरासत को रागनी लेखन के जरिये आगे बढ़ा रहे हैं। वर्तमान में भी निशुल्क ओपीडी की सेवाएं जरुरत मंद लोगों के लिये देते हैं और समाज के प्रति समर्पित एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका अदा कर रहे हैं।

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