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खेल में उत्पीड़न और जेंडर बजट

गेम इन गेम की नयी परतों को खोलता सोना चौधरी का यह ताजा लेख

March 1, 2017 10:15 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

-सोना चौधरी

जब मैने नब्बे के दशक में फुटबाल खेलना शुरू किया था तो वर्षों तक नियमित रूप से इस ‘मर्दाने’ खेल को खेलने वाली मैं पूरे प्रदेश में अकेली लड़की होती थी | उस दौर के खेल मैदान के लैंगिक अनुभवों को मैने इस वर्ष प्रकाशित अपने तीसरे उपन्यास ‘गेम इन गेम’ में क्या उतारा कि मानो सारा मीडिया मुझ पर टूट पड़ा, जबकि खेलों के शासक-प्रशासक और प्रबंधकार चुप्पी साधे रहे | अब मुझसे प्रायः पूछा जाने लगा है कि क्या इस उपन्यास में वर्णित महिला खिलाडियों का लैंगिक और यौनिक शोषण मेरे अपने साथ ही हुयी आपबीती है | सोचती हूँ क्या लोगों को वाकई वह दिखायी-सुनायी नहीं जो उनके आस-पास घट रहा है या वे देखना-सुनना नहीं चाहते ? खेलों की दुनिया में जेंडर बजटिंग का पूर्ण अभाव भी उनकी आँखों पर बंधी पट्टी और कानों में ठुंसी रूई को तार्किकता दे रहा होगा |

दरअसल, इतना कम बदलाव आया है कि मुझे अपना यह उपन्यास आज के समय की खिलाडियों को ही समर्पित करना चाहिए था –

मध्य प्रदेश से एथलीट सीता साहू को जो जीवन यापन के लिए गोलगप्पे बेचती है; बिहार से कबड्डी खिलाड़ी शांति देवी जो सब्जी बेच कर गुजरा कर रही है; नौरी मुंडू जिसे हॉकी खेलना छोडकर झारखंड में पांच हजार महीने पर शिक्षक बनना पड़ा; झारखंड से ही तीरंदाज निशा रानी दत्त जिसे अपने मिट्टी के घर की मरम्मत कराने के लिए तीर-धनुष बेच कर बेरोजगारों की कतार में लगना पड़ा; दोहा के  एशियाई खेल में रजत पदक विजेता तमिलनाडु की एथलीट एस सांथी जो अब ईंट के भट्टे पर काम कर रही है; ओडिशा से एथलीट रश्मिता पत्रा जो सुपारी बेच कर गुजारा कर रही है; धावक आशा रॉय जिसे दो जून रोटी के लाले पड़े हैं; उत्तर प्रदेश की मीनाक्षी रानी जिसे अपने दो बच्चों के साथ आत्महत्या करने की धमकी देनी पड़ी जब सरकारी वादे के मुताबिक उसे नौकरी नहीं दी गयी; हरियाणा से मुक्केबाज रिशु मित्तल जो स्कूल फीस देने के लिए घरेलू नौकरानी का काम कर रही है; आदि आदि आदि |

2016 ओलिंपिक वर्ष भी रहा है | आश्चर्य, भारत को सिन्धु, साक्षी और कर्मकार के रूप में जेंडर चैंपियन तो मिल गए, रियो में अन्य महिला भागीदारों की आँखों में तैरते सफलता के सपनों की कशिश भी देश ने शिद्दत से महसूस की, हालांकि तब भी जेंडर बजट का मुद्दा हमारी चर्चा से नदारद है | बेशक, ओलिंपिक बाद के तमाम विश्लेषणों के केंद्र में खिलाडियों की तैयारी पर होने वाला खर्च का आंकड़ा जरूर उद्धृत हो रहा है | ओलिंपिक के दौरान ही पटियाला में राष्ट्रीय स्तर की हैंडबॉल की एक लडकी ने प्रधानमन्त्री मोदी को पत्र लिखकर इसलिए आत्महत्या कर ली कि उसे कॉलेज के क्षात्रावास में रहने की जगह नहीं दी गयी जबकि उसके पिता घर से रोज उसके आने-जाने का लगभग तीन हजार महीने का खर्च उठाने में असमर्थ थे | पिछले दिनों महाराष्ट्र के एक गाँव में पंद्रह वर्षीय कबड्डी खिलाड़ी की अभ्यास से लौटते हुए स्थानीय लम्पटों ने सामुहिक बलात्कार के बाद हत्या कर दी | क्या शौच स्थलों के बाद क्रीड़ा स्थल भी गावों में यौन अपराधों के अड्डे बनते जा रहे हैं ? गत वर्ष केरल के साई हॉस्टल में रहने वाली ग्रामीण पृष्ठभूमि की तीन व्यथित तैराक लड़कियों ने आत्महत्या कर ली थी | उनसे दुर्व्यवहार के आरोपों की पृष्ठभूमि में साई ने एक आतंरिक जाँच बिठायी जिसकी प्रगति को आज तक बाहर साझा नहीं किया गया | ऐसे सैकड़ों-हजारों दृष्टांत हैं जो खेलों में जेंडर बजट के मोहताज हैं |

इस माहौल में, रियो ओलिंपिक में महज लड़कियों के ही खाते में दो पदक आने से आम भारतीय बेहद भावुक हो उठा है | वह इस तर्क का कायल लगता है कि एक मध्यवर्गीय खेल परिवार की बेटी (पीवी सिन्धु), एक किसान पृष्ठभूमि की बेटी (साक्षी मालिक) और एक श्रमिक की बेटी (दीपा कर्मकार) के ओलिंपिक में क्रमशः रजत पदक, कांस्य पदक और चौथे स्थान की कीमत भारत जैसे देश के लिए कई-कई स्वर्ण पदकों जितनी होनी चाहिए ! आखिर भारत वह देश है जहां एक ओर आम किसान-श्रमिक का जीवन कर्ज और शोषण से भरा रहता है और दूसरी ओर पूंजीशाहों को देश के लाखों करोड़ हड़पने दिए जाते हैं, जहाँ सामान्य नागरिक के बच्चे ट्रेनों-बसों में भेड़-बकरियों की तरह ठुंस कर प्रतियोगिता / अभ्यास के लिए निकलते होते हैं और सरकार की ऐय्याश प्राथमिकता में लाख करोड़ की बुलेट ट्रेन समायी होती है, जहाँ भ्रष्ट नौकरशाह व मंत्री, सूट-बूट ख्याति वाले प्रधानमन्त्री और कानून को ठेंगे पर रखने वाले फ़िल्मी सितारे के सान्निध्य में खिलाडियों पर मार्गदर्शक सवारी गांठते मिलते हैं जबकि साक्षी मालिक के गाँव मोखरा खास (रोहतक, हरियाणा) में लिंग अनुपात है 1000 पुरुष के पीछे 800 स्त्री का !

नीतिकारों-योजनाकारों और शासकों-प्रशासकों का समूह ही खेल की दुनिया में भी महिलाओं को जेंडर बजटिंग से वंचित रखे हुए है | तमाम सभ्य संसार में महिलाओं को समान अवसर व सामाजिक सुरक्षा देने और यौनिक हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा-हर्जाना-परामर्श कवच के रूप में जेंडर बजटिंग की अवधारणा एक सफल रणनीति की तरह इस्तेमाल हो रही है | क्या हमारे पास धन की कमी है ? लैंगिक क्रम में बने ‘निर्भया फण्ड’ में गत तीन वर्षों में तीन हजार करोड़ रूपये जमा हो चुके हैं पर जुमलेबाजी से सरकारों को इतनी भी फुर्सत नहीं कि इस मद से एक पैसा भी खर्च कर सकें | अन्यथा, देश की बेटियों ने शायद मेडल की बाढ़ लाने की जिद बेहतर निभायी होती ! छोटे-छोटे शहरों और दूर-दराज के गावों से लड़कियाँ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं को जीतने के सपने ले रही हैं | साक्षी मालिक ने रियो में मेडल जीतने पर कहा कि पहलवान बनने का निर्णय उसका अपना निर्णय था और ओलिंपिक का सपना उसने बारह वर्ष जिया | दरअसल भारतीय स्त्रियों ने शिक्षा के मोर्चे पर डटने के बाद खेल के मैदान को लैंगिक जुए को उतार फेंकने की अपनी जद्दोजेहद में महत्वपूर्ण पड़ाव बना लिया है |

महिला विकास मंत्रालय देखने वाली मंत्री मेनका गांधी ने माना कि सिन्धु, साक्षी और दीपा, तीनों लड़कियों ने अपने दम पर ओलिंपिक सफलताएं हासिल की हैं और इसका विशेष तौर पर संज्ञान लेना चाहिए | काश मंत्री को यह जानने की फुर्सत भी होती कि निर्भया काण्ड के साढ़े तीन वर्ष बाद भी उनका मंत्रालय एक भी रेप क्राइसिस सेंटर क्यों नहीं स्थापित कर सका है | सरकार ने तब वर्मा कमीशन की सिफारिश पर देश भर में सिंगल पॉइंट रेप क्राइसिस सेंटर बनाने का फैसला लिया था | भावना यह थी कि बलात्कार पीड़ित को जगह-जगह धक्के न खाने पड़ें और उसे तुरंत एक ही स्थान पर मेडिकल उपचार, कानूनी सहायता, मनोवैज्ञानिक परामर्श, आर्थिक सहयोग, सामाजिक सशक्तीकरण जैसी तमाम सुविधाएँ दी जा सकें | होना तो यह चाहिए था कि पीड़ित का घर ही स्वतः रेप क्राइसिस सेंटर में बदल दिया जाता जहाँ पहुँच कर डॉक्टर, पुलिस, मैजिस्ट्रेट, जज, मनोचिकित्सक, परामर्शदाता, आर्थिक-सामाजिक प्रदाता अपना-अपना योगदान पहुंचाने के जिम्मेदार होते | लेकिन इतना सुगम कदम उठाना देश के शासन-प्रशासन के बस में कहां ?

सरकारी-सामाजिक नजरिये के बावजूद, रियो में भारतीय लड़कियों की रिकॉर्ड तोड़ भागीदारी, उनके समाज की मुख्यधारा में बढ़ती दस्तक का जीवंत सूचक भी है | इनमें सानिया मिर्जा और साइन नेहवाल जैसे ग्लैमर भरे विश्व चैंपियन नामों के साथ तीरंदाजी, कुश्ती, हाकी जैसे पारंपरिक पुरुष खेलों की महिला भागीदार भी शामिल हैं | दरअसल, ग्रामीण अंचलों, कस्बों और दूर-दराज के शहरों में आज अभिभावक अपनी बेटियों के लिए खेल की दुनिया में निहित अवसरों को पहचानने लगे हैं | लड़कियां भी खेल के मैदान को पारंपरिक लैंगिक जुए से वक्ती मुक्ति की प्रणाली के रूप में देखने लगी हैं | लैंगिक पूर्वग्रह से भरे समाज में उन्होंने इसकी कीमत भी चुकायी होती है | खेलों में जेंडर बजट की अवधारणा के अभाव में, बहुतों ने कुछ ज्यादा ही !

लड़कियों को समाज की मुख्यधारा में लाने में खेलों की चौतरफा भूमिका को देखते हुए खेल मैदानों को उनके लिए सुरक्षित व संतुलित करना पूर्व-शर्त की तरह होना चाहिए | निःसंदेह, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों महिला खिलाड़ियों का निरंतर उदय उन्हें उपलब्ध हो रही आधुनिक खेल सुविधाओं और खर्चीले प्रशिक्षण कार्यक्रमों की देन कहा जा सकता है | इस वर्ष का केंद्र सरकार का खेल बजट लगभग नौ सौ करोड़ है जबकि गत वर्ष लगभग साढ़े छह सौ करोड़ रहा था | खेल संघों को भी एक सौ पचासी करोड़ की सहायता राशि दी जा रही है | यहाँ तक कि एंटी डोपिंग मद में बारह करोड़ और प्रतिभा तलाश पर पांच करोड़ का प्रावधान किया गया है | तो भी खेल की दुनिया में भी एक जेंडर निरपेक्ष बजट ही बनता है | खेलों में यदि जेंडर सापेक्ष बजट की अवधारणा लागू की जाती तो महिला खिलाड़ियों की शारीरिक क्षमता और खेलगत कौशल के साथ-साथ निश्चित ही उनकी सामाजिक सुरक्षा व भावनात्मक स्थिरता और उनके लिए जरूरी मनोवैज्ञानिक परामर्श व यौनिक हिंसा से बचने के उपायों को भी खेल पर खर्च का अभिन्न हिस्सा बनाया जा रहा होता | जेंडर बजट होने का मतलब होता इस कार्यान्वयन के लिए वांछित वित्त की नियोजित व्यवस्था और खर्च जवाबदेही की समुचित लेखा प्रणाली |

महिला सशक्तीकरण की दिशा में तरह-तरह के कितने भी कदम, जेंडर बजट न होने की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकते | इसे हम इजराइल के उदाहरण से समझ सकते हैं, जहाँ स्त्रियाँ जीवन के हर क्षेत्र में, यहाँ तक कि सेना की कॉम्बैट भूमिका में भी, जमाने से लैंगिक बराबरी की मिसाल के रूप में देखी जाती हैं | सवाल है कि  अपनी तमाम जीवटता के बावजूद वे भी खेलों में फिसड्डी क्यों हैं ? इजराइल में टीम खेल सुविधाओं का इस्तेमाल करने वालों में सरसठ फीसद पुरुष और तैतीस फीसद महिलायें हैं | इन सुविधाओं की देख-रेख विभिन्न रीजनल कौंसिल के हाथ में है | मासे अशर रीजनल कौंसिल ने 2014-15 के खेल बजट की विशेष जेंडर ऑडिटिंग कराई जो यह मुख्यतया दो बिन्दुओं पर केन्द्रित रही – स्त्रियों और पुरुषों की अलग खेल जरूरतों को चिन्हित करना और उन्हें पूरा करने में राजनीतिक निर्णयों, जन सेवाओं और बजट आबंटन की भूमिका का विश्लेषण | इस कवायद के निष्कर्ष बहुत कुछ भारतीय सामाजिक-लैंगिक स्थितियों पर भी खरे उतरते लगते हैं |

उन्होंने पाया कि पेशेवर खेलों की भागीदारी में तो पुरुष और लड़के छाये हुए हैं ही, बल्कि समय व अवसर आबंटन में भी महिलाओं और लड़कियों की अपेक्षा उन्हीं की सुविधा व जरूरत को तरजीह मिलती है | जहां प्रारम्भिक स्कूलों में छब्बीस फीसद लड़कियां खेलों में भागीदारी कर रही थीं वहीं माध्यमिक / हाई स्कूलों तक आते-आते यह संख्या ग्यारह फीसद रह गयी | प्रतियोगी खेलों से इतर, मनोरंजन के लिए पूर्ण वयस्कों की श्रेणी में तिरानवे फीसद महिलायें खेलों में भाग लेती मिलीं, मुख्यतया थ्रो बॉल में | ऑडिट ने पाया कि तैंतीस प्रतिशत महिला प्रतियोगी होने के बावजूद खेल बजट का इक्कीस प्रतिशत ही उन पर खर्च किया जा रहा था | जहाँ स्त्रियों में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल – जिम्नास्टिक – को पूरी तरह भागीदारों के फंड से ही चलाया जा रहा था वहीं पुरुषों में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल – वॉलीबॉल – को व्यापक पब्लिक फंडिंग मिल रही थी | पाया गया कि कुल पब्लिक फंडिंग का सत्तर फीसद पुरुष और तीस फीसद महिला खेलों पर खर्च हो रहा था | यहाँ तक कि महिलाओं के लिए वॉलीबॉल कोर्ट की मांग कौंसिल ने अनसुनी कर दी | एक वर्ष में मासे अशर कौंसिल ने तेईस प्रतियोगिताओं में अपनी टीम भेजी जिनमें बारह पुरुषों की, पांच स्त्रियों की और शेष छह मिली जुली थीं | कौंसिल की केवल पचीस फीसद कोच ही महिलायें थीं |

ऑडिट का मुख्य निष्कर्ष रहा कि जेंडर बजटिंग को लेकर मासे अशर कौंसिल की न कोई नीति थी और न योजना | लिहाजा तमाम खेल संसाधनों का इस्तेमाल पुरुषों के लिए होता आ रहा था | ऑडिट ने स्त्रियों को बढ़ावा देने के लिए एक स्टीयरिंग समिति और एक मास्टर प्लान की सिफारिश की, ताकि लैंगिक नजरिये से खेल सुविधाओं के बजट / समय / अवसर का पुनर्गठन हो और यातायात को चाक-चौबंद किया जाय | प्रतियोगी खेलों में लड़कियों की कम संख्या को देखते हुए उन्हें जागरूक करने के अभियान लिए जाएं | क्या ये सारे कदम भारत के सन्दर्भ में भी अभीष्ट नहीं ? बस इनमे यौनिक हिंसा को और जोड़ना होगा |

भारत में कितनी लड़कियों ने अपनी माओं को खेलते हुए देखा होगा ? मासे अशर कौंसिल ऑडिट की एक सिफारिश यह भी थी कि खेल के माध्यम से फिट रहने वाली माएं अपनी बेटियों-बेटों के लिए रोल मॉडल हो जाती हैं | ओलिंपिक मेडल में सारे देश की अपार दिलचस्पी ने महिलाओं / लड़कियों की खेल में भागीदारी को लैंगिक समानता के स्वीकार्य आयाम के रूप में स्थापित कर दिया है | सुखद है कि न कहीं से कपड़ों का रोना रोया गया और न कोई असुरक्षा का राग अलापता मिला | इस समय को नीतिकारों और योजनाकारों के लिए जेंडर बजट पर केन्द्रित होने और जेंडर चैंपियनों की बड़ी फौज खड़ी करने का सही समय भी कहा जा सकता है |

मेरे उपन्यास ‘गेम इन गेम’ की फुटबाल की खिलाड़ी नायिका जीवन और खेल प्रपंच की जद्दोजेहद में हार कर भी एक सच्ची जेंडर चैंपियन ही थी | आज की जेंडर चैंपियन खिलाड़ी को तो हर हाल में जीतना ही है !

लेखिका परिचय

सोना चौधरी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं साहित्य और खेल जगत में रूचि रखने वाले इनके नाम से भली भांति परिचित हैं। राष्ट्रीय स्तर की फुटबाल खिलाड़ी रही हैं। हरियाणा के रोहतक में इनका जन्म हुआ है। ‘पायदान’, ‘वि चित्र’ की सफलता के बाद साहित्य उपक्रम से ही प्रकाशित होने वाला उपन्यास ‘गेम इन गेम’ भी काफी चर्चित हुआ है।

(नोट: आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। जिन्हें ज्यों का त्यों यहां प्रस्तुत किया गया है। आलेख में व्यक्त किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति हरियाणा खास उत्तरदायी नहीं है)

खेल में उत्पीड़न और जेंडर बजट Reviewed by on . -सोना चौधरी जब मैने नब्बे के दशक में फुटबाल खेलना शुरू किया था तो वर्षों तक नियमित रूप से इस ‘मर्दाने’ खेल को खेलने वाली मैं पूरे प्रदेश में अकेली लड़की होती थी -सोना चौधरी जब मैने नब्बे के दशक में फुटबाल खेलना शुरू किया था तो वर्षों तक नियमित रूप से इस ‘मर्दाने’ खेल को खेलने वाली मैं पूरे प्रदेश में अकेली लड़की होती थी Rating: 0

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