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हरियाली तीज – ल्यो तीज के रंग लोकगीतों के संग

25 जुलाई नै तीज बोवैगी त्यौहारां का बीज

July 25, 2017 10:21 am by: Category: तीज तयोहार, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

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नींबा कै निंबोळी लागी सामणियां कद आवैगा जिस सामण का इंतजार पूरे साल भर रहता है वह जाने को है लेकिन त्यौहारों का सिलसिला तो अभी शुरु हुआ है। जी हां त्यौहारों का आगाज़ सावन के इस पावन महीने में ही होता है। और इस की शुरुआत होती तीज से वैसे कहते भी हैं कि आई तीज बो गई बीज यानि साल भर रहने वाले त्यौहारों का बीजारोपण तीज के दिन ही होता है और यह सिलसिला फिर होली तक निरंतर चलता रहता है होली के बाद फिर त्यौहारों का सिलसिला थोड़ा धीमा हो जाता है। 2017 में तीज का यह त्यौहार 25 जुलाई को मनाया जायेगा।

तीज का त्यौहार लोक गीतों की बौछार

तीज के त्यौहार पर कौथली और सिंधारा ये ऐसे रिवाज़ हैं जिनका हर किसी को बेसब्री से इंतजार रहता है। हरियाणवी संस्कृति और रीति रिवाज़ों से अनभिज्ञों के लिये बता दें कि कौथली एक ऐसा रिवाज़ है जिसमें विहाहित कन्याओं को उनकी ससुराल में मायके वालों की तरफ से सावन के फल, सावन की मिठाइयां एवं वस्त्रादि उपहार स्वरुप भेंट किये जाते हैं। जब लड़की नवविहिता होती है तो पहली बार यह उपहार लड़की की ससुराल की ओर से उसके मायके में दिया जाता है इसे सिंधारा कहा जाता है। सावन के महीने में तो यह किसी से भी आप पूछेंगे की और क्या चल रहा है तो उससे यह जवाब अपेक्षित हो सकता है कि हरियाणा में तो आजकल कौथली चल रही है। पढ़िये हरियाणा के हिसार में तीज के अवसर पर गाये जाने वाले इस लोकगीत को

मीठी तो करदे मां कौथली

जाऊंगा बेबे ग देस सावण आया गूंजता

मेरी तो बेबे मौसी घाल दयो

म्हारै सावण गी तीज सावण आया गूंजता

तेरी तो बेबे घाल्या ना सरै

म्हारै है खोदी गो जोर सावण आया गूंजता

कसिया तो फेंकू रै बीरा झाड़ म

चालूंगी आपणल देस सावण आया गूंजता

जौ ए चीणा गो उरै खाणा है

भारी है चाकी का पाट सावण आया गूंजता

सावन के इस महीने में को धार्मिक रुप से भी बहुत महत्व दिया जाता है देखिये इसकी पुष्टि लोकगीतों के जरिये भी होती है। रेवाड़ी जिले में सावन के अवसर पर महिलाएं कभी आंगनों में इस गीत को गाती थीं हालांकि आजकल आंगनों से इस तरह के गीत सुनाई देने बंद हो गये हैं। शायद अब आंगनों में महिलाओं का बैठना भी कम हो गया है। लेकिन आप पढ़िये इस गीत को

महीनो आयो सावण को मैं तो तीरथ करके आई

गर्व करयो बेटा को मुनै मुख से ना बोलै एक

गर्व करयो बहुआं को मनै अबला बोलै बोल

काया तो मेरी न्यू बळगी जणु बळै कढाई मैं तेल

हवा तो मेरी न्यू उड़गी जणु उड़ै बणी मैं मोर

महीनो आयो सावण को मैं तो तीरथ करके आई

गर्व करयो बूड्ढा को ए वो भी मुख स ना बोलै एक

काया तो मेरी न्यू बळगी जणु बळै कढाई मैं तेल

हवा तो मेरी न्यू उड़गी जणु उड़ै बणी मैं मोर

महीनो आयो सावण को मैं तो तीरथ करके आई

अब इस सावन के महीने में नई नवेली दुल्हनों को होता है कि वे इस अवसर पर अपने पीहर जायें अपनी सहेलियों के साथ झूलने के लिये जायें हालांकि आज सार्वजनिक रुप से झूलने के स्थान बहुत कम हो गये हैं। बाग, बणि तो गांवों में बहुत कम बचे हैं ऐसे झूलों के लिये डाल कहां से मिलेंगी। लेकिन सास और बहु का यह जीवंत संवाद तो पढ़ ही सकते हैं-

सासड़ सावण री तीज हे सावण री तीज

हे हींदो घला दयो जी चम्पा बाग म्हं

कुम री बहुअड़ आयो लणिहार आयो लणिहार

कैंकी खंदाई जी जाओ बाप क

छोटो सो बीरो आयो लणिहार आयो लणिहार

थारी खंदाई जी जांगा बाप क

बागां म्हं री सासड़ हींदो घला हे हींदो घला

हे हम तो झूलांगा हे सखियो का साथ म्हं

हिंदा पर झूले सारी सखियां साथ

म्हारो तो बीरो जी आयो लीण न

पंचकुला में भी सावन के महीने में महिलाएं इस गीत को गाती हैं

सरली सी सिंबळ पींगा पाइयां मैं भी झूठण जाणा

क सुण ले मैं भी झूठण जाणा

झूठदी झठांदी नायड़ जो रलया बीर तेरे दे बधाइयां

क सुण ले बीर तेरे दे बधाइयां

उठो नी कहारो पीड़ो मेरा डोला मुड़ के घरां नूं जाणा

क सुण ले मुड़ के घरां नू जाणा

उठी पाभो खोली फळसा नणद परौणी आई

क सुण ले नणद परौणी आई

जद तूं ब्याही मैं मकलाई मैं भी मुड़ के नी आई

क सुण ले मैं भी नी मुड़ के आई

हाथ कसीदा गोद भतीजा क्यूकर खोलूं मैं फळसा

क सुण ले क्यूकर खोलूं मैं फळसा

कतणी मैं रखदे कसीदा मेरी पाभो पीढ़ले पादे भतीजा

क पीढले प पा दे भतीजा

जद की ब्याही नणद ना देखी नणद कहां तै आई

क सुण ले नणद कहां तै आई

अगे गई नूं सास पूछदी कि कुछ पीहर ते ल्याई

क सुण ले कि कुछ पीहर ते ल्याई

बीरा तो मेरा चम्बे चौके पाभो चंद्रे घर दी

क सुण ले पाभो चंद्रे घर दी

अगे गयी नूं जिठाणिया जो पूछदी कि कुछ पीहर ते ल्याई

क सुण ले कि कुछ पीहर ते ल्याई

बीरा तो मेरा चंबे चौके पाभो न लड़की जाई

क सुण ले पाभो न लकड़ी जाई

एक और गीत जो इस प्रकार है-

धड़नी दे बूंटे बापू पींगा जे पाइयां

सात सहेली बापू झूठण गइयां

तं नहीं हो जाणा बेटी सोहरे नूं जाणा

धड़नी दे बूंटे बीरा पींगा जे पाइयां

सात सहेली बीरा झूठण गइयां

तं नहीं जाणा बहणा सोहरे नूं जाणा

अंबाला में सावन के गीत

आयो तो री ओ सासड़ सामण मास

बेड़ा बंटा दे पीळे पाट का

म्हारा तो ए बहुअड़ कोए मोसर ना हो

झूलण जा अपणे बाप का

म्हारा तो ए बहुअड़ कोए मोसर ना हो

झूलण जा अपणे बाप का

म्हारै तो ए सासड़ न्याणे न्याणे बीर

बंटणा नी ओंदा सण की जेवड़ियां

थारे तो ए सासड़ काटड़े से पूत

बांट दय सण की जेवड़ियां

वहीं कैथल में महिलाओं के भाव कुछ इस तरह उभर कर आते हैं

सैंडल तो ल्याई जाळीदार इन सैंडलां नै कद पहरैगी

छुट्टी के रह रे दिन चार तूं भीतर बड़ बड़ रोवैगी

कोन्या ओ रोऊं भरतार मैं अपणे पीहर जिगर ज्यांगी

पीहर मैं भाभो बदमास तेरे धर धर ताने मारैगी

कोन्या ओ मारै भरतार मेरी मां छाती कै ला लेगी

छोरियां के आवैं भरतार तू भीतर बड़ बड़ रोवैगी

कोन्या ओ रोऊं भरतार मैं चिट्ठी गेड़ बलाल्यूंगी

कोन्या र आवै म्हारी नार चिट्ठी न पाड़ बगा द्यांगा

तीजां का बड़ा हो त्यौहार छोरियां म्हैं झूलण जाऊंगी

सिखरी तै छोड़ूं दोनूं हाथ तीजां नै रांडा कर द्यूंगी

ऐसी ना सोचिये म्हारी नार छुट्टी प छुट्टी आवांगे

जब सारी सखियां झूलने के लिये गाते हुए चलती हैं तो वे कुछ यूं कहती, चहकती, गाती, गुनगुनाती हुई चलती हैं।

हे सखी झूलण चालो घल रही झूल चमन म्हं

सारी छोरी कट्ठी हो के गीत रसीले गावण लागी

लांबे लांबे झोटे दे के पां डाळियां कै लावण लागी

सासू जी का नैक तोड़ कै पीती तोड़ बगावण लागी

किसे नै आवै अलाचारी किसे नै गिरणी आवण लागी

पींग पर तै उतर के नै चारूं तरफ लखावण लागी

पाच्छा फेर कै देखण लागी फौजी छुट्टी आ रहया है

अपणे पति की शान देख कै खुशी मना रही दिल मैं

हे सखी झूलण चालो घल रही झूल चमन मै

आपको भी सावन के इस महीने झूलने के अवसर मिलें तीज के त्यौहार की हरियाणा खास की ओर से हार्दिक बधाई।

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(संपादकीय कथन – तमाम गीत लोकगीतों का बुगचा नामक किताब से साभार लिये गये हैं जिनके संकलन और संपादन का यह महत्वपूर्ण कार्य डॉ. निर्मल ने किया है। वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस बहुमूल्य गीतों के संकलन को आप भी मंगवा सकते हैं। पुस्तक का संकलन और संपादन करने वाली लेखिका निर्मल ने हाल ही में हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में आलोचना विषय पर अपना शोधकार्य पूरा किया है, निर्मल 5 अगस्त को 1987 को सिरसा जिले के गांव डिंग-मंडी में एक कृषक परिवार में पैदा हुई। वे पिछले 6-7 सालों से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। विश्वविद्यालय में छात्र संघ की महासचिव भी रही हैं। लेखिका को हरियाणा खास की ओर से जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं)

प्रस्तुति – जगदीप सिंह

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