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क्यों रहा है हरियाणवी समाज मूर्ति-पूजा का विरोधी

September 25, 2016 3:25 pm by: Category: खबर खास 1 Comment A+ / A-

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हरियाणा की माटी में एक खासियत तो यह है कि इसमें व्यंग्य की धार बहुत तेज है। इससे इंसान तो क्या भगवान भी नहीं बचे हैं। उदाहरण के तौर पर गूगा नवमी के देवता जाहर वीर गोगा को ही लीजिये हरियाणा वाले नाहक सिर पर आ बैठे व्यक्ति को गूगा की पदवी दे डालते हैं। ऐसे ही आजकल श्राद्ध चल रहे हैं पितरों को खूब मनाया जा रहा है लेकिन हरियाणा वाले जानते हैं पितर कौन होते हैं। एक अन्य उदाहरण और कि श्राद्ध पक्ष के समाप्त होते ही नवरात्र शुरु होंगें ऐसे में हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले माता की पूजा करेंगें जिसे हरियाणा में धोक लगाना भी बोलते हैं यानि माता की धोक लगाएंगें। लेकिन ‘मार ले धोक’, धोक मारैगा, ‘धूकगी माता’ आदि बहुत सारे मुहावरे भी प्रचलित हैं जो गाहे-बगाहे इस्तेमाल में लाये जाते हैं। क्या कारण हो सकता है आखिर कि हरियाणा में इन देवी देवताओं को भी हंसी मजाक का पात्र बना लिया जाता है।

दरअसल हरियाणा में मूर्ति पूजा को लेकर कोई खास उत्साह नहीं रहा है हालांकि पिछले कुछ सालों में यह प्रवृति बढ़ी है और बहुत सारे देवी-देवताओं की पूजा होने लगी है लेकिन आरंभ में शिवजी, हनुमान ये दो ही मुख्य देवता रहे हैं जो व्यापक तौर पूजे जाते रहे हैं।

हरियाणवी समाज के मूर्ति-पूजा विरोधी होने का कोई एक कारण नही है बल्कि कई सामाजिक आंदोलनों के प्रभाव से हरियाणवी समाज बाह्यांडबरों से दूर रहा है।

 आर्य समाज का प्रभाव

इसका एक कारण तो आर्य समाज भी रहा है। आर्य समाज के मूर्ति-पूजा के विरोध की मुहिम का जितना असर हरियाणा में हुआ है उतना शायद ही और जगह रहा हो। आर्य समाज की भजन मंडलियां गांव गांव जाकर प्रचार किया करती जिसका हरियाणा के जन मानस पर काफी प्रभाव पड़ा।

 

भक्ति आंदोलन का प्रभाव

भक्ति आंदोलन के संतो के संदेश भी हरियाणा में खूब फैले, खासकर कबीर, रविदास, गुरु गोरखनाथ, हरिदास आदि संतों का काफी प्रभाव यहां रहा है इसका एक उदाहरण आज भी हम इन धाराओं से जुड़े संत संप्रदायों की उपस्थिति और उनके साथ व्यापक जनसमूह का होना है। हालांकि भक्ति आंदोलन के जन जागरण की वो मुहिम आज के संत संप्रदायों में नजर नहीं आती बल्कि एक नई तरह की सगुणवादी निर्गुण परंपरा को इन्होंने इजाद किया है। लेकिन मूर्ति-पूजा विरोधी प्रवृति को विकसित करने में भक्ति आंदोलन के संतो ने काफी अहम भूमिका निभाई है।

 

सहज जीवन चर्या और विनोदी स्वभाव

उपरोक्त आंदोलनों के अलावा हरियाणवी समाज की एक अंतर्निहित प्रवृति भी है जिससे इन आंदोलनों को भी समाज ने ग्राह्य किया वह है सहज जीवन चर्या और उसकी विनोदी प्रवृति। किसी भी चीज को बहुत सहज और सरल बनाने में हरियाणवी माहिर हैं। उदाहरण के तौर पर शिवजी-पार्वती पर बहुत सारे चुटकुले बने हैं जिनमें शिवजी हमेशा पार्वती को समझाते रहते हैं कि किसान से पंगा न लें। भूत-प्रेतों को भी किसान छकाते रहे हैं। बहुत सारे चुटकुले भूत-भूतणी और किसान पर भी हैं। इसी तरह जिन देवी-देवताओं का सृजन लोगों को तरह-तरह के भय दिखाकर उनकी पूजा की और प्रेरित करने के प्रयास हुए हैं उसी तरह हरियाणवी समाज ने इन देवी-देवताओं को बहुत दूर की चीज न मानकर अपने बहुत करीब समझा, हमेशा आस-पास रहने वाला, देखभाल करने वाला समझा, इसीलिये वह उसके लिये कोई ओपरी चीज नहीं हैं बल्कि उसके अपने हैं जिनसे जब चाहे आशीर्वाद ले सकता है और जब चाहे उन्हें शिकायत भी कर सकता है और हानि होने पर उन्हें कोस भी सकता है।

खैर आपके दिमाग में कुछ और हो तो कमेंट बॉक्स में प्रतिक्रिया जरुर दें। फिलहाल जिसने भी अपने पितरों का श्राद्ध अभी तक नहीं किया है वे अमावस्या के दिन यानि 30 सितंबर को श्राद्ध व तर्पण आदि कर सकते हैं और उसके तुरंत बाद एक अक्तूबर से माता धुकणी शुरु हो जायेगी।

क्यों रहा है हरियाणवी समाज मूर्ति-पूजा का विरोधी Reviewed by on .     हरियाणा की माटी में एक खासियत तो यह है कि इसमें व्यंग्य की धार बहुत तेज है। इससे इंसान तो क्या भगवान भी नहीं बचे हैं। उदाहरण के तौर पर गूगा नवमी के देव     हरियाणा की माटी में एक खासियत तो यह है कि इसमें व्यंग्य की धार बहुत तेज है। इससे इंसान तो क्या भगवान भी नहीं बचे हैं। उदाहरण के तौर पर गूगा नवमी के देव Rating: 0

Comments (1)

  • Amit Bisla

    बहुत बढ़िया

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