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निज भाषा उन्नति अहै

September 14, 2016 3:04 pm by: Category: खबर खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।

सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चन्द्र का ये दोहा हिंदी कार्यक्रमों, सेमिनारों भाषा से जुड़े विशेष दिनों या भाषा के संबंध में होने वाली बातों में अक्सर प्रयोग किया जाता रहा है। इस दोहे का अर्थ है अपनी भाषा से ही उन्नति सम्भव है, क्योंकि सारी उन्नतियों का मूल आधार यही है। मातृभाषा के ज्ञान के बगैर दिल की पीड़ाओं का निवारण सम्भव नहीं है। विभिन्न प्रकार की कलाएँ, असीमित शिक्षा और अनेक प्रकार का ज्ञान, सभी देशों से भले ही ले लें, मगर उनका प्रचार मातृभाषा में ही करना चाहिये। ये दोहा भारत देश की अपनी राजभाषा हिंदी पर भी हू-ब-हू लागू होता है।

शब्द और भाषा परिचय  

आपको बता दें कि हमारे देश की राजभाषा हिंदी है। हिंदी भारत की राजभाषा होने के साथ-साथ दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। इतना ही नहीं हिंदी भाषा अपने आपमें एक समर्थ भाषा भी है। यूं तो संस्कृत और हिंदी दोनों आदिकाल में साथ-साथ चलने वाली भाषाएं रही हैं, कभी-कभी इनका स्वरूप एक हो जाता तो कभी ये अलग-अलग नजर आती। काफी समय के बाद हिंदी समाज के सम्प्रेषणिय ढांचे में उतर आईं तो संस्कृत वेदों-पुराणों और पाठ्यक्रमों की भाषा बनकर रह गई। यूं तो हिंदी शब्द का ताल्लुक संस्कृत के सिंधु मान लिया जाता है, मगर इसे लेकर विद्वानों के मत अलग-अलग भी हो सकते हैं। अमूमन ‘सिन्धु’ शब्द सिन्ध नदी के लिए लिया जाता था जिसके आधार पर उसके आसपास के क्षेत्र को सिंधु कहा जाने लगा। बताया जाता है कि ये शब्द ईरानी में जाकर सिंधु से ‘हिन्दू’, हिन्दी और बाद में ‘हिन्द’ हो गया। ईरानी धीरे-धीरे भारत के अलग-अलग भागों में फैलते गए तो साथ-साथ इस शब्द का भी विस्तार होता गया। इसी में ईरानी का ईक प्रत्यय लगने से ‘हिन्दीक’ बना जिसका अर्थ होता है ‘हिन्द का’। यूनानी भाषा का शब्द ‘इन्दिका’ या अंग्रेजी भाषा का शब्द ‘इण्डिया’ आदि इसी शब्द से विकसित माने जाते हैं। हिन्दी भाषा के लिए इस शब्द का प्राचीनतम प्रयोग शरफुद्दीन यज्+दी’ के ‘जफरनामा’(1424) में मिलता है।

राजभाषा हिंदी और हिंदी दिवस

हिंदी को विश्व में चीनी के बाद दूसरे स्थान पर सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा कहा जाता है। भारत में बोलने के लिए सामान्यतः हिंदी ही प्रयोग की जाती है। गांव-देहात में रहने वाले जो अक्सर बातचीत में बोलियों माध्यम रखते हैं; बहुत कम जानते होंगे कि हमारी राजाभाषा भी है और वैधानिक तौर पर उसे राजभाषा होने का दर्जा मिला हुआ है। दरअसल आजादी के बाद ये निर्णय लिया गया कि हिंदी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी। ये दिन 1949 का 14 सितंबर था। इसके बाद हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाने लगा।

जब इस प्रस्ताव को मंजूरी मिली तो संविधान सभा में भाषा पर हाने वाली बहस लगभग 278 पृष्ठों में मुद्रित हुई। जिसमें डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और श्री गोपाल स्वामी आयंगार की अहम भूमिका मानी जाती है। बहस के बाद यह सहमति बनी कि संघ की भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी, किंतु देवनागरी में लिखे जाने वाले अंकों और अंग्रेज़ी को 15 साल या इससे ज्यादा अवधि तक प्रयोग करने के लिए तीखी बहस भी हुई। स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के सवाल पर काफी विमर्श के बाद जो निर्णय हुआ वो भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343 (1) में इस प्रकार प्रयुक्त है, ‘संघ की राज भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।‘

चिंतन जरूरी है

हिंदी राजभाषा तो बन गई मगर ये दर्जा रहा कागजों तक ही सिमित। आजादी के बाद से आजतक अलग-अलग पड़ावों में हिंदी ने अपना काफी स्वरूप बदला। नए शब्द बने, कुछ रूपान्तरित हुए। भौगोलिकरण का असर अच्छे से देखा गया। भले अलग-अलग विद्वानों ने इसे विकास या पतन कैसी  भी संज्ञा दी हो मगर हिंदी हमेशा धीरे-धीरे अपना स्वरूप बदलती रही। इसे ग्लोबलाईजेशन का ही असर कहिए कि आज जो अधिकतर मां-बाप अपने बच्चों का दाखिला अंग्रेजी स्कूलों में ही करवाते हैं तो वो हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी जियादा सीख पाते हैं। हिंदी भाषा इस हालिया स्वरूप पर चिंतन करने वाले ध्रुव गुप्त लिखते हैं…

dhruv-gupt “आज हिंदी दिवस है। हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति अश्रु-विगलित भावुकता का दिन। हर सरकारी या गैर सरकारी मंच से हिंदी की प्रशस्तियां गाई जाएंगी, लेकिन जिन कमियों की वज़ह से हिंदी आजतक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना अपेक्षित गौरव हासिल नहीं कर पाई है, उनकी बात कोई नहीं करेगा। हिंदी कल भी भावनाओं की भाषा थी, आज भी भावनाओं की ही भाषा है ! इतना लम्बा वक़्त गुज़र जाने के बावजूद हिंदी वहीं की वहीं ठहरी हुई है – हमारे दिलों में। हमने अपनी भाषा में बेहतरीन साहित्य ज़रूर लिखा, लेकिन क्या इतना ही किसी भाषा को गौरव और अंतर्राष्ट्रीय मान्यता दिलाने के लिए पर्याप्त है ? आज के वैज्ञानिक और अर्थ-युग में किसी भी भाषा का सम्मान उसे बोलने वालों की संख्या और उसका साहित्य नहीं, विज्ञान को आत्मसात करने और रोज़गार देने की उसकी क्षमता तय करती है। हिंदी में साहित्य के अलावा कुछ भी काम का नहीं लिखा गया। हम अपनी हिंदी को न विज्ञान की भाषा बना पाए, न रोज़गार की। आज भी विज्ञान, तकनीक, अभियंत्रणा, चिकित्सा, प्रबंधन, प्रशासन, विधि जैसे विषयों की शिक्षा में हिंदी अंग्रेजी का विकल्प नहीं बन पाई। युवा विज्ञान, मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रबंधन, विधि की पढ़ाई करना चाहते हैं तो अंग्रेजी के बगैर कोई पास चारा नहीं है। विधि के अलावा इन विषयों पर हिंदी में कायदे की किताब ही नहीं लिखी गई। विधि की भी जो किताबें हिंदी में उपलब्ध हैं उनका अनुवाद इतना जटिल और भ्रष्ट है कि अंग्रेजी की किताबें पढ़ लेना आपको ज्यादा सहज लगेगा। आज तक अंग्रेजी के वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों का ठीक से हिंदी अनुवाद भी हम नहीं करा सके। भारत सरकार के किराए के कुछ अनुवादकों द्वारा अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों के जैसे अनुवाद गढ़े गए हैं, उन्हें पढ़कर बरबस हंसी छूट जाती है। हम हिन्दीभाषी अपनी भाषा के प्रति जितने भावुक हैं, अगर उतने व्यवहारिक भी होते तो आज यह स्थिति नहीं आती। हालत यह है कि हममें से ‘हिंदी हिंदी’ करने वाला शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो अपनी संतानों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में नहीं पढ़ा रहा हो।

हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं की दुर्दशा के लिए अंग्रेजी को गाली देना बंद करिए ! चलिए अपनी हिंदी के लिए कुछ सार्थक सोचते और करते हैं ! भले आपको बुरा लगे, लेकिन वस्तुस्थिति यही है कि अगर अगले एक-दो दशकों में हिंदी को विज्ञान, तकनीकी शिक्षा और रोज़गार की भाषा के रूप में विकसित नहीं किया जा सका तो आने वाली पीढ़ियां इसे गंवारों की भाषा कहकर खारिज कर देंगी।“

निश्चित तौर हिंदी भाषा के सही विकास और इसे सम्मान देने के लिए हमें हिंदी को सही अर्थों में सम्मान देने वाले सर्वसम्मतिपूर्वक एक ही दिशा के विचार पर बल देना होगा। भौगोलिकरण के बाद जो परिवर्तन इसमें आया है उस पर विचार करना होगा, भाषा के खोए हुए स्वरूप पर मंथन करना होगा, साहित्य के वास्तविक अर्थों से परिपूर्ण स्वरूप की व्याख्या पर बल देना होगा और तमाम खामियों को दूर करना होगा।

 

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