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अंग्रेजी के पैरों तले रौंदी जा रही हिंदीः  डॉ. मालिनी गौतम

September 14, 2016 7:11 pm by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

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भारत एक बहुभाषी देश है, यहाँ सैकड़ों भाषाएँ बोली जाती हैं। इनमें से बाईस भाषाओं को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिया गया। इन बाईस भाषाओं में भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाषा है हिन्दी, क्योंकि हिन्दी भारत के करोड़ों लोगों की मातृभाषा है, कई राज्यों की राजभाषा है एवं कई राज्यों की द्वितीय भाषा है।

हिन्दी भाषा और साहित्य का इतिहास लगभग हजार वर्ष पुराना है। गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, विद्यापति, कबीर, रहीम जैसे सशक्त कवियों ने इसे समृद्ध बनाया है। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय हिन्दी एक राष्ट्रभाषा के रूप में उभरी। राष्ट्रीय एकता, अखंडता, त्याग- बलिदान का भाव जागृत करने के लिये यह संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग में ली गयी। हिन्दी और गैर-हिन्दी भाषियों के बीच की यह संपर्क भाषा बनती गयी। गिरमिटिया मज़दूरों के साथ-साथ हिन्दी भाषा मॉरीशस, फ़िजी, सूरीनाम, अफ्रीका, वेस्टइंडीज जैसे देशों तक पहुँची और वहाँ भी हिन्दी और भारतीय संस्कृति  का प्रचार-प्रसार होने लगा। बाद के समय में कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, आदि देशों में बसे प्रतिष्ठित भारतीयों के कारण इन देशों में भी हिन्दी का मान-सम्मान बढता रहा और हिन्दी एक विश्व भाषा के रूप में उभरने लगी।

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देश के कवियों, समाज सुधारकों, साहित्यिक पत्रिकाओं व साहित्यिक संस्थानों ने हिन्दी साहित्य के संरक्षण और प्रचार-प्रसार का दायित्व अपने हाथों में लिया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से लेकर मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान, प्रेमचंद आदि ने अपने लेखन के द्वारा हिन्दी को समृद्ध किया। गुजरात के महात्मा गांधी हों या पंजाब के लाला लाजपतराय या फिर बंगाल के नेताजी सुभाषचंद्र बोस सबने देशभर में अपने विचारों को पहुँचाने के लिये हिन्दी भाषा को ही पसंद किया। इस तरह स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तक भारत की यह लाड़ली बेटी फलती-फ़ूलती रही। हिन्दी की असली दुर्दशा शुरु हुई स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब कुछ निहित स्वार्थों के तहत हिन्दी को राष्ट्रभाषा न घोषित करते हुए राजभाषा का पद दिया गया और 15 वर्ष तक अंग्रेजी को सहभाषा में रखने की अनुमति प्रदान की गयी। यह एक गलती ही हिन्दी की दुर्दशा का कारण बन गयी ।तब से अब तक ऐसे न जाने कितने ही 15 वर्ष आये और गये पर हिन्दी आज भी अंग्रेजी के पैरों तले रौंदी जा रही है।

रही-सही कसर पूरी की है वैश्वीकरण और उदारीकरण की हमारी नीतियों ने। आधुनिकीकरण, वैश्विकरण, आर्थिक उदारीकरण और व्यापारीकरण के इस दौर में आर्थिक उन्नति के आँकड़ें बढ़े हैं, प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है, जीवन स्तर बढ़ा है, पर जो हमने खोया है उसकी तरफ ध्यान ही नहीं है हमारा। विगत दशकों में हमने अपनी भाषा खोयी है हम अपनी बोलियों से दूर हुए हैं। हर जगह अंग्रेजी भाषा का साम्राज्य फैला हुआ है। शहर, नगर, गाँवों ,कस्बों और गलियों में अंग्रेजी माध्यम की स्कूले कुकुरमुत्ते की तरह उग आये हैं। मगर सरकार आँख मूंदे बैठी है। मातृभाषा में शिक्षण सिर्फ सरकारी स्कूलों तक सीमित रह गया है। करोड़ो रुपियों के खर्च से हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये तैयार की जाने वाली सामग्री सिर्फ सरकारी स्कूलों तक सीमित होकर रह गयी है। उच्च स्तर की भर्तियों और नौकरियों में अंग्रेजी का अघोषित आरक्षण चालू है क्योंकि अंग्रेजी विषय का प्रश्नपत्र पास करना  अनिवार्य है । हिन्दी की इतनी खराब दशा है कि विद्यार्थी आठ्वी कक्षा के बाद अगर चाहे तो हिन्दी छोड़ सकता है पर अंग्रेजी विषय के बिना बारहवी की परीक्षा नहीं दे सकता है। वाहनों के नम्बर प्लेट पर नंबर अंग्रेजी में लिखे जा रहे हैं। दूकानों के नामपट्ट हर तरफ अंग्रेजी में हैं।

दरअसल हिन्दी का संख्या बल इतनी तेजी से बढ़ा है कि अंग्रेजी भक्त बौखला गये हैं। वर्ष 2000 की जनगणना के  आँकड़ों के बाद हिन्दी दूसरे स्थान पर आ गयी है अत: हिन्दी के विरुद्ध सुनियोजित षडयंत्र खड़ा किया गया है। हिन्दी से जुड़ी हुई विभिन्न बोलियों को भाषाओं में बदल कर हिन्दी बोलने वालों की संख्या कम करने के प्रयास किये जा रहे हैं। हिन्दी भाषा अपनी बोलियों से मिलकर बनी है। अगर इस तरह हर बोली को भाषा का दर्जा दिया जाने लगेगा तो हिन्दी में बाकी ही क्या रह जायेगा। हिन्दी के पाठ्यक्रमों में एन. सी. ई. आर. टी. द्वारा हिन्दी के व्याकरण, भाषाविज्ञान और साहित्यशास्त्र को पाठ्यक्रमों से हटाया जा रहा है ताकि हिन्दी की रीढ़ टूट जाये और हिन्दी पंगु हो जाये। अगर हम यह चाहते हैं कि हिन्दी पर छाया यह संकट दूर हो तो सजग होना आवश्यक है व अन्य लोगों को सजग करना भी जरूरी है।

 

हिन्दी के उत्थान के लिये सामान्य नागरिक के द्वारा किये जा सकने वाले उपाय-

हिन्दी के उत्थान के लिये सामान्य नागरिक के द्वारा निम्न उपाय किये जा सकते हैं। हमारी सरकार  भी हमारे समाज का ही प्रतिनिधित्व करती है अत: उनका उत्तरदायित्व भी कुछ कम नहीं बनता

1.सर्वप्रथम तो स्व-अवलोकन अनिवार्य है। दूसरों पर ऊँगली उठाने से पहले हम स्वयं में झाँककर देखें कि क्या हम स्वयं हिन्दी का प्रयोग बोलने और लिखने में करते हैं। क्या हम और हमारे परिवारजन, सगे-संबंधी, बाल-बच्चे, अपने हस्ताक्षर हिन्दी में करते हैं। अगर हम अपने हस्ताक्षर तक हिन्दी में न कर सकते हों तो कोई हक नहीं हमें स्वयं को भारत माता का, हिन्दी का सपूत कहने का। हिन्दी में हस्ताक्षर करने में काँपते हाथ किन हाथों से हिन्दी की समृद्धि का झंडा बुलन्द करेंगे ।

2. हमें यह ध्यान रखना होगा कि सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले हमारे परिवार के लोग, सगे-संबंधी हिन्दी का प्रयोग करते हैं या नहीं क्योंकि हिन्दी का संघर्ष राष्ट्र भाषा का नहीं है राजभाषा का है। प्रादेशिक और केन्द्र सरकारों के विभिन्न दफ्तरों में बैठे सरकारी अफ़सर अगर अपने कार्य समय में सिर्फ़ हिन्दी का प्रयोग करें, हिन्दी में काम करें, तो राजभाषा का संघर्ष स्वत: कम हो जायेगा।

3. हिन्दी शुद्ध बोली जा रही है या नहीं इस भाषा पर ध्यान केन्द्रित न करते हुए हिन्दी टूटी-फूटी जैसी भी बोली जा रही हो वह आवश्यक है। भारत में वही हिन्दी चल पायेगी जो गैर हिन्दी भाषी बोलेंगे या लिखेंगे।

4. गैर-हिन्दी भाषियों की त्रुटिपूर्ण हिन्दी का हम कभी उपहास न करें बल्कि उन्हें सदैव हिन्दी बोलने हेतु प्रोत्साहित करें। गैर-हिन्दी भाषियों के साथ हमारा भाव स्नेह और ममत्व का हो यह आवश्यक है।

5. विदेशी भाषा के प्रति अपने अनावश्यक मोह को त्यागें। अंग्रेजी के बिना कोई कार्य संभव नहीं इस वृत्ति से, सोच से, स्वयं को मुक्त करें। अंग्रेजी के प्रयोग द्वारा रुआब झाड़ने की  मनोवृत्ति से बचें। यह सोचें कि आखिर जिन पर हम रुआब झाड़ रहे हैं वे सब हमारे ही देशवासी हैं। अपनी भाषा के प्रति गर्व और गौरव महसूस करें। आज हिन्दी का सूरज पूरे आकाश को रौशनी दे रहा है। विश्व के 150 से 180 देशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी का पढ़ाया जाना इस बात का प्रमाण है।

6. आधुनिक और विकसित विज्ञान का बहाना बनाकर, उच्च शिक्षण का बहाना बनाकर विदेशी भाषाओं के पीछे न दौड़ें और अपनी भाषा को अपमानित न करें।

7. विदेशी भाषा के उपयोग द्वारा स्वयं को अंतर्राष्ट्रीय बनाने की जुगाड़ में कहीं हम राष्ट्रीय भी न रहें इस बात पर विचार करें ।

8. कुछ कदम सरकार के द्वारा भी उठाये जाने अनिवार्य हैं। प्राथमिक कक्षाओं में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षण देने पर तुरंत रोक लगानी चाहिये।

9. अंग्रेजी भाषा को कक्षा 5 के बाद ही पढ़ाना शुरु किया जाना चाहिये वह भी सिर्फ एक वैकल्पिक विषय के रूप में, अनिवार्यता नहीं होनी चाहिये।

10. त्रिभाषा के सूत्र को ठीक से पूरे देश में लागू किया जाये ताकि हरेक बच्चा हिन्दी का अध्ययन अनिवार्य रूप से कर सके व हिन्दी के प्रति स्नेह एवं तादात्म्य स्थापित कर सके।

11. उच्च स्तर की नौकरियों में व परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म  की जानी चाहिये ताकि विद्यार्थी भयमुक्त होकर हिन्दी माध्यम में अपनी पढ़ाई पूर्ण कर सके।

12. देश में व्यवसाय व उद्योग जमाने के लिये आये हुए विदेशी बैंकों एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर भी हिन्दी में कार्य करने का प्रतिबंध होना आवश्यक है।

13. संविधान में संशोधन करके हिन्दी के साथ अंग्रेजी को सहभाषा रखने के प्रावधान को तुरंत समाप्त किया जाये एवं हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया जाये।

14. हिन्दी की वर्तनी, व्याकरण इत्यादि का प्रचार-प्रसार किया जाये तथा कंपयूटर इत्यादि पर हिन्दी में कार्य करने को सरल एवं सुगम बनाया जाये।

15. सभी भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य को देवनागिरी में लिप्यांतरित करवाया जाये ताकि भाषाओं के बीच आपसी सौहार्द और एकता बढ़े।

16. हर व्यक्ति यह संकल्प ले कि हिन्दी के उत्थान के लिये वह सजग रहेगा। अपनी दूकानों, प्रतिष्ठानों और संस्थाओं पर नामपट्ट सिर्फ हिन्दी और प्रादेशिक भाषाओं में लगायेगा, अंग्रेजी में कदापि नहीं।

17. हम सदैव ध्यान रखें कि आपस में बातचीत करते समय हम हिन्दी का ही प्रयोग करें एवं अपने घर के उत्सवों-प्रसंगों के आमंत्रण-पत्र हिन्दी में छपवायें।

18. जहाँ कहीं भी हम हिन्दी की उपेक्षा होते देखें एक पोस्टकार्ड तुरंत संबंधित अधिकारी अथवा संबंधित विभाग को लिखें।

अगर देश का सामान्य नागरिक इतना भर भी निष्ठा से करे तो निश्चित रूप से यह एक छोटी-सी शुरुआत भी हिन्दी को अपना खोया हुआ दर्जा दिलवा सकेगी, उसके आभामंडल पर छाये बादलों को दूर कर सकेगी।

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लेखक परिचय

डॉ. मालिनी गौतम गुजरात की रहने वाली हिंदी कवयित्री हैं एवं पेशे से व्याखाता (अंग्रेजी) हैं। वे समय-समय पर हिंदी, साहित्य एवं व्याकरण इत्यादि के संबंध में आलेख, समीक्षाएं इत्यादि लिखती रही हैं। उनके दो काव्य संग्रह अभी तक प्रकाशित हो चुके हैैं, जिनमें ‘बूंद-बूंद अहसास’ और हाल ही में आया ‘एक नदी जामुनी-सी शामिल है। इसके अलावा उनके लेखन क्षेत्र में गीत, गजल दोहा एवं अनुवाद शामिल हैं। डॉ. मालिनी गौतम को इसी वर्ष अस्मिता साहित्य सम्मान-2016 से नवाजा गया है। 

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