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होली पर वायरल हो रही है हरियाणवी कविता होली सुसराड़ की

जानें कौन है इस कविता को लिखने वाला असली कवि

March 10, 2017 11:02 pm by: Category: तीज तयोहार, साहित्य खास 2 Comments A+ / A-

होली पर जगह जगह कवि सम्मेलनों का आयोजन होता, बधाई देने का सिलसिला भी चलता है और सिलसिला छिड़ता है संदेशों को एक दूसरे तक पंहुचाने का भी तो होली की मुबारकबाद के साथ हर साल एक हरियाणवी कविता जरुर वायरल होती है। कवि का नाम तो किसी विरली पोस्ट में ही मिलता है बहुत सारी पोस्ट में लोग बतौर कवि अपना दावा भी ठोक देते हैं नीचे नाम लिखकर ऐसे में उस कवि के दिल पर क्या बीतती होगी यह वह कवि ही समझ सकता है जिसकी कविता तो लोक की बन जाती है लेकिन लोक कवि को नहीं अपना पाता और ना ही जानने की जहमत समझता। ऐसा ही हर साल होता है गुड़गांव व बादली के बीच देवरखाना गांव के रहने वाले हरियाणवी कवि इंद्रजीत के साथ उनकी कविता होली सुसराड़ की हर साल अनेक लोग एक दूसरे के साथ सांझा करते हैं। आप भी पढ़ें होली व हरियाणवी के रंगों से सराबर कवि इंद्रजीत की कविता होली सुसराड़ की।

एक हरियाणवी कविता
होली सुसराड़ की
*********************
मैं गया सुसराड़
(काच्चा) नया कुर्ता गाड़
दाढ़ी बनवाई बाल रंग्वाए
रेहड़ी पर ते संतरे तुलवाए
हाथ मैं दो किलो फ्रूट
मैं हो रया सुटम सूट
फागण का महिना था
आ रया पसीना था
पोहंच गया गाम मैं
मीठे मीठे घाम मैं
सुसराड़ का टोरा था
मैं अकड में होरा था
साले मिलगे घर के बाहर
बोले आ रिश्तेदार आ रिश्तेदार
बस मेरी खातिरदारी शुरू होगी
रात ने खा पीके सोगया तडके मेरी बारी शुरू होगी
सोटे ले ले शाहले आगी
मेरे ते मिठाईया के पैसे मांगन लागी
दो दो चार चार सबने लगाये
पैसे भी दिए और सोटे भी खाए
साली भी मेरी मुह ने फेर गी
गाढ़ा रंग घोल के सर पे गेर गी
सारा टोरा होगया था ढिल्ला ढिल्ला
गात होगया लिल्ला लिल्ला गिल्ला गिल्ला
रहा सहा टोरा साला ने मिटा दिया
भर के कोली नाली में लिटा दिया
साँझ ताहि देहि काली आँख लाल होगी
बन्दर बरगी मेरी चाल होगी
बटेऊ हाडे तो नु हे सोटे खावेगा
बता फेर होली पे हाडे आवेगा
मैं हाथ जोड़ बोल्या या गलती फेर नहीं दोहराऊंगा
होली तो के मैं थारे दिवाली ने भी नहीं आउंगा
इन्द्रजीत

इब पढ़ो कवि इंद्रजीत की एक और कविता हैप्पी होली

हैप्पी होली

हम भी खेल्या करते होली
बणा बणा यारां टोली
भरकै गोज्जा मैं रंग
खूब करा करते हुड़दंग
गाला म्हा तै भाज्या करते
मिलजुल कै नै नाच्या करते
मां बड़ी स्याणी थी
उसकी हर बात हमनैं मानी थी
सबतै पुराणे लत्ते पहराती
दो चार रुपया के रंग दिवाती
नू कहती घणे ना उड़ाईयो
इन्ने तै तम काम चलाईयो
कट्ठे होकै बालक सारे
लिया करते खूब नजारे
जब कोए मिलता बड़ा बडेरा
लाकै नै हम सारे घेरा
चला पीचकारी मार गुब्बारे
भेया करते उसने सारे
वो डोग्गा लेकै मारण आवै
हम किल्की मार उसनै चिड़ावै
जो कोए लाग्या करती भाभी
उसने कर देते लाल गुलाबी
जब बड़े भाई हमनै धमकाते
थोड़ा सा गुलाल उनकै भी लाते
नु तो आते खूब उल्हाणे
पर हम कोणसे जावां थे पिछाणे
मुह होवैं थे लील्ले काले
एक तै एक लाग्गा थे निराले
जब जब यो त्योहार आवै सै
सारे एक जिसे हो ज्यावै सै
ना कोए गरीब ना कोए अमीर
ना कोए सुन्डु ना कोए समीर
ना कोए रोला ना कोए झगड़ा
ना कोए टैंशन ना कोए लफड़ा
रंग लगावां मिल मिल कोली
सबनै कह्वां हैप्पी होली

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Comments (2)

  • Username*

    शुक्रिया साथी… कई साल तै वाईरल हो री सै या कविता.. मेरे धोरै भी कई बार आ ली ईब मै किस किस तै बताउ

    • haryanakhas

      धन्यवाद कविराज जी

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