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यह कैसा भाईचारा?

December 27, 2016 9:43 am by: Category: खबर खास 2 Comments A+ / A-

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने  मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय दोनों बार खराब गले व खांसी के बावजूद एक ही गीत गुनगुनाया-

इंसान का इंसान से हो भाईचारा,

यही पैगाम हमारा

इसके बावजूद उन्होंने उपराज्यपाल नजीब जंग से जैसा भाईचारा निभाया वो सबके सामने है और आखिरकार जंग ने त्यागपत्र भी दे दिया। राजनीति का भाईचारा एकदम अलग होता है। इस भाईचारे का रूप संसद भवन के बाहर ममेरे-फुफेरे भाइयों बीरेंद्र सिंह और भूपेंद्र सिंह हुड्डा के गले मिलने की फोटो के रूप में सामने आता है। हुड्डा संसद भवन में किसी काम से गए थे जबकि केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह बाहर निकल रहे थे। दोनों भाई यूं गले मिले जैसे बहुत दिनों बाद मिले हों। इस फोटो को बीरेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया पर भी शेयर किया। अखबारों ने भी इस भाईचारे की फोटो को मुख्य पृष्ठ पर जगह दी। यह तो सोशल भाईचारा था, लेकिन अब जरा राजनीतिक भाईचारे की झलक भी देख लीजिए।

गढ़ी सांपला में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की विकास रैली में पहले तो खट्टर काका ने पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा पर निशाना साधा। उन्होंने सांपला के लिए कुछ नहीं किया, बल्कि गुडग़ांव में प्रॉपर्टी डीलिंग की दुकान खोलकर अपना घर भरा। यदि हुड्डा साहब ने कुछ गलत नहीं किया तो चादर तानकर सोएं। कोई कुछ नहीं कहेगा। गढ़ी सांपला-किलोई पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा का चुनाव क्षेत्र है, इसलिए बढ़ चढक़र विकास योजनाओं की घोषणाएं की। केंद्रीय इस्पात मंत्री ने तो खट्टर काका को भी पीछे छोड़ते हुए कहा कि मैं मुख्यमंत्री होता तो हुड्डा को अब तक हथकड़ी पहना देता। इससे भी आगे बढक़र यह घोषणा भी कर डाली यदि पराजित प्रत्याशी धर्मवीर किलोई सीट छोडऩे को राजी हुए तो हुड्डा के खिलाफ चुनाव लडऩे को तैयार हूं। बीरेंद्र सिंह अपने नाना सर छोटूराम का पद छोटा करने का आरोप भी भाई हुड्डा पर लगाया। खट्टर काका की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने छोटूराम का 64 फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित करने को मंजूरी दे दी है। वाह! क्या प्रतिमा की ऊंचाई ही भाईचारे में दीवार बन गई? क्या प्रतिमा की ऊंचाई से ही अपना राजनीतिक कद मापेंगे? पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने जब छोटूराम स्मारक के लिए पाकिस्तान से उनसे जुड़ी चीजों को लाने का बीड़ा उठाया, तब आप कहां थे? यही बात तो इनेलो नेता पूछते हैं और कहते भी हैं कि खुद छोटूराम के नाती होने के बावजूद बीरेंद्र सिंह ने उनका स्मारक क्यों नहीं बनवाया? बसंत पंचमी पर सर छोटूराम को बीरेंद्र सिंह हर वर्ष याद जरूर करते हैं।

यह राजनीतिक भाईचारा देखकर सभी हैरान-परेशान हैं। भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने एक साथ  दो-दो बार लगातार सरकार बनाने का रिकॉर्ड बनाया। बीरेंद्र सिंह को मंत्रीमंडल में महत्वपूर्ण विभाग दिए और विकास पर एक ही बात कही कि खजाना बीरेंद्र सिंह को सौंप रखा है। जबकि बीरेंद्र सिंह का एक ही जवाब होता था कि चाबी तो हुड्डा ने अपने पास रखी हुई है। इस तरह यह भाईचारा इतनी दूर होता चला गया कि हरियाणा कांग्रेस में नए चेहरे को लेकर चुनाव मैदान में उतारने की मांग पूरी न होने पर बीरेंद्र सिंह भी नए दल भाजपा में शामिल हो गए। अब कभी कहते हैं कि यह पहल्यां आला मुख्यमंत्री नहीं, यह तो विकास कर रहा है, भेदभाव नहीं कर रहा, कभी पूर्व मुख्यमंत्री को हथकड़ी पहनाने तो कभी बिना चुनाव के ही किलोई से टक्कर देने की घोषणा करते हैं। यह कैसा भाईचारा? सच इसे देखकर तो यही कह सकते हैं:-

यह नए मिजाज का शहर है, यहां फासले से मिला करो

कोई हाथ भी ना मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से

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लेखक परिचय

लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइश हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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Comments (2)

  • kamlesh bhartiya

    mujhe khushi hai ki haryana ki rajneti ke rang ko byan kar saka. yeh nahin janta ki pathak ise kis rup me lenge?

    • kamlesh bhartiya

      rajneti ke anek rang hote hain aur yeh anishchitta ka khel hai, isme kaun kab dost ban jaye, kaun kab dushman ban jaye. koyi nahin keh sakta.

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